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स्तनपान की कुंठा पर अनुराधा सरोज का जबरदस्त लेख

पिछले हफ़्ते एक कॉलीग अपनी बेटी को ऑफ़िस लाई थी। काम कर रही थी, बीच बीच में दूध पिलाती थी। कॉन्फ़्रेन्स कॉल के वक़्त दूसरा कॉलीग बच्ची को बाहर टहलाने ले गया। मैं अपनी नई-नई माँ बनी दोस्त को देखती हूँ, तो लगता है के पूरा दिन वो बस दो साँस अपने लिए ले सके तो काफ़ी है, और अब मटर्निटी लीव ख़त्म होने को आई है।


सब ऑफ़िसों में बच्चें नहीं ले जा सकते। मटर्निटी लीव ऐसे दिया जाता है जैसे कोई बड़ा अहसान किया जा रहा हो। अब ख़ुद से बहस है के नौकरी करे या बच्ची संभाले? लेकिन नौकरी छोड़ पाने की लक्शरी सबके पास नहीं होती। नौकरी सिर्फ़ करीयर नहीं होती, अधिकतर ज़रूरत होती है।

बच्चों को इस तरह ऑफ़िस लाया जा सके और थोड़ा काम और लोग बाट लें तो आसान लगता है। क्या है बच्चें पालना दुनिया को पता भी चलता है! घर बैठ के सदियों से औरतें बच्चें पालती आई हैं, बिना कोई मेहनताना लिए। और फिर सुनती हैं, “तुम पूरा दिन घर में करती क्या हो?”


जब मैंने पूछा के ये फ़ोटो शेयर कर दूँ तो उसका जवाब था, “बिलकुल!”
नोर्मलाइस ब्रेस्ट फ़ीडिंग। नोर्मलाइस ह्यूमन बिहेव्यर।  Anuradha Saroj

(PC- अनुराध सरोज की फेसबुक वॉल से)



–  अनुराधा सरोज समाजसेवी  हैं और बालिकाओं की शिक्षा के लिए ‘जियो बेटी’ नामक संस्था चलाती हैं। इनकी आजादी मेरा ब्रांड  नामक पुस्तक धूम मचा चुकी है।

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