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नीत्शे के घर मार्क्स पधारे आनंद है ! आनंद है!

Created By : जगदीश्वर चतुर्वेदी Date : 2016-07-28 Time :


नीत्शे के घर मार्क्स पधारे आनंद है ! आनंद है!

आज जब नामवरजी संघ आयोजित कार्यक्रम में  इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र जाएंगे तो सचमें इतिहास रचेंगे ! आज वे नीत्शे से मिलेंगे! यह उनके द्वारा स्थापित नीत्शे परंपरा का महान पर्व का दिन है ! इसके बाद वे हमेशा के लिए अशांति और उन्माद के हवाले हो जाएंगे।मार्क्स की कसम खाने वाले आज गोगुंडों के संरक्षकों के सामने गऊ दिखेंगे ! उनकी´नैतिकता´ एकदम मरियल आवारा गाय की तरह होगी।जो इधर-उधर मुँह मारकर अपना जीवन-यापन करती है और अंत में कसाई के हाथों मोक्ष प्राप्त करती है।  

जिनके खिलाफ अनेक किस्म की हत्याओं,कलाओं,कलाकारों,सांस्कृतिक रूपों,संविधान के अपमान आदि  के असंख्य ठोस पुख्ता सबूत हों,उस संगठन के लोगों के बीच जन्मदिन मनाते हुए बस एक ही नारा गूंजेगा ´तुम महान जयश्रीराम´! सब कुछ ´उल्लासमय´ होगा !एकदम नए किस्म की ऑडिएंस होगी ! यह दृश्य एकदम फिल्मी होगा ! वर्चुअल होगा!   वर्चुअल में नीत्शे के घर मार्क्स पकवान खाने आए हैं ! नीत्शे के पकवान मार्क्स खाएं,एंगेल्स, प्लेखानोव,ब्रेख्त,एडोर्नो सब तालियां बजाएं और कहें मार्क्स तुम एक और लो !श्रोता कहें अद्भुत क्षण है!नीत्शे के हलवाई पूछें कैसे लगे मेरे पकवानॽ सब कुछ मीठा होगा ! सब कुछ  आनंदमय होगा! नामवरजी बस यही कहेंगे आनंद है! आनंद है! हम सब फेसबुक पर कहेंगे आनंद है! आनंद हैं! हम यही कहेंगे नीत्शे की जय हो!प्राणियों में सद्भावना हो,जगत का कल्याण हो हर-हर नीत्शे! आज का दिन नीत्शे का दिन है!शर्म का दिन है!  

बड़ी विलक्षण बात है साहित्यकार की नैतिकता की जिस दौर धज्जियां उड़ायी जा रही हों उसी दौर में साहित्यकार की अनैतिकता पर कोई बड़ा विमर्श हिन्दी में नहीं चला।हिन्दी में लेखकगण मनमाने ढ़ंग से इस मामले में पैमाने बनाते रहे और अपने को वैध ठहराते रहे।साहित्यकार की एक होती ´नैतिकता´और दूसरा होता है उसका  ´राजनीतिक नजरिया´ इन दोनों के सहमेल से साहित्यकार की साहित्य शक्ति,व्यक्तित्व और संस्कृति निर्मित होती है।हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं।नामवरजी इस मामले में सबसे ज्यादा विवादास्पद हैं। साहित्यकार की राजनीतिक नैतिकता के मामले में नामवरजी मार्क्सवादियों की परंपरा की बजाय नीत्शे के करीब दिखाई पड़ते हैं।  

मार्क्सवादीके लिए ´सत्य´प्रमुख है। वही उसकी ´नैतिकता´का मूलाधार है।इसके विपरीत नामवरजी के लिए सत्य नहीं ´मैं´प्रमुख है।वे अपने इर्द-गिर्द ही साहित्य-संसार मानते हैं,यही बीमारी नीत्शे में थी।नीत्शे की तरह ही नामवरजी भी अपने को ´साहित्य संदर्भ´मानकर देखते हैं। वे इस भ्रम के शिकार हैं कि वे जब बताएंगे तब पता चलेगा कि ´सत्य´क्या है,गोया ´सत्य´की चाबी उनके पास हो!वे नीत्शे की तरह ´स्व-संदर्भ´को पसंद करते हैं।नीत्शे की तरह नामवरजी को भ्रम है  वे ही साहित्य के जज हैं!

