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विमर्श

टोपी-दाड़ी, और बुर्का भी भारतीय विविधता!

यक़ीनन भारत को दुनियाभर में अलग-अलग विविधताओं के लिये जाना जाता रहा है। मगर दुख की बात ये है कि अब इसी पहचान ने देश के सामने कई सवाल खड़े कर दिये हैं और उनमें से एक सवाल ये भी है कि देशभर में टोपी-दाड़ी रखने और बुर्का पहनने वाले नागरिक सकते में हैं और कहीं न कहीं चिंताओं से घिर रहे हैं।

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बात चाहे राजस्थान के अलवर में पहलू के साथ हुई शर्मनाक वारदात की हो या फिर हाल ही में उत्तर प्रदेश के बिजनौर में एक महिला के साथ चलती रेल में बलात्कार की। या फिर बात हो हरियाणा के मेवात जिले के डिंगरहेड़ी कांड की, जहां पर मां-बेटी के साथ बलात्कार और दंपती की हत्या की। ये घटनाएं ऐसे समय और जगह पर हुई हैं जहां सभी प्रदेशों में भाजपा की सरकार है।

पहलू के परिवार का आरोप है कि उनको इसीलिये पीट-पीटकर मारा गया है क्योंकि वह मुसलमान था और उसने कुर्ता पहना हुआ था, इसी तरह बिजनौर रेप कांड में भी यही बात सामने आ रही है कि महिला को बुर्का की वज़ह से ही अपनी इज्जत गंवानी पड़ी थी।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में इंग्लिश लिटरेचर में पीएचडी कर रहे जमशेद अहमद से जब यही सवाल हमने पूछा तो उनका कहना थ कि अब महसूस हाने लगा है, क्योंकि जब भी यूनिवर्सिटी से घर जाते हैं तो रेल में लोग कमेंट करते हैं, बस में घूरते हैं।

इसी तरह जामिया हमदर्द के छात्र रहे अतीकुर्रहमान ने भी कहा कि मुस्लिम इलाकों के अलावा सभी जगह लोग अजीब तरह से व्यवहार करते हैं, एक बार दिल्ली कैंट में काफी पूछताछ हुई थी, जबकि मेरे साथी से कुछ खास पूछताछ नहीं की, क्योंकि उसकी दाड़ी नहीं थी।


हरियाणा के पलवल जिले की रूकसीना ने दसवीं ओपन में प्रदेशभर में अव्वाल स्थान हासिल किया है, रूकसीना के परिजनों का कहना है कि माहौल सही नहीं है इसलिये घर से ही पढ़ाई करा रहे हैं।

नाम न बताने की शर्त पर दिल्ली यूनिवर्सिटी में लॉ की पढ़ाई कर रहे एक मुस्लिम छात्र ने बताया कि जब भी भारत-पाकिस्तान का मैच होता है तो हॉस्टलों के कॉमन हॉल में कोई भी सुन सकता है वो गालियां दी तो पाकिस्तान के नाम से जाती हैं, मगर उनका इशारा तमाम मुसलमनों की तरफ होता है। छात्रों को मामूली सी कहासुनी पर मुल्ला कहना तो अब आम बात हो गई है।

एक सवाल के जवाब में एक ट्रक ड्राइवर ने हैरान करने वाली बात बताई कि अब तो पुलिस भी मुस्लिम वाहनों की पहचान करती है और जिस वाहन पर खुदा हाफिज 786 लिखा होता है, उसको बेमतलब भी रूकवाती है और काग़ज पूरे होने के बावजूद भी चालान करती है। कई बार तो पुलिस कहती है कि हमें तो चालान करने से मतलब है, हमें भी तो उपर हिसाब देना पड़ता है।

तो ऐसे में सवाल यही है कि क्या वास्तव में भारतीय विविधता खतरे में है, या जान बूझकर कुछ लोग इस विरासत को नुकसान पहुंचा रहे हैं। मगर फिर प्रश्न यह भी उठेगा कि ऐसे माहौल से निपटने के लिये सरकार क्या कदम उठा रही है, क्योंकि जिस तरह से घटनायें रूकने का नाम नहीं ले रही हैं, उसे देखते हुए तो लोग यही कह रहे हैं कि सरकार की मिलीभगत से सबकुछ हो रहा है।

इंडोनेशिया के बाद विश्व में सबसे ज़्यादा मुसलमान भारत में रहते हैं, और एक अनुमान के अनुसार यह तादाद 25 करोड़ के ऊपर है। अगर देश की इतनी बड़ी जनसंख्या परेशान है और मौजूदा सरकार के रवैये से खुश नहीं हैं तो यह मोदी के लिये तो नहीं मगर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिये ज़रूर खतरा है। और निश्चित तौर पर यह सवाल खुद संविधान से भी है जो कि सभी नागरिकों को बराबरी के अधिकारों के साथ-साथ सुरक्षा की गारंटी की दुहाई देता रहा है। इस वातावरण पर सभी हाईकोर्टस भी मंथन कर सकते हैं, सुप्रीम कोर्ट के साथ।

(जुबेर डेम्रोत जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी के छात्र हैं।)

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