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संघ के बाद भाजपा के दूसरे शक्ति श्रोत राम मंदिर के बहाने सक्रिय हो रहे हैं

आमतौर पर लोग अप्रतिरोध्य बनकर उभरी भाजपा की शक्ति के प्रमुख स्रोत के रूप में डॉ. हेडगेवार द्वारा स्थापित आरएसएस को ही चिन्हित करते हैं, जो गलत भी नहीं है। किन्तु हरि अनंत हरि कथा अनंता की भांति भाजपा की शक्ति के स्रोत भी अनंत हैं और संघ के बाद इसके दूसरे प्रमुख शक्ति के स्रोत में नजर आते हैं, वे साधु-संत जिनका चरण-रज लेकर देश के पीएम-सीएम और राष्ट्रपति-राज्यपाल तक खुद को धन्य महसूस करते रहे हैं। मंडलोत्तर काल में गृह-त्यागी व अपार शक्तिसंपन्न प्रायः 90 प्रतिशत इसी साधू समाज का आशीर्वाद भाजपा के साथ रहा है। अगर साधु-संतों के प्रबल समर्थन से भाजपा पुष्ट नहीं होती, अप्रतिरोध्य बनना शायद उसके लिए दुष्कर होता।

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बहरहाल जिन संतों ने भाजपा को अप्रतिरोध्य बनने में अबतक बड़ा योगदान दिया, वे एक बार उसके राम मंदिर निर्माण अभियान में योगदान करने के लिए फिर सक्रिय हो उठे हैं, इसका अनुमान अयोध्या में राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए पत्थरों की नई खेप आने से उनमे बढ़ी सरगर्मियों से लगाया जा सकता है। विवादित इमारत में रामलला की मूर्ति रखने के आरोपी रहे अभिरामदास के शिष्य एवं उत्तराधिकारी महंत धर्मदास ने पत्थरों की नयी खेप पहुंचने से उत्साहित होकर कहा है, ‘पत्थरों की आवक अत्यंत उत्साहजनक है और इससे जाहिर होता है कि मंदिर निर्माण की तैयारियां पुख्ता हैं। पूरा विश्व राम जन्मभूमि पर मंदिर का निर्माण चाहता है और उन्हीं लोगों को आपत्ति है, जो राजनीतिक और वैयक्तिक स्वार्थ की वजह से मंदिर का विरोध कर रहे हैं।’

वहीं इस पर राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष एवं शीर्ष पीठ मणिरामदास जी की छावनी के महंत नृत्यगोपालदास ने अपनी ख़ुशी जाहिर करते हुए कहा है, ‘केंद्र में मोदी एवं प्रदेश में योगी की सरकार होने से मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ हुआ है और प्रबल उम्मीद है कि राम मंदिर का निर्माण अति शीघ्र शुरू होगा। लेकिन साधु-संत राम मंदिर निर्माण में अपनी भूमिका अदा करने का मन बना चुके हैं, इसका बेहतर संकेत रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष एवं शीर्ष पीठ मणिराम दास जी की छावनी के महंत नृत्यगोपाल दास के 79 वें जन्मोत्सव के अंतिम दिन छावनी परिसर में आयोजित संत सम्मलेन में ही देखने को मिल गया था।

वह सम्मलेन यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के 31 मई की चर्चित व विवादित अयोध्या यात्रा के ठीक एक सप्ताह बाद आयोजित हुआ था। उसका संचालन रामकुंज के महंत डॉ।रामानंददास एवं अध्यक्षता जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद ने किया था जिसमें भाजपा के नेता सुब्रह्मणयम स्वामी, केंद्र सरकार के पूर्व गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानन्द, मंदिर आन्दोलन को धार दे चुकीं विदुषी ऋतंभरा, रसिक पीठाधीश्वर महंत जन्मेजय शरण, अयोध्या संत समिति के अध्यक्ष महंत कन्हैयादास, रामायणी रामशरणदास, मध्य प्रदेश के मंत्री एवं बजरंग दल के पूर्व राष्ट्रीय संयोजक जयभान सिंह पवैया ने भी विचार रखे थे। लेकिन उक्त सम्मलेन जिनके भाषण में संतों की भावना का सम्पूर्ण प्रतिबिम्बन हुआ, वह थे विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष डॉ. प्रवीण तोगड़िया।

