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पशुवध कानून से लेदर इंडस्ट्री पर मार, दलित-मुस्लिम कामगारों का छिना रोजगार

नई दिल्ली। बीते रमजान के महीने के दौरान कोलकाता के लेदर कारोबारी मोहम्मद अयूब अजीब कशमकश के दौर से गुजर रहे थे। कम से कम 60 कर्मचारियों वाली उनकी लेदर प्रोसेसिंग यूनिट का काम सिमट कर एक चौथाई हो गया था। पशुओं की सप्लाई घटने की वजह से उनके पास चमड़े की कमी हो गई थी और वे अपने इन कर्मचारियों में से दो तिहाई लोगों की छंटनी की सोच रहे थे। लेकिन रमजान के पवित्र महीने में उन्हें ऐसा करते हुए डर लग रहा था। उन्हें डर था कि अगर उन्होंने ऐसा किया था अल्लाह का कहर उन पर बरसेगा।


देश में जब से पशु वध से जुड़ा नया कानून आया है, कोलकाता की लेदर इंडस्ट्री का बुरा हाल हो गया है। कोलकाता के लेदर कॉम्प्लेक्स की 400 यूनिटों में काम धीरे-धीरे अब ठप होने की कगार पर है। लेदर इंडस्ट्री को मिलने वाले ऑर्डर आधे रह गए हैं। अयूब जैसे लोगों को अपने कर्मचारियों के वेतन आधे करने पड़े हैं। पहले एक कर्मचारी आठ से दस हजार रुपये वेतन लेता था लेकिन अब उसे चार हजार ही मिल रहे हैं।

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ऑर्डर घटने की वजह से लेदर के दाम घट गए हैं। 2014 में एक फीट लेदर 50 रुपये का था लेकिन अब यह घट कर 22 रुपये रुपये का रह गया है। यूरोप और चीन के बाजार में मांग घटने की वजह से भारतीय लेदर मार्केट पहले से ही दबाव में था और अब हालिया कानून ने तो इसकी कमर ही तोड़ दी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में यह साफ हो गया है कि भारत का राजनीतिक माहौल वहां की लेदर इंडस्ट्री के पक्ष में नहीं है। लिहाजा ऑर्डर कम होने शुरू हो गए हैं।

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लेदर मार्केट में सप्लाई संकट की वजह से काम में मंदी का सबसे ज्यादा असर मुसलमानों और दलितों पर पड़ा है। क्योंकि इस इंडस्ट्री में 95 फीसदी कामगार इसी वर्ग से हैं। कोलकाता की लेदर इंडस्ट्री पर सबसे ज्यादा असर यूपी में पशु वध बैन से पड़ा है। क्योंकि कोलकाता की यह इंडस्ट्री यहीं के पशु बाजार से मवेशी ले जाती थी। पश्चिम बंगाल में लेदर और उससे जुड़ी सहायक इंडस्ट्री दस लाख लोगों को रोजगार देती है।


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देश के लेदर एक्सपोर्ट में पश्चिम बंगाल की हिस्सेदारी 25 फीसदी है। इन दिनो इंडस्ट्री में कच्चे माल की कमी लेदर के सामान मसलन, पर्स, बेल्ट, वॉलेट, बैग बनाने वाली छोटी इकाइयों पर कहर बन कर टूटी है। कोलकाता के लेदर कॉम्पलेक्स में पर्स, बेल्ट , बैग बनाने वाली एक यूनिट के मालिक ने कहा कि मनी बैग बनाने के लिए उनके पास पहले 60 कर्मचारी थे लेकिन 30 रह गए हैं। कच्चा माल न आने से काम काफी कम रह गया है। कोलकाता में सबसे ज्यादा असर छोटी यूनिटों पर पड़ा है, जिससे हजारों लोग जुड़े हैं। इन सभी की रोजी पर अब तलवार लटक रही है।

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