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इलाहाबाद छात्रसंघ चुनाव में समाजवादी पार्टी के पैनल की जीत के निहितार्थ

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इलाहाबाद यूनिवर्सिटी (जो केंद्रीय विश्वविद्यालय) में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, संयुक्त मंत्री और साहित्य मंत्री जीत गए हैं। महामंत्री में समाजवादी पार्टी पराजित हुई है और भाजपा जीती है जिसके कारणों की तह में पार्टी की छोटी सी चूक है। खैर मैं अभी इस पर चर्चा नही करूँगा, मैं इस बात पर चर्चा करना चाहता हूं कि ऐसे समय मे जब केंद्र व प्रदेश में पूर्ण रूप से भगवा राज है तो हैदराबाद से लेकर,दिल्ली तक,राजस्थान से लेकर यूपी तक छात्रसंघ चुनावो में भाजपा परास्त हो रही है।

देश का पढ़ा-लिखा तबका अब संघ को नकार रहा है। यूपी संघ/भाजपा की प्रयोग स्थली है। मैं थोड़ा पीछे ले चलूंगा जब 1990 में मण्डल के जबाब में भाजपा ने कमण्डल लिया था और पुरजोर कोशिश की थी पिछडो/दलितों में सेंध लगाने की लेकिन मण्डल ने ऐसा न होने दिया और यूपी में जब तक समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी पिछड़ा/बहुजन कांसेप्ट पर रही तब तक ये राज करती रही और भाजपा 14 साला बनवास पर चली गयी लेकिन ज्यो ही सपा/बसपा/आरक्षण विरोध व सर्वजन की तरफ मुखातिब हुई भाजपा ने पिछड़ा/दलित कार्ड खेला और तमाम पिछड़ी/दलित जातियों के भिन्न-भिन्न दलो के नेताओ को अपने अंदर समाहित कर यूपी से अपना बनवास खत्म कर डाला और सपा/बसपा कालिदास की तरह जिस डाल पर बैठे थे उसे ही काट कर (आरक्षण विरोध व सर्वजनवाद करके) के औंधे मुंह गिर पड़े।

बहन जी मायावती जी अभी भी दरबे में बैठकर सर्वजन का राग अलापते हुए मिशनरी नेताओ को निकालते हुए अलग-थलग पड़ती जा रही हैं वही अखिलेश यादव जी कभी आबादी के अनुपात में आरक्षण की मांग कर कुछ लाइन पर आते दिख रहे हैं तो कभी ट्रैक छोड़ दे रहे हैं। मैं निःसंकोच कह सकता हूँ कि अभी अखिलेश का भी कांसेप्ट बहुत साफ नहीं हो सका है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव को आधार बना मैं अखिलेश यादव जी को कहना चाहता हूं कि यह वही इलाहाबाद है जहां के वंचित वर्ग के छात्र अभिजात्य वर्ग के छात्रों द्वारा लोकसेवा आयोग को यादव सेवा आयोग लिखने,कृष्ण की फोटो वाली दुकानों को तोड़ने, दूधियों का दूध गिराने व मारने तथा त्रिस्तरीय आरक्षण वापस लेने पर आंदोलित हो लखनऊ तक कूच किये थे, अभिजात्य वर्ग के छात्रों से लोहा लिए थे,पुलिस के डंडे खाये थे,जेल गए और मुकदमो में फँसाये गए थे।अखिलेश यादव जी द्वारा इन आंदोलनरत छात्रों से यह दो टूक कहने पर कि हम त्रिस्तरीय आरक्षण वापस लेने का निर्णय नही बदलेंगे,जाओ जो करना हो कर लेना, सुनकर मायूस लौट 2017 के विधानसभा चुनाव में या तो खामोश हो गए थे या विरोध किये थे, वे अखिलेश यादव द्वारा यदा-कदा यह कहने से कि आबादी के अनुपात में आरक्षण मिले, आशान्वित हो इलाहाबाद विश्वविद्यालय चुनाव में एक बार फिर समाजवादी पार्टी की तरफ उन्मुख हुए हैं।