तोगड़िया ने राम मंदिर निर्माण में मोदी सरकार की ढिलाई पर निशाना साधते हुए कहा था, ‘राम जन्मभूमि पर राम मंदिर और देश में रामराज्य चाहिए।’ उन्होंने अयोध्या में ढांचा ध्वंस मामले में वरिष्ठ भाजपा नेताओं को साजिशकर्ता बताये जाने पर रोष प्रकट करते हुए आगे कहा था कि ‘मौजूदा सरकार के अधीन काम करने वाली संस्था सीबीआई ने कैसे अपने आरोपपत्र में आडवाणी, ऋतंभरा, विनय कटियार जैसे मंदिर आन्दोलन के नायकों को साजिशकर्ता बताया! सीबीआई न्यायालय में एडीशनल चार्ज शीट प्रस्तुत कर बताये कि ध्वंस में मंदिर आन्दोलन से जुड़े नेताओं ने कोई साजिश नहीं की। ध्वंस की साजिश में कोई हिन्दू नेता जेल गया तो माना जायेगा कि देश में एक भी हिन्दू सुरक्षित नहीं है।’ लेकिन उनका असल संदेश यह था-‘राम मंदिर निर्माण का एक ही रास्ता है कि सरकार कानून पारित करे। राज्यसभा में सरकार के पास बहुमत नहीं है तो, संसद का संयुक्त अधिवेशन आहूत किया जाय। आपसी सहमति के लिए वार्ता करने की सलाह उसी तरह है कि बाप के हत्यारे से समझौते का सुझाव दिया जाय। राम तो हमारे बाप के बाप हैं, उनका मंदिर तोड़ने वालों क़ी वकालत करने वालों से बात-चीत संभव नहीं। राम जन्मभूमि जमीन का टुकड़ा या कोई भवन का सवाल नहीं है, बल्कि यह सौ करोड़ लोगों की श्रद्धा का विषय है और इसका निर्धारण न्यायालय नहीं कर सकता!’


बहरहाल तोगड़िया के उपरोक्त भाषण को, योगी के नेतृत्व में राम मंदिर निर्माण के नए अभियान का जो आगाज हो रहा है उसमें, साधु-संतों की नयी भूमिका से जोड़कर देखने से भिन्न कोई उपाय नहीं है। यह साफ़ दिख रहा है कि संघ व भाजपा से जुड़े तमाम लेखक-पत्रकार, धन्ना सेठ और मीडिया राम मंदिर निर्माण में अपना-अपना योगदान देने के लिए तत्पर हो गए हैं। ऐसे में उसके स्वाभाविक संगी संत ही पीछे क्यों रहते। लिहाजा मौका माहौल देखकर संतों ने भी भाजपा नेतृत्व को आश्वस्त कर दिया है। बहरहाल यह काबिले गौर है कि संघ के राजनीतिक संगठन भाजपा की मुख्य राजनीतिक रणनीति हिन्दू धर्म-संस्कृति के उज्जवल पक्ष के गौरवगान तथा अल्पसंख्यक, विशेषकर मुस्लिम विद्वेष का प्रसार है, जिसके लिए वह मुख्यतः गुलामी के प्रतीकों के उद्धार का अभियान चलाती है। ऐसा करने के क्रम में उसे हिन्दू धर्म संस्कृति को गौरवान्वित करने व आक्रान्ता के रूप में मुसलमानों के खिलाफ विद्वेष प्रसार का अवसर मिल जाता है। इस अभियान के साथ आमजन का जुड़ जाना उतना विस्मित नहीं करता। किन्तु जो साधु-संत दिन-रात जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्य का उपदेश देते हैं, उनका गुलामी के प्रतीकों के उद्धार अभियान में भाजपा से सोत्साह जुड़ जाना जरुर विस्मित करता है।

