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विमर्श

अपनी बारी का इंतजार मत करिए, वर्ना तुम्हें बचाने वाला कोई नहीं होगा….

पहले वो यादवों को मारने आए..
मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं यादव नहीं था
फिर वो जाटवों को मारने आए..
मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं जाटव नहीं था
फिर वो पटेलों को मारने आए
मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं पटेल नहीं था
फिर वो जाटों को मारने के लिए आए
मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं जाट नहीं था
फिर वो मराठाओं को मारने आए
मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं मराठा नहीं था
फिर वे गूजरों को मारने के लिए आए
मै कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं गूजर नहीं था
फिर वे निषादों को मारने के लिए आए
मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं निषाद नहीं था
फिर वो कुशवाहाओं को मारने आए
मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं कुशवाहा नहीं था
फिर उन्होंने एक-एक करके तेली, तमौली,लोधी, कुम्हार,कहार,लोहार,सुनार,धानुक,खटीक,पासी,मांझी,बाल्मीकि आदि जातियों को मार डाला
मैं कुछ नहीं बोला…

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और अंत में वो जब मुझे मारने आए
तो मुझे बचाने कोई नहीं आया
क्योंकि वे सबको मार चुके थे।

……सोबरन कबीर

नोट : अपनी बारी का इंतजार मत करिए..जहां भी ब्राह्मण अन्याय कर रहा है …उसका प्रतिकार कीजिए…नहीं तो एक – एक करके वो सबको समाप्त कर देगा..
(लेखक पत्रकार हैं। यह कविता नेशनल जनमत से साभार ली गई है।)


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