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धर्म की सत्ता रहेगी या फिर विज्ञान की महत्ता, दोनों में सामंजस्य हो ही नहीं सकता

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” कह रहीम कैसे निभे,बेर-केर के संग।
वे डोलत रस आपने,उनके फाटत अंग।।”

रहीम जी कहते हैं कि बेर जिसमे कांटे होते हैं उससे केले की दोस्ती नही हो सकती क्योंकि जब बेर हवा से हिलेगा तो केले की पत्तियों को उसके कांटे फाड़ देंगे।कभी भी बेर और केर(केले के पौधे) की दोस्ती नही हो सकती है।ठीक ऐसा ही धर्म और विज्ञान है।या तो धर्म की सत्ता रहेगी या फिर विज्ञान की महत्ता, दोनों में सामंजस्य हो ही नही सकता।

वर्तमान दौर विज्ञान का है।जिस किसी देश ने विज्ञान को तवज्जो दिया है वह दुनिया पर राज कर रहा है,विकसित देशों की श्रेणी में जबकि जिन देशों ने धर्मिक आस्थाओं को महत्ता दिया है वे अभी भी विकासशील देश की श्रेणी में हैं और कभी भी रहेंगे।

भारत को धर्मिक आडम्बरो में बुरी तरह से जकड़ दिया गया है।विज्ञान के प्रयोगशालाओं को खोलने की बजाय मन्दिरो को बनाने में देश का धन बर्बाद किया जा रहा है जिस नाते हम आविष्कारों के मामले में शिफर हैं। हम आविष्कार किये हैं भगवानों का, वह भी एक-दो-दस-हजार-लाख नही बल्कि 33 करोड़ और अभी भी 33 करोड़ के आगे इनके आविष्कार जारी है संतोषी माता,बुढ़िया माता,पगली माता,चिरकुटही भवानी आदि के रूप में।

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दुनिया मे हिन्दू धर्म के अलावे जितने भी धर्म है उनके पैगम्बर या गॉड एक-दो होंगे पर हमारे करोड़ की संख्या में हैं।दूसरे धर्मों के एक-दो-तीन-चार त्यौहार होंगे जबकि हमारे सैकड़ो त्यौहार हैं। दुनिया के दूसरे धर्मों के पैगम्बर शान्ति, प्रेम, करुणा, मित्रता, दया आदि की शिक्षा दिए हैं जबकि हिन्दू धर्म के देवता एक से एक शार्प हथियारों से लैस किसी न किसी का बध करते हुए दिखाई देते हैं। दुनिया के अन्य धर्म अहिंसा पर तो हिन्दू धर्म हिंसा पर खड़ा है।

धर्म खयाली पुलाव पकाता है जबकि विज्ञान यथार्थ का दर्शन करवाता है। धर्म चन्द्रमा को मामा कहता है तो विज्ञान इसे उपग्रह बताते हुए, इस पर कदम रख चुका है। धर्म राम के वाणों को इसरो के मिसाइल से तुलना कर दिन में स्वप्न दिखाता है तो विज्ञान पैट्रियाट एवं स्कड मिसाइल बनाता है। धर्म पुष्पक विमान का खयाली गप्प हांकता है तो विज्ञान के जरिये राइट ब्रदर्स हवाई जहाज बनाते हैं। विज्ञान के ज्ञान के आगे धर्म का हवन, पूजा,परिक्रमा, यज्ञ आदि बेमतलब है। दुनिया विज्ञान से तरक्की कर रही है जबकि हम धर्म की राह पर चलते हुए पुरोहितों के मुफ्तखोरी को आत्मसात कर रहे हैं। धर्म मंदिरों, देवताओ,पुजारियों,चमत्कारों का आविष्कार करता है जबकि विज्ञान तरक्की हेतु दवाओं, कारखानों, रेल, बस, जहाज सहित आवश्यक आवश्यकता की चीजो का निर्माण करता है।

धर्म हमे कहता है कि कुछ भी जानो मत,सिर्फ मानो, जबकि विज्ञान कहता है कि पहले जानो फिर मानो। तर्क करना, यथार्थ जानना विज्ञान है जबकि बुद्धि-विवेक के प्रयोग पर ताला लगाना धर्म है।

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पढ़े-लिखे,शोधार्थी भी धर्म के नाम पर आंखे मूंद लेते हैं, मन्दिरो त धर्मस्थलों के आगे सर झुका देते हैं। अपढ़ पुरोहितों, मुल्लो, पादरियों के सक्षम ज्ञान से परिपूर्ण लोग दिमाग की बत्ती बुझा सर को झुका देते हैं। धर्म का फंदा अद्भुत है जहाँ विज्ञान बेबस हो जाता है। धर्म से हम तभी मुक्त हो सकते हैं जब हम दिमाग की बत्ती जला करके सकारात्मक रूप से सोचें और हर बात को तर्क की कसौटी पर कस करके सही-गलत का आकलन करें।

(ये लेखक के निजी विचार हैं। चंद्रभूषण सिंह यादव त्रैमासिक पत्रिका यादव शक्ति के प्रधान संपादक हैं।)

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