बहरहाल साधु-संतों का गुलामी के प्रतीकों की मुक्ति अभियान से जुड़ना इतिहास का एक बड़ा परिहास ही कहा जायेगा। कारण, इन्ही संतों के पूर्ववर्तियों ने जाति-व्यवस्था का निर्माण कर देश को इतना कमजोर कर दिया कि मुट्ठी-मुट्ठी भर विदेशी आक्रान्ताओं को इस देश को लूट का निशाना बनाने में कभी दिक्कत ही नहीं हुई। इनके पूर्ववर्तियों द्वारा बहुजनों के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई की अधिकतम संपदा देवालयों में जमा करने और उन देवालयों को वेश्यालयों में परिणित करने के कारण ही मुसलमान आक्रमणकारी हमला करने के लिए ललचाये, जिससे शुरू हुआ गुलामी का सिलसिला।

परवर्तीकाल में मुसलमान और अंग्रेज शासकों ने भवनों, सड़कों, रेल लाइनों, शिक्षालयों, अस्पतालों और कल-कारखानों इत्यादि के रूप में भारत के चप्पे-चप्पे पर खड़ा कर दिए गुलामी के असंख्य प्रतीक। लेकिन मुसलमान और अंग्रेज भारत में एक-एक करके खड़े होते उन गुलामी के प्रतीकों को देखकर भी संतों का ध्यान कभी भंग नहीं हुआ। वे ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या के सिद्धांत में आस्था रखते हुए दूध-मलाई, भांग-धतूरों और देवदासियों का भोग लगाने में मस्त रहे। लेकिन जो परजीवी साधु-संत इस्लाम और इसाई भारत में गुलामी के प्रतीकों से निर्लिप्त रहे, वे मंडल उत्तरकाल में सत्ता की लगाम बहुजनों के हाथों जाते देख चैतन्य हो गए। वे तुलसी, सूर, रामानुज स्वामी, भोलानाथ गिरी, बाबा गंभीरनाथ, तैलंग स्वामी, बामा क्षेप, रामदास काठिया बाबा जैसे पूर्ववर्ती संतों की परम्परा का परित्याग कर मिथ्या जगत पर ध्यान केन्द्रित किये।

उन्होंने बहुजनों की जाति चेतना का मुकाबला धार्मिक चेतना के राजनीतिकरण से करने के लिये सबसे पहले निशाना बनाया गुलामी के प्रतीक बाबरी मस्जिद को। बाबरी मस्जिद के टूटने के फलस्वरूप देश -विदेश में टूटे असंख्य मंदिर। टूटा मुंबई का शेयर बाजार, किन्तु सबसे बड़ी टूटन राष्ट्रीय एकता की हुई। किन्तु भारी नुकसान के विनिमय में जिस तरह ब्राह्मण वाजपेयी के नेतृत्व में सवर्णवादी सत्ता कायम हुई, उससे संतों को गुलामी के प्रतीकों की अहमियत का अहसास हो गया। अहसास हो गया इसलिए संत के रूप विद्यमान ब्राह्मणों का गिरोह एक बार फिर भीषणतम आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी से उपजी भूख-कुपोषण, अशिक्षा, विच्छिन्नता, राष्ट्र की सुरक्षा इत्यादि की पूरी तरह अनदेखी कर गुलामी के प्रतीकों की मुक्ति की लड़ाई के जरिये, भाजपा के मिशन-2019 को अंजाम देने में जुट गया है।

लेकिन जिस दिन गुलामी के प्रतीकों की मुक्ति– आन्दोलन से मिली सत्ता का उपयोग कर संघ का राजनीतिक संगठन निजीकरण-विनिवेशिकरण के जरिये आरक्षण को महज कागजों की शोभा बनाने में कामयाब हो जाएगा, उस दिन से संत फिर हरि-भजन में निमग्न हो जायेंगे। कारण, तब भारत आर्थिक रूप से विदेशियों का गुलाम बन जायेगा। तब संघ परिवार को गजनी-गोरी, बाबर-ऐबक जैसे पुराने विदेशी खलनायकों की जगह बहुराष्ट्रीय निगमों के रूप में अत्याधुनिक दुश्मन मिल जायेंगे। फिर स्वदेशी की चादर लपेट कर संघ परिवार दलित-आदिवासी-पिछड़ों के साथ मुसलमानों को भी गले लगाकर अत्याधुनिक दुश्मनों के खिलाफ ध्रुवीकरण की नयी पारी का आगाज कर देगा।

(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। संपर्क- 9454816191)

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