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विमर्श

मैं एक मुसलमान औरत हूं और मेरी तमन्ना है कि…

मैं एक मुसलमान हूँ और हिंदुस्तान के एक गाँव, एक कसबे,एक ज़िला, एक शहर में रहती हूँ मैं कहना चाहती हूँ …..
मुझे तीन वक़्त की रोटी से पहले ..
मुझे चौड़ी सड़कों से पहले …
मुझे एक मजबूत तरक़्क़ी याफ़्ता दुनियाँ से पहले ..
मुझे आधुनिक शिक्षा से लबरेज़ स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी से पहले ..
मुझे बेहतरीन इलाज के लिए हस्पतालो से पहले ..
मुझे गैस, पानी और बिजली की सहूलियत से पहले …
मुझे एक तरक़्क़ी याफ़्ता मुल्क़ की बाशिन्दा बनने से पहले …
मुझे पक्के मकान और बेहतरीन नौकरी से पहले ..
मुझे अल्लाह का उतरा हुआ वो निज़ाम चाहिए, जिसमें किसी हाकिम और एक ग़रीब के बेटे के चोरी पर एक जैसे हाथ काटे जाएं..
मैं क़ुरान और सुन्नत के उस कानून की कल्पना करती हूँ जिसमे मेरे देश में किसी ग़रीब का बच्चा रात को भूखा न सो सके …
मैं ख़्वाब देखती हूं उस महान शान्ति दूत हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का लाया हुआ वो क़ानून का जो ताकतवर और कमज़ोर क़ातिल का सर एक ही तलवार से उड़ाने की ताकत रखता हो ….

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मुझे तीन वक़्त के बजाए दो वक़्त की रोटी मिले मगर मेरे देश की गरीब बेटियाँ किसी जिश्म फ़रोशी की मंडी में अपनी चादर न बेचें ..
मेरे कच्चे मकान का छत आधा गिरा हुआ हो मगर मेरे देश में किसी ग़रीब मज़लूम की आहें अल्लाह के अज़ाब को इस देश की तऱफ मोतवज्जो न कर दे ..
मेरे घर का दरवाजा बेशक़ उखड़ा हुआ हो मगर मेरे देश की बेटियों की अज़्मतें महफूज़ हो…

(यह आर्टिकल जेबा तजमीन की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है।)


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