जिस तरह दर्शन में नीत्शे ने ´अनैतिकतावाद´ को चलाया,उसी तरह नामवरजी ने साहित्य में इस पंथ का निर्माण किया। आज जब नामवरजी राजनाथ सिंह के हाथों जन्मदिन की बधाई लेंगे,सम्मान लेंगे,तथाकथित दूसरी परंपरा पर सुनेंगे तो वे अपने समय के सबसे क्रूर गृहमंत्री के हाथों सम्मानित होंगे।नामवरजी आप ही सोचें  राजनाथ किस मनोदशा में रहते हैं और वे और उनकी बटुकमंडली किस तरह का माहौल रच रही है !

आज हम सब बौद्धिकता में क्रूरता को अभिव्यंजित होते देखेंगे। आज साहित्य और दूसरी परंपरा में आनंद को नहीं क्रूरता को अभिव्यंजित होते हुए देखेंगे।दूसरी परंपरा की श्रेष्ठ संस्कृति का जयगान कसाईयों के घर में सुनेंगे! संस्कृति,साहित्य और परंपरा का क्रूरता के साथ इस तरह मेल बैठेगा यह तो हम सबने कभी सोचा ही नहीं था ! संस्कृति को क्रूरता के गले का हार बनाकर नामवरजी आपने सचमें हिन्दी की बहुत बड़ी सेवा की है,वैसे यह अनैतिकता का चरम है लेकिन हम खुश हैं कि आप इसे आज भी अनैतिकता नहीं मान रहे !  मैं आपकी और आपके भक्तों की घृणा के शिकार होने का जोखिम उठाकर यह सब इसलिए लिखने को मजबूर हुआ हूँ क्योंकि अब चीजें असहनीय हो गयी हैं।

आप कल तक क्रूर लोगों को महान बनाते रहे हम चुप रहे,हम निश्चिंत थे कि कम से कम संस्कृति को क्रूरता से दूर रखा। लेकिन आज तो संस्कृति और क्रूरता का खुला गठबंधन होगा,संस्कृति को हम क्रूरता के वैभव में मस्त देखेंगे,क्रूरता के हाथों संस्कृति का अपहरण देखकर रवीन्द्रनाथ टैगोर कम से कम स्वर्ग में रो रहे होंगे,कि किन कातिलों के हाथ उनकी दूसरी परंपरा पड़ गयी!हमारा न सही अपने गुरूदेव का ही ख्याल कर लिय़ा होता,गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर का ख्याल कर लिया होता कि वे क्या सोचेंगे! सच में आप क्रूर हैं!परंपरा के प्रति क्रूर हैं!क्रूरता को संस्कृति के आवरण से ढ़ंकने की कला कोई आपसे सीखे।

इसी अर्थ में आप और आपकी साहित्यमंडली आज मार्क्स की बजाय नीत्शे की शरण में खड़ी दूसरी परंपरा का जयगान कर रही है !  नामवरजी आप महान हैं आपने जिस परंपरा को बनाया था उसमें धर्म और अध्यात्म के लिए कोई जगह नहीं थी लेकिन आज तो सब कुछ आध्यात्मिक होगा ,धार्मिक अनुष्ठान की तरह होगा !संवेदना,प्रेम,साहित्य आदि का आज आध्यात्मिकीकरण होगा।आज आपके साम्प्रदायिकता विरोध का भी आध्यात्मिकीकरण होगा।आध्यात्मिकीकरण की कला मार्क्स की नहीं नीत्शे की कला है।आध्यात्मिकीकरण के कारण ही शत्रु से प्रेम का प्रदर्शन देखेंगे!अब आरएसएस के प्रति जितने भी विवाद हैं ,विरोध हैं,मोदीजी के खिलाफ जितने भी विवाद और विरोध हैं उन सबका आध्यात्मिकीकरण कर दिया जाएगा। यह नीत्शे की जीत है और मार्क्स-टैगोर की पराजय का दिन है !     

(लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर हैं, ये उनके अपने विचार हैं।)


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