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इलाहाबाद में प्रदेश भर के दलित/पिछड़े/अल्पसंख्यक समाज के समस्त बुद्धिजीवी छात्र एक जुट हो भाजपा की आरक्षण,वंचित,सेक्युलरज्म विरोधी कार्यबृत्ति से कुपित हो समाजवादी पार्टी को सपोर्ट कर अखिलेश यादव को यह एक संकेत दिए है कि आप सामाजिक न्याय की अवधारणा को आत्मसात करिए। देश मे पूर्ण भगवाकरण व पिछड़े वर्ग के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य जी के गृह क्षेत्र इलाहाबाद होने के बावजूद इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यक्ष-अवनीश कुमार यादव, उपाध्यक्ष-चन्द्रशेखर चौधरी, संयुक्त मंत्री-भरत सिंह एवं साहित्य मंत्री-अवधेश कुमार पटेल शानू के रूप में समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की है। यह जीत सामाजिक न्याय समर्थक पैनल की जीत है। इस जीत में समाजवादी पार्टी द्वारा सोशल इंजीनियरिंग का जो प्रयोग किया गया है वह कारगर हुवा है।इस जीत में समाजवादी पार्टी का वह मुखड़ा कि यह भी अभिजात्य वर्ग पोषक है, ध्वस्त हुवा है और समाजवादी पार्टी खुद को दलित/पिछड़ा समर्थक के रूप में प्रस्तुत की है और इसकी परिणति जीत के रूप में हुई है।

समाजवादी पार्टी और उसके नीति नियंताओ को यह समझना होगा कि देश की राजनीति दो धाराओं की सदैव से रही है। एक अभिजात्य वर्ग पोषक और दूसरी वंचित समर्थक। अभिजात्य वर्ग पोषण का कार्य पहले कांग्रेस करती थी तो सोशलिस्ट पार्टी वंचित हित की वकालत,अब भाजपा अभिजात्य वर्ग पोषण में तल्लीन है तो सपा, बसपा,राजद,डीएमके आदि को वंचित वर्ग पोषण में रहना चाहिए लेकिन यूपी में भाजपा/कांग्रेस की तरह ही सपा/बसपा भी अभिजात्य वर्गो की पिछलग्गू हो गयी थी जिसका खामियाजा सपा/बसपा को भुगतना पड़ रहा है।

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में जो जीत मिली है वह समस्त पिछडो,दलितों और अल्पसंख्यको की एका का प्रतिफल है और भविष्य की राजनीति का दर्शन भी इसमें सन्निहित है। इस छात्रसंघ चुनाव ने बता दिया है कि जब लाइन खींच कर दलित/पिछड़े/अल्पसंख्यक को साथ लेकर चलोगे तो उन स्थानों पर जहां आम चुनाव में 85 प्रतिशत यही (sc/st/obc/ minorities) हैं, अप्रत्याशित सफलता मिलेगी लेकिन यदि फिर भूतकाल की गलतियां दुहराओगे,फिर वंचित विरोध और सवर्ण हित पोषण करोगे तो फर्श पर बने रहोगे।

मैं समझता हूं कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में मिली जीत के निहितार्थ की समीक्षा करते हुए समाजवादियों के सामाजिक न्याय के एजेंडे को आत्मसात करते हुए देश भर में पिछडो/दलितों/अल्पसंख्यको के कुंद हो रहे नेतृत्व को फिलअप करेंगे और देश की राजनीति में मजबूती से वंचितों का पक्ष रखेंगे। यदि ऐसा हुवा तो समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव भविष्य के महानायक बनेंगे अन्यथा तो जो है वह दिख ही रहा है…..

(ये लेखक के निजी विचार हैं। चंद्रभूषण सिंह यादव त्रैमासिक पत्रिका यादव शक्ति के प्रधान संपादक हैं।)

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