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हाईकोर्ट ने योगी सरकार को लगाई फटकार, योगी आदित्यनाथ पर चल सकता है केस

 

इलाहाबाद। इलाहाबाद हाईकोर्ट की तरफ से यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मुश्किलें बढ़ गई हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी आदित्यनाथ पर मुकदमा चलाने की मंजूरी दिए जाने से इंकार के यूपी सरकार के फैसले के खिलाफ दायर याचिका को सुनवाई के लिए मंजूरी दे दी है। हाईकोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने सरकारी वकील का ये तर्क खारिज कर दिया कि मुख्य आरोपी राज्य का सीएम बन चुका है इसलिए अब उस पर केस नहीं चलाया जा सकता।


खास बातें-

  1. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को लगाई फटकार
  2. योगी आदित्यनाथ पर चल सकता है मुकदमा
  3. साल 2007 में गोरखपुर में हुआ था सांप्रदायिक दंगा
  4. योगी आदित्यनाथ और मोहनदास अग्रवाल हैं आरोपी

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, साल 2007 में गोरखपुर में हुए सांप्रदायिक दंगे में यूपी के सीए योगी आदित्यनाथ आरोपी रह चुके हैं। यूपी सरकार की ओर से इसी साल चार मई को मुकदमा चलाने की अनुमति दिए जाने से इंकार किए जाने के खिलाफ दाखिल अर्जी पर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच नौ अगस्त को सुनवाई करेगी।


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दरअसल साल 2007 की 27 जनवरी को गोरखपुर में सांप्रदायिक दंगा हुआ था। दंगे में अल्पसंख्यक समुदाय के दो लोगों की मौत हुई थी, जबकि कई लोग घायल हुए थे। आरोप है कि दंगा तत्कालीन बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ, विधायक राधा मोहन दास अग्रवाल और उस वक्त की मेयर अंजू चौधरी द्वारा रेलवे स्टेशन के पास भड़काऊ भाषण देने के बाद भड़का था। विवाद मुहर्रम पर ताजिये के जुलूस के रास्तों को लेकर था।


http://www.youtube.com/watch?v=EDuhSP_Q_P0

इस मामले में योगी आदित्यनाथ समेत बीजेपी के कई नेताओं के खिलाफ सीजेएम कोर्ट के आदेश पर एफआईआर दर्ज हुई थी। एफआईआर में कई दूसरी गंभीर धाराओं के साथ ही सांप्रदायिक आधार पर समाज को बांटने की आईपीसी की धारा 153 A भी शामिल थी। क़ानून के मुताबिक़ 153 A के तहत दर्ज केस में केंद्र या राज्य सरकार की अनुमति के बाद ही अदालत में मुक़दमे की सुनवाई शुरू होती है।

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इस मामले में सोमवार को हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान यूपी सरकार की खूब फजीहत हुई। अदालत ने यूपी सरकार के एडवोकेट जनरल को महत्वपूर्ण और गंभीर मामले में अदालत में न हाजिर रहने पर भी फटकार लगाई। पिछले हफ्ते हाई कोर्ट की पीठ ने कहा था कि जनता को कोई राहत नहीं है वाली स्थिति में नहीं छोड़ा जा सकता।

अदालत ने यूपी सरकार से पूछा था कि जब सरकार ने मुख्यमंत्री के खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत देने से इनकार कर दिया है तो याचिककर्ता के पास और क्या विकल्प रह जाता है।

सोमवार को सुनवाई के दौरान यह मुद्दा उठा कि अगर सरकार किसी के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी देने से इंकार कर दे तो क्या मजिस्ट्रेट सरकार के फैसले को दरकिनार कर मामले की सुनवाई कर सकता है या नहीं।

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यूपी के एडिशनल एडवोकेट जनरल मनीष गोयल और सरकार की तरफ से पैरवी के लिए आए सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील अजय कुमार मिश्र ने कहा कि मजिस्ट्रेट को सरकार का आदेश खारिज कर सुनवाई करने का अधिकार होता है। बहस के दौरान ही एडवोकेट जनरल राघवेंद्र सिंह बीच में खड़े हो गए और उन्होंने अपने ही सहयोगियों की दलील को गलत बताते हुए मजिस्ट्रेट को अधिकार न होने की दलील दी।

http://www.youtube.com/watch?v=wBlhRihfoWo

इस पर सुनवाई कर रहे जज भी हैरत में पड़ गए और उन्होंने पूछा कि सरकार की तरफ से वह एडिशनल एडवोकेट जनरल और सुप्रीम कोर्ट के वकील की बात को सही माने या फिर एडवोकेट जनरल की बात को। बहरहाल याचिकाकर्ता परवेज परवाज और असद हयात की ओर दाखिल अर्जी को कोर्ट ने सुनवाई के लिए मंजूर कर लिया।

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आपको बता दें कि चार मई को गृह सचिव की तरफ से सीएम योगी समेत दूसरे आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दिए जाने से इंकार किये जाने के फैसले के खिलाफ दाखिल अर्जी को कोर्ट ने सुनवाई के लिए मंजूर कर लिया। कोर्ट में यह सवाल उठाया गया कि कोई भी अधिकारी अपने सीएम के खिलाफ दंगा मामले में मुकदमा चलाने की मंजूरी देने की हिम्मत कैसे कर सकता है। मामले की सुनवाई जस्टिस कृष्ण मुरारी और जस्टिस एसी शर्मा की डिवीजन बेंच ने किया।


(संपादन- भवेंद्र प्रकाश)

 

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