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मीडिया ने हिंसा के बाद कोरेगांव शौर्य दिवस को दे दिया अंग्रेजों की जीत के जश्न का रूप

people with saffron flags attack dalits to bhima koregao

नई दिल्ली. भीमा कोरेगांव में अंग्रेजों की महार सेना के पराक्रम का शौर्य दिवस मनाने गए दलितों की गाड़ियों पर भगवा ब्रिगेड ने हमला कर दिया और जमकर तांडव किया. बताया जा रहा है कि इस हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हो गई. दलितों के शौर्य दिवस पर व्यवधान डालने के लिए मनुवादी भगवा ब्रिगेड पहले से ही आपत्ति जता रहा था. इस मामले की कड़ी आलोचना की जा रही है. मीडिया यहां हुई हिंसा को अंग्रेजों की जीत के जश्न का कारण बता रहा है.

केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने इस मामले पर जांच की मांग की है. उन्होंने कहा कि मैंने इस मुद्दे पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से बातचीत कर इस मामले की जांच की मांग की है. अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि ऐसी घटनाएं फिर से न हो. इस मामले की शरद पवार ने निंदा की है. उन्होंने इस मुद्दे पर कहा कि लोग वहां पिछले 200 सालों से जा रहे हैं. पहले कभी ऐसा नहीं हुआ. यह उम्मीद थी कि 200वें वर्षगाठ के कार्यक्रम में ज्यादा लोग आएंगे. इस मामले में ज्यादा ध्यान देने की जरुरत थी.

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दरअसल उस वक्त पेशवा साम्राज्य में जातिवाद चरम पर था. दलितों को थूकने के लिए गले में हांडी लटकानी पड़ती थी, पीछे झाड़ू बांधनी पड़ती थी. उस वक्त ब्राह्मण साम्राज्य के सताए हुए दलितों ने अंग्रेजों की सेना ज्वाइन कर ली थी. उसके बाद 1818 में महारों की सिर्फ 500 लोगों की सेना ने कोरेगांव में भीमा नदी के किनारे पेशवा की 28000 सेना को धूल चटा दी थी. इसके बाद से यह दिन शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाता है. इसको अंग्रेजों की जीत के उद्देश्य से नहीं बल्कि ब्राह्मणों के जातिवाद की हार के रूप में मनाया जाता है. लेकिन कुछ समय से यहां ब्राह्मण समुदाय इसे मराठाओं की हार के रूप में दिखाने का रूमर फैला रहा है. यह दलितों और मराठाओं को लड़ाने की साजिश है जिसमें वे कामयाब होते दिखाई दे रहे हैं. दरअसल मराठा ओबीसी श्रेणी में भी आते हैं ऐसे में दलित और ओबीसी को लड़ाने की चाल चली जा रही है.

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