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विमर्श

चिकित्सा विज्ञान को चुनौती देकर अंधविश्वास फैलाते विज्ञान के सिद्धहस्त

पिछले दिनों देश के कुछ अखबारों में एक अध्या‍त्मिक समागम का दो सम्पूर्ण पृष्ठ वाला विज्ञापन प्रकाशित हुआ, ऐसे विज्ञापन बड़े-बड़े होर्डिगं, फ्लेक्स, बैनर, पोस्टर पूरे रायपुर शहर में लगाए गए. विज्ञापन में या दावा किया गया कि ऐसे तमाम रोग जिसमें चिकित्सा विज्ञान नाकाम हो गया है. उन्हें इस दो दिवस के समागम में ठीक किया जाएगा. इस विज्ञापन में बहुत सारे लाभार्थियों के फोटो सहित इंटरव्यू थे. और केंद्रीय मंत्री समेत स्थानीय मंत्री एवं सेलिब्रिटी, फिल्म अभिनेता के साथ आशीर्वाद लेते हुए उस बाबा की तस्वीर थी. मैं बड़ा ही हैरान था कि क्या धर्म प्रचार या किसी समागम में बुलाने के लिए इस प्रकार महंगे एवं लुभावने विज्ञापन प्रकाशित किया जाना सही है?

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दरअसल यह विज्ञापन सिर्फ अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला नहीं है. इस विज्ञापन के जरिये चिकित्सा जगत को चुनौती भी दिया जा रहा है. लेकिन इस विज्ञापन पर किसी भी डॉक्टर ने आपत्ति दर्ज नहीं कराई, ना ही किसी प्रकार का विरोध किया, डॉंक्टंरों की एसोसिएशन को तो मानो चुप्पी साध रखी थी. सिवाए कुछेक डॉक्टरों के जिन्होंने सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा की. दरअसल हम अक्सर अपनी शिक्षा प्रणाली को दोष देते रहते हैं और अपनी अयोग्यता का क्रेडिट इसी प्रणाली के सिर पर मढ़ देते हैं. जबकि समस्या कही और है. डॉक्टर की आपत्ति के मद्देनजर यह कहा जा सकता हैं कि उन्होंने विज्ञापन नहीं देखा होगा या वे इन बातों से वाक़िफ़ नहीं होंगे. लेकिन यह बात गलत है आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि शहर में आयोजित इस कार्यक्रम में बहुत सारे सरकारी कर्मचारी-अधिकारी, इंजीनियर, डाक्टर, आई ए एस, मंत्री नेता पहुंचे हुए थे. जाहिर हैं उनका वहां पहुंचने का मकसद विज्ञापन के अनुरूप ही रहा होगा.

यह सही है कि इस प्रकार अंधविश्वास को बढ़ाते हुए विज्ञान को चुनौती देना गलत है. लेकिन यह बताना जरूरी है कि देश के तमाम इंजीनियर और डॉक्टरों प्रतिदिन किस प्रकार विज्ञान को चुनौती देते हैं. एक बार शहर के एक नामी गैस्ट्रोलाजी (विभाग का नाम बदला हुआ है) डॉक्टर के पास जाना हुआ. इस डॉक्टर के पास अपाईटमेंट लेने के लिए 15 दिन पहले कॉल करना पड़ता है. और परामर्श फीस 600 रुपये