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तुषार यादव की हत्या और JNU से नजीब के लापता होने से किसी की सेहत पर क्या फर्क पड़ता है?

बड़ा अजीब मंजर है यहां पर,यदि किसी साधन सम्पन्न, अभिजात्य भद्र मानुष का कुत्ता बीमार हो जाय तो पूछनहारो का तांता लग जायेगा लेकिन 14 सितम्बर 2014 को 17 साल के तुषार यादव की आईआईटी गुवाहाटी में जो इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग का प्रथम समेस्टर का छात्र था, की हत्या हो जाती है तो आज भी उसका कोई पूछनहार नही है।

गुवाहाटी पुलिस ने पोस्टमार्टम के बाद अज्ञात के बिरुद्ध हत्या एवं षड्यंत्र का मुकदमा दर्ज किया जिसे बाद में 2016 में आत्महत्या करार देकर मुकदमे को ही स्पंज कर दिया।गुवाहाटी की अदालत ने तुषार यादव की मौत को आत्महत्या मानने से इनकार करते हुए जांच कार्य असम के पुलिस महानिदेशक की देखरेख में कराने का आदेश दे रखा है लेकिन 37 महीने से ऊपर होने को है भारत की बहादुर पुलिस अभी डुबकियां लगाने में ही मस्त है। तुषार यादव के माता-पिता बिंदु यादव व नरेंद्र सिंह अपने लाडले के हत्यारों को सजा दिलाने हेतु आज भी प्रयत्नशील हैं लेकिन वाह रे देश के हुक्मरानों! तुम्हारा चश्मा केवल सुविधा सम्पन्न अभिजात्य समाज की तकलीफों पर ही नजर रखता है?

अजीब हालात है इस देश के गैर अभिजात्य समाज का क्योकि तुषार यादव की ही तरह 15 अक्टूबर 2016 को प्रधानमंत्री मोदी जी की नाक के नीचे से जेएनयू में अध्ययनरत नजीब लापता हो जाता है।उसकी माँ अनवरत एक वर्ष से संघर्षरत हैं।

लालू यादव के मामले में सेना तक को लेकर चढ़ जाने वाली देश की बहादुर सीबीआई नजीब को एक वर्ष में तलाशना तो दूर यह भी पता नही लगा पाई है कि नजीब जिंदा भी है या नही?15 अक्टूबर 2017 को जब नजीब की माँ एक वर्ष बाद भी अपने लाडले को ढूढने की मांग हेतु प्रोटेस्ट करने जाती हैं तो पाकिस्तानी घुसपैठिये की तरह उस मां को घसीटते हुए पुलिस वैन में फेंक दिया जाता जिससे वे चोटिल हो अस्पताल ले जाई जाती हैं।

आखिर तुषार यादव की संस्थानिक हत्या और नजीब के लापता होने पर देश कब दुखी होगा?भारतीय न्याय व्यवस्था के तहत इन्हें हमारे देश के हुक्मरान कब न्याय दिलवाएंगे,यह एक बड़ा सवाल है।

ये घटनाएं यह सिद्ध करती हैं कि देश मे अब भी मनुवाद जारी है जिसमे ब्राह्मण के बेटा की मौत पर राम ने शूद्र शिक्षाध्य्यन कारण मानते हुए शम्बूक का गर्दन काट डाला था लेकिन अकारण,निर्दोष शम्बूक की हत्या पर आज भी किसी को अफसोस नही है।

ठीक ऐसे ही निर्भया से बलात्कार के बाद उसके लिए तो कानून बन जाता है, गांव-गांव कैंडिल मार्च निकल जाता है पर तुषार यादव व नजीब के लिए सारा सिस्टम मौन है मौन!

(ये लेखक के निजी विचार हैं। चंद्रभूषण सिंह यादव त्रैमासिक पत्रिका यादव शक्ति के प्रधान संपादक हैं।)

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