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जियो लड़कियों…घूमों लड़कियों…उड़ो लड़कियों

अनुराधा बेनीवाल की किताब.. “आज़ादी मेरा ब्रांड “और चेतन भगत की” one indian girl” में अकेली लड़कियों का यात्रा वृतांत पढ़कर दिल में एक कसक सी उठती है….काश हम भी कर पाते ऐसी यात्रायें.. विदेश न सही, देश में ही सही.. पर तुरंत ख़्याल आता है …रे मूढ़ मन-तू भूल गया ! हम एक महान देश में पैदा हुए हैं जहाँ स्त्रियां व्यक्ति नहीं वस्तु हैं.. स्त्रियों का घूमना वो भी अकेले ?

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मध्यमवर्गीय परिवार की होने के कारण मैं केवल अपने वर्ग के घुम्मकड़ चरित्र को ही जानती हूँ.. कृपया इस पोस्ट को पढ़कर उच्च वर्ग से मुझे उदहारण न दिया जाये…..

 

हाँ हमारे वर्ग में घर वालों की सुख, शांति, सुरक्षा, तरक्की आदि के लिए स्त्रियों द्वारा दूर-दूर के देव/देवी स्थानों की मनौतियां ही पासपोर्ट का काम करती हैं… आप किसी मनौती का जिक्र भर करिये… पूरी कायनात (परिवार,पडोसी,मित्र) उसे पूरा कराने को तत्पर हो उठेगी…. पर जरा सा किसी ऐतिहासिक, प्राकृतिक जगह की यात्रा, वो भी अकेले.. का जिक्र करिये कि… लोगों की भृकुटी तो तनेगी ही साथ में उन्हें आपकी दिमागी हालत पर भी शक होने लगेगा।

 

हाँ कभी-कभार सपरिवार या एक- दो और परिवारों के साथ धार्मिक+प्राकृतिक स्थान का कॉम्बो पैक जैसी (वैष्णो देवी+हिमाचल, शिरडी+मुम्बई) यात्रा कर, फ़ोटो-शोटो खिंचा कुछ दिन जान-पहचान वालों और फेसबुक पर रौब ग़ालिब किया जा सकता है… ये यात्राएं जिसमें औरतों का अधिकतर समय चड्ढी बनियान को धुलने, सुखाने और नाश्ते खाने की चिंता में कट जाता है….

 

वैसे किया भी क्या जा सकता है साहब? एक तो कलियुग.. समय/समाज बहुत गड़बड़.. दूसरे गर्म देश, गर्म मिज़ाज़ होने के कारण यहाँ चौदह-पंद्रह साल के लड़कों से लेकर सत्तर साल तक के बूढ़ों तक के हार्मोन्स खौलते रहते हैं…. नतीजा दो साल की बच्ची से लेकर अस्सी साल की दादी तक सुरक्षित नहीं… अब अमेरिका, यूरोप वाले क्या खाकर हमारी सभ्यता की बराबरी करेंगे? उनका खून ठंडा, हार्मोन्स ठंडे सो घूम लीं अनुराधा मैडम और वन इंडियन गर्ल की राधिका मैडम….


 

हम महान सभ्यता के वाहक… हमारे यहाँ तो सहेली के घर जाते समय भी पांच साल का भतीजा, या दस साल का भाई सुरक्षा के लिए साथ जाता है.. जो लड़कियां इस सभ्यता-संस्कृति को नहीं मानेंगी उनका हाल दिल्ली की निर्भया की तरह तो होगा ही… या ज्यादा बोलेंगी तो गुरमेहर की तरह सोशल मीडिया पर ही हार्मोन्स उड़ेल देंगे…

 

फिर भी साहब ग़ज़ब की लड़कियां हैं इस देश में…. हर साल बोर्ड में टॉप करेंगी… लड़की होने का फायदा उठा सिविल सेवाओं में भी टॉप करेंगी.. विधर्मी से शादी करेंगी…

 

कौन तो दो लड़कियां हैं… जुड़वा.. जो संसार की हर चोटी फतह कर रहीं… कौन तो अरुणिमा सिन्हा हैं.. एक पैर से ही हर ऊंचाई को क़दमों में झुका रहीं.. और कौन तो लड़कियां हैं… जो ओलम्पिक में मेडल ला रहीं, वो भी खालिस मर्दों वाले खेल में… और हमारे लड़के? बेचारे आई.पी.एल, सनी लियोनी, बाइक, कार, आई फ़ोन और अगर इससे भी फुरसत मिले तो रेप वो भी गैंग रेप में बिजी हैं…

 

जियो लड़कियों… घूमों लड़कियों… उड़ो लड़कियों मूढ़ मन-तू भूल गया ! हम एक महान देश में पैदा हुए हैं जहाँ स्त्रियां व्यक्ति नहीं वस्तु हैं.. स्त्रियों का घूमना वो भी अकेले?

 

 

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