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भारत में बढ़ रही है बेरोजगारों की संख्या, नोटबंदी है एक बड़ा कारण

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भारत में बेरोजगारों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। सरकार वादे कर रही है बयानबाज़ी कर रही है पर सच्चाई कुछ अलग ही है। बेरोजगारों की फौज बढ़ते ही जा रही है रोजगार सृजन के सारे वादे फीके पड़ने लगे है वही रोजगारी दर बीते दो वर्षों के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गई है।

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आज बेरोजगारी की समस्या भारत के लिए एक दीमक की तरह ही काम कर रही है आने वाले वर्षो में अगर इस समस्या पर ध्यान न दिया गया तो यह बहुत घातक साबित हो सकती है। भारत जैसी अल्पविकसित अर्थव्यवस्था में तो यह विस्फोटक रूप धारण किये हुये है । भारत में इसका प्रमुख कारण जनसंख्या वृद्धि, पूँजी की कमी आदि है । यह समस्या आधुनिक समय में युवावर्ग के लिये घोर निराशा का कारण बनी हुई है।

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सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने हाल ही में भारत में बढ़ती बेरोज़गारी पर एक रिपोर्ट निकली है जिसमे कहा गया है की अक्टूबर में यह दर 6.9 फीसदी रही, बीते साल अक्टूबर में 40.07 करोड़ लोग काम कर रहे थे लेकिन इस साल अक्तूबर के दौरान यह आंकड़ा 2.4 फीसदी घट कर 39.70 करोड़ रह गया। यहाँ देखा जा सकता है की पिछले बीते वर्ष के मुकाबले इस वर्ष बेरोज़गारी में भारी बढ़ोतरी हुई है। बेरोज़गारी की इस बढ़ोतरी और युवाओ की बेरोज़गारी के लिए आप किसपर ऊँगली उठाओगे।

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इससे पहले भी अंतररष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी अपनी एक रिपोर्ट में देश में रोजगार के मामले में हालात बदतर होने की चेतावनी दी थी। अंतररष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार सरकार कुछ ऐसे नीतियों पर ध्यान नहीं दे रही जिससे रोजगार की समस्या पर कुछ नियंत्रण पा सके। वही इसके विपरीत सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बीते चार वर्षों के दौरान रोजाना साढ़े पांच सौ नौकरियां खत्म हुई हैं।

सरकार नौकरियों के लिए फॉर्म भरवाती है पर बेरोज़गार युवाओ के आगे यह कुछ सरकारी पद और नौकरिया फीकी पड़ जाती है। हम इसी बात से अंदाज़ा लगा सकते है की यदि किसी सरकारी नौकरी के लिए 500 लोगो की आवश्यकता है तो उस पद के आवेदन देने वाले युवाओ की संख्या लाखो-करोड़ो जाती है। उन युवाओ की सुध लेने वाला कोई नहीं है।

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समीर मंडल कोलकाता की एक निजी कंपनी में बीते 22 साल से काम कर रहे थे। समीर की उम्र अब 52 साल के लगभग है लेकिन बीते साल जून में एक दिन अचानक कंपनी ने खर्चों में कटौती की बात कह कर उनकी सेवाएं खत्म कर दीं। समीर की अचानक नौकरी चले जाने से इसका असर समीर ही नहीं बल्कि परिवार के सभी छह लोगो पर पड़ा है अभी उनके बच्चे छोटे-छोटे है। महीनों नौकरी तलाशने के बावजूद जब उनको कहीं कोई काम नहीं मिला तो मजबूरन वह अपनी पुश्तैनी दुकान में बैठने लगे समीर कहते हैं, “इस उम्र में नौकरी छिन जाने का दर्द क्या होता है, यह कोई मुझसे पूछे. वह तो गनीमत थी कि पिताजी ने एक छोटी दुकान ले रखी थी. वरना भूखों मरने की नौबत आ जाती.”

समीर जैसे ऐसे कई लोग है जिनकी नौकरी एकदम से चली गई जीवन छीन-भिंन सा हो गया। किराये की माकन में रहना, बच्चो की पढाई सबका बोझ एकदम से जीवन में उलझने पैदा कर देता है जिससे व्यक्ति मानसिक रूप ने कमजोर पड़ने लगता है।

नोटबंदी के बाद हुई रोजगार में कटौती

सीएमआईई ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि दो साल पहले हुई नोटबंदी के बाद रोजगार में कटौती का जो सिलसिला शुरू हुआ था वह अब तक नहीं थमा है। नोटेबंदी के दौरान पैसो की किल्लत के कारन ना जाने कितने लघु उद्योग समाप्त से हो गए लोग बेरोजगार हो गए। इस दौरान भारत की श्रम सहभागिता दर 48 फीसदी से घट कर तीन साल के अपने निचले स्तर 42.4 फीसदी पर आ गई है। रिपोर्ट में बेरोजगारी दर में इस बढ़ोतरी को अर्थव्यवस्था व बाजार के लिए खराब संकेत करार दिया गया है।

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रिपोर्ट के मुताबिक, सक्रिय रूप से नौकरी तलाशने वाले बेरोजगारों की तादाद बीते साल जुलाई के 1.40 करोड़ के मुकाबले दोगुनी बढ़ कर इस साल अक्तूबर में 2.95 करोड़ पहुंच गई. बीते साल अक्तूबर में यह आंकड़ा 2.16 करोड़ था.

बेरोजगारी के अभी तक जितने भी सर्वे किये गए है भारत की बेरोज़गारी के आंकड़े अलग-अलग आये है लेकिन एक बात जो सबमें समान है वह यह कि इस क्षेत्र में नौकरियों में तेजी से होने वाली कटौती की वजह से हालात लगातार बदतर हो रहे हैंसंगठन ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि एशिया प्रशांत क्षेत्र में नौकरियों की तादाद जरूर बढ़ी है लेकिन इनमें से ज्यादातर की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं हैं। संगठन ने कहा था कि सबसे ज्यादा मुश्किलें 15 से 24 आयु वर्ग के युवाओं के लिए हैं. इस आयु वर्ग के युवाओं में 2014 में बेरोजगारी दर 10 फीसदी थी जो 2017 में 10.5 फीसदी तक पहुंच गई।

बेरोजगारी विशेषज्ञों की राय

वही बेरोजगारी की समस्या देख विशेषज्ञों के भी पसीने छूटने लगे है उनका कहना है की नोटबंदी के बाद अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर की वजह से खास कर निजी क्षेत्रों में नौकरियों में बड़े पैमाने पर कटौती हुई है जिसके कारण यह बेरोजगारी बढ़ेगी और आने वाले कुछ वर्षो तक इसमें बढ़ोतरी का अनुमान लगाया जा सकता है। सरकारी नौकरियों में भी पहले की तरह बहालियां नहीं हो रही हैं। देश मे हर साल सैकड़ों की तादाद में खुलते कालेजों से पढ़ कर निकलने वाले युवाओं की भीड़ बढ़ती जा रही है पर नौकरी के नाम पर कुछ है ही नहीं।

विशेषज्ञ डा. मोहन लाल दास कहते हैं, “हर साल लगभग सवा करोड़ नए लोग रोजगार की तलाश में उतरते हैं, लेकिन मांग के मुताबिक नौकरियां पैदा नहीं हो रही हैं। यही वजह है कि चपरासी की नौकरी के लिए भी डॉक्टर, इंजीनियर और पीएचडी करने वाले युवा आवेदन देते हैं.” अगर ऐसा ही चलता रहा तो भारत देश एक ऐसे खाई में चला जायेगा जहा से निकलना उसके लिए नामुमकिन सा हो जायेगा।

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