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बिहार का सबसे बड़ा घोटाला आया सामने, नीतीश राज में 1000 करोड़ की हेरा-फेरी

भागलपुर। बिहार में इन दिनों राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई है। गत 26 जुलाई को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तथाकथित घोटाले के आरोप में राज्य के पूर्व-उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के इस्तीफा न देने की बात कहकर महागठबंधन से नाता तोड़ लिया और इसके अगले दिन भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना ली। हालांकि जब नीतीश कुमार ने राजद सुप्रीमो लालू यादव के साथ महागठबंधन कर 2015 का विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया था तब भी लालू यादव चारा घोटाले के आरोपी थे और सुप्रीम कोर्ट से सजायाफ्ता भी थे, लेकिन तब नीतीश कुमार ने राजनीतिक स्वार्थ की वजह से महागठबंधन के साथ जाने का फैसला किया था और राजद के साथ मिलकर सरकार बना ली थी।

खास बातें-

  1. बिहार का सबसे बड़ा घोटाला
  2. चारा घोटाले से भी बड़ा घोटाला
  3. नीतीश सरकार में 1000 करोड़ तक पहुंचा

लेकिन अब जबकि उन्होंने कथित भ्रष्टाचार के चक्कर में राजद से नाता तोड़ लिया है तो उसी समय बिहार में अब तक का सबसे बड़ा घोटाला सामने आया है। यह घोटाला है सृजन घोटाला। यह बिहार का अब तक का सबसे बड़ा घोटाला है जो नीतीश राज में तेजी से फल-फूल रहा था। आज यह घोटाला लगभग 1000 करोड़ का हो गया है। इस घोटाले में बड़े-बड़े सफेदपोशों और सरकार के लोगों की संलिप्तता की खबर सामने आ रही है।

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यह घोटाला बिहार में चर्चित पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव के चारा घोटाले से बड़ा घोटाला बताया जा रहा है। बिहार के भागलपुर जिले में एक एनजीओ ‘सृजन’ द्वारा जिला अधिकारी के फर्जी हस्ताक्षर के जरिये सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए की फर्जी निकासी की गई थी। जब मामले की जांच शुरू हुई तो अधिकारियों को पता चला कि यह निकाली 2 से 4 करोड़ का नहीं बल्कि हजारों करोड़ का है।

दरअसल जिले के तीन सरकारी बैंक खातों में सरकारी फंड देखते थे जिसे कुछ प्रशासनिक अधिकारी, बैंक कर्मचारी की मिलीभगत से महिला सहयोग समिति लिमिटेड के खातों में ट्रांसफर कर दिया जाता था।

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क्या है सृजन घोटाला
‘सृजन’ स्वयंसेवी संस्था की संचालिका मनोरमा देवी एक विधवा महिला थीं। रांची में साइंटिस्ट उनके पति अवधेश कुमार की मौत 1991 मे हो गई। वे रांची में लाह अनुसंधान संस्थान में वरीय वैज्ञानिक के रूप में नौकरी करते थे। पति की मौत के बाद मनोरमा देवी अपने बच्चे को लेकर भागलपुर चली आईं और वहीं एक किराए के मकान में रहकर अपना और अपने परिवार का पालन पोषण करने लगीं।

गरीबी से मजबूर विधवा पहले ठेले पर कपड़ा बेचने का काम शुरू किया फिर सिलाई का और धीरे-धीरे यह काम इतना बढ़ने लगा कि उसमे और भी कई महिलाएं शामिल हो गईं। कई लोगों के शामिल होने के बाद 1993-94 मे मनोरमा देवी ने सृजन नाम की स्वयंसेवी संस्था की स्थापना की। इस संस्था को बनाने के बाद मनोरमा देवी का पहचान इतना मजबूत हो गया था कि तमाम बड़े अधिकारी से लेकर राजनेता तक उनके बुलावे पर पहुंच जाते थे। मनोरमा देवी ने अपने समूह में लगभग 600 महिलाओं का स्वयं सहायता समूह बनाकर उन्हें रोजगार से जोड़ा था।

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फिर शुरू हुआ हेराफेरी का खेल
मनोरमा देवी ने सहयोग समिति चलाने के लिए सरकार के सहयोग से भागलपुर में एक मकान 35 साल तक के लिए लीज पर लिया। 35 साल के लिए मकान लीज पर लेने के बाद सृजन महिला विकास समिति के अकाउंट में सरकार के खजाने से महिलाओं की सहायता के लिए रुपए आने शुरू हो गए। जिसके बाद सरकारी अधिकारियों और बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत से पैसे की हेराफेरी होनी शुरू हुई।

लगभग 500 करोड़ से ज्यादा पैसा समिति के अकाउंट में डाल दिया गया और इसके ब्याज से अधिकारी मालामाल होते चले गए। देखते-देखते यह कार्यक्रम कई सालों तक चला और सृजन महिला विकास समिति के छह अकाउंट में लगभग करोड़ों में रुपए डालना शुरु हो गया। मनोरमा देवी की हेराफेरी के खेल में कई अधिकारियों के साथ साथ सफेदपोश लोग भी शामिल थे।

जांच के आदेश के बाद आरोपी फरार
अपनी जिंदगी की 75 साल गुजारने के बाद उसकी मौत हो गई। मनोरमा देवी की मौत के बाद उसके बेटे अमित और उनकी पत्नी प्रिया ने महिला समिति का कामकाज देखना शुरू कर दिया। जब इस मामला का पर्दाफाश हुआ दोनों कहीं फरार हो गए फिलहाल पुलिस उनकी तलाश कर रही है। 1995 से लेकर 2016 तक चले इस घोटाले में हजार करोड़ रुपए की हेराफेरी की बात बताई जा रही है। विभाग के अधिकारियों द्वारा मामले की जांच पड़ताल की जा रही है और जल्द ही इस मामले में सभी को बेनकाब करने की बात बताई जा रही है।

 

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