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नोटबंदी का निराला खेल: नेताओं को कालाधन सफेद करने का मौका दे रही मोदी सरकार?

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने बंद हुए पुराने 500 और 1000 के नोट को जमा कराने के लिए बैंकों और पोस्ट ऑफिस को छूट दे दी है। वित्त मंत्रालय की तरफ से जारी हुए नोटिफिकेशन के अनुसार, अब जिले में मौजूद को-ऑपरेटिव बैंक, पोस्ट ऑफिस और राष्ट्रीयकृत बैंक अपने पास रखे पुराने नोटों को एक माह के अंदर आरबीआई से एक्सचेंज कर सकेंगे। लेकिन सरकार के इस फैसले से धांधली की एक बू आने लगी है।

दरअसल, को-ऑपरेटिव बैंकों का कहना था कि उनके पास पुराने नोट काफी संख्या में पड़े हैं। बैंकों का कहना था कि वे किसानों को इसके चलते कैश नहीं दे पा रहे हैं। नोटबंदी के छह माह बीत जाने के बाद भी उनके पास पुराने नोटों के बंडल हैं जिन्हें वे एक्सचेंज नहीं करवा पाए। बैंकों का कहना था कि नगदी संकट के चलते किसानों को पैसा नहीं मिल पा रहा था, जिसके चलते उन्होंने सरकार से पुराने नोट जमा करने के लिए मोहतल मांगी थी। जिसे देखते हुए सरकार की तरफ से यह फैसला लिया गया है।

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आपको बता दें कि जब नोटबंदी हुई थी तो को-ऑपरेटिव बैंकों में गड़बड़ी की आशंका जताई गई थी। उस समय इनकम टैक्स विभाग ने को-ऑपरेटिव बैंकों के खातों में भारी गड़बड़ी का अंदेशा लगाया था। विभाग ने रिजर्व बैंक को पत्र लिखकर कई सहकारी बैंकों के खातों में करोड़ों रुपये के कथित अवैध लेनदेन के बारे में जानकारी दी थी। आयकर विभाग द्वारा तैयार विश्लेषण रिपोर्ट में दो विशेष मामलों की जानकारी दी गई थी। इस रिपोर्ट में मुंबई और पुणे के दो मामलों का जिक्र किया गया था जिनमें दो बैंकों ने कालाधन सृजन को देखते हुए 500, 1000 के पुराने नोटों में 113 करोड़ रुपए की अतिरिक्त राशि होने की जानकारी आरबीआई को दी।

आयकर विभाग की तब की रिपोर्ट के अनुसार, पुणे के एक बैंक ने रिजर्व बैंक को 242 करोड़ रुपए के नोट होने की जानकारी दी जबकि उसके पास वास्तव में 141 करोड़ रुपए ही थे। यानी इस सहकारी बैंक ने 101 करोड़ रुपए के अतिरिक्त पुराने नोट होने की जानकारी दी। इसी तरह मुंबई में भी एक बैंक ने 11 करोड़ रुपए की अतिरिक्त राशि होने की जानकारी दी थी।

आयकर विभाग ने पिछले साल नोटबंदी के बाद इस तरह कई को-ऑपरेटिव बैंकों का सर्वे किया था। इस दौरान उसे चलन से बाहर किये गये नोटों की इन बैंकों में उपलब्धता और रिजर्व बैंक को दी गई जानकारी में गंभीर अंतर नजर आया था।

ज्यादातर नेताओं के हैं को-ऑपरेटिव बैंक
सर्वविदित है कि ज्यादातर को-ऑपरेटिव बैंक नेताओं के हैं और उनमें बीजेपी नेताओं के बैंक ज्यादा हैं। अब जबकि सरकार ने साफ कर दिया है कि को-ऑपरेटिव बैंकों से पुराने नोट लिए जाएंगे तो यह को-ऑपरेटिव बैंकों के लिए एक वरदान की तरह है। यानि कि जब उन्होंने कम पैसे होने के बावजूद ज्यादा पैसे दिखाए तो अब नेताओं के ये बैंक चोरी-चुपके बड़े कारोबारियों से या कालाधन के रूप में रखे लोगों से पैसे लेकर उन आंकड़ों में फिट करा देंगे और फिर वह पैसा आरबीआई में जमा करके उन काले पैसों को सफेद पैसे में बदल देंगे। इससे को-ऑपरेटिव बैंकों के सहारे नेताओं को फायदे पहुंचेंगे और वह फायदे नेताओं के सहारे कालाधन रखने वालों को भी पहुंचेंगे। इससे वह नेता और कालाधन रखने वाले तो मजबूत होंगे लेकिन इससे देश की अर्थव्यवस्था खोखली हो जाएगी।

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बता दें कि एक जांच में पाया गया था कि पूरे देश के 285 जिला कोऑपरेटिव बैंकों में 8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा के एक सप्ताह के अंदर ही उनकी नकद जमा में 6 गुना तक वृद्धि हुई थी। सबसे खास बात यह थी कि इनमें ज्यादातर भाजपा नेताओं के बैंक थे। खबर यह भी आई थी कि नोटबंदी की घोषणा के बाद भाजपा नेताओं ने अपनी पकड़ का इस्तेमाल कर को-ऑपरेटिव बैंकों में अपने कालेधनों को रात-रात में जमा करवाया था।

एक खबर यह भी आई थी कि एक अन्य कोऑपरेटिव बैंक में नोटबंदी के सिर्फ तीन दिन के अंदर ही 600 करोड़ की नकदी जमा हुई थी। इस बैंक का नाम था अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव बैंक। टाइम्स ग्रुप के अखबार मुंबई मिरर के मुताबिक अहदाबाद स्थित इस बैंक के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह खुद शामिल थे।

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पूर्व केंद्रीय वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने भी जताया शक
पूर्व केंद्रीय वित्तमंत्री पी.चिदंबरम ने भी अंदेशा जताया है कि जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (डीसीसीबी) को विमुद्रित नोट जमा करने की मंजूरी देने का केंद्र सरकार का फैसला शिवसेना द्वारा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के राष्ट्रपति उम्मीदवार को समर्थन देने से जुड़ा हो सकता है। सोमवार रात जारी राजपत्र अधिसूचना की ओर इशारा करते हुए कांग्रेस नेता ने ट्वीट किया, आधी रात को अधिसूचना राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के पक्ष में समर्थन लेने के लिए तो नहीं जारी की गई? अधिसूचना में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा डीसीसीबी से विमुद्रित नोट स्वीकार करने की बात कही गई है।

नोट बदलने की राहत मिलते ही शिवसेना भी आई साथ
शिवसेना ने पलटी मारते हुए राजग उम्मीदवार रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी के समर्थन की घोषणा की थी। जबकि एक दिन पहले उसने भाजपा द्वारा जाति के आधार पर उम्मीदवार उतारने का विरोध किया था। शिवसेना केंद्र सरकार से बीते साल नोटबंदी के दौरान डीसीसीबी द्वारा स्वीकार किए गए विमुद्रित नोटों को आरबीआई द्वारा स्वीकार करने की अपील करती रही है। क्योंकि मुंबई में ज्यादातर को-ऑपरेटिव बैंक शिवसेना के नेताओं के हैं।

ऐसे में सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या सिर्फ आम आदमी को परेशान करने के लिए ही नोटबंदी की गई थी? सरकार भी अभी तक नोटबंदी का कोई फायदा गिनाती नजर नहीं आई है।

(संपादन- भवेंद्र प्रकाश)

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