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पंडावाद के दिमागी गुलाम भेड़ियों ने ले ली बूढ़ी विधवा की जान

इस सच की कल्पना कीजिए कि आपकी या मेरी बासठ साल की बूढ़ी मां शौच के लिए बाहर निकली, रास्ता भटक कर दूसरे मुहल्ले में चली गई… और वहां रात के अंधेरे में लोगों ने सफेद साड़ी वाली इस औरत को डायन बता कर लाठी-डंडों से मारना शुरू किया और मारते-मारते मार डाला।

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यह कल्पना करते हुए कैसा महसूस हो रहा है? लेकिन मैंने यह केवल कल्पना के लिए नहीं कहा, मान देवी के साथ यह तब हुआ है जब हमारे देश में मंगलयान की वैज्ञानिक कामयाबी का चालीसा गाते हुए काफी समय हो गए। जी, लेकिन ताजा घटना 2017 के जुलाई महीने में हुई।

हम अभी तक इतना ही असभ्य, अविकसित दिमाग वाले जॉम्बियों का समाज हैं, हमारे देश का कानून किसी पंडे के हाथों में पड़ा कराह रहा है, जहां खुलेआम ओझा-तांत्रिक, बाबा-साध्वियों वगैरह अपराधियों को अंधविश्वासों का नंगा खेल खेलने की इजाजत मिली हुई है।

मान देवी का कसूर बस यही था कि वे बूढ़ी थीं, विधवा थीं, इसलिए उन्हें सफेद कपड़ा पहनना था, और रात में शौच के लिए बाहर जाना था। और फिर वे पंडावाद के दिमागी गुलाम भेड़ियों के मानस में जी रहे लोगों के बीच में फंस गईं, जिन्होंने उन्हें लाठी-डंडों से तब तक मारा, जब तक उनकी जान नहीं निकल गई।

एक ओर अफवाहबाज संघियों-भाजपाइयों के गिरोह चारों ओर लोगों को अंधविश्वासों के अंधेरे कुएं में धकेल रहे हैं, दूसरी ओर लोगों के पास इतना दिमाग नहीं है कि वे महिलाओं के बाल काटने को किसी आपराधिक घटना के तौर पर देखें, न कि इसे भूत टाइप मान कर चमत्कार मानें। जो गिरोह समूचे देश में पत्थर की मूर्तियों को दूध पिला सकता है, तो बालकटवा टाइप फर्जीवाड़ा भी रच सकता है।


इससे पहले भाजपा के एक नेता संजय पासवान ने मानव संसाधन राज्यमंत्री रहते हुए पटना में ओझा-तांत्रिक, डायन का सम्मेलन करवाया था। डायन बता कर मार डाली जाने वाली तमाम महिलाओं का अपराधी ओझा-तांत्रिकों के साथ न केवल संजय पासवान, बल्कि ‘एक थी डायन’ बनाने वाली एकता कपूर और विशाल भारद्वाज भी बराबर के अपराधी हैं।

(अरविंद शेष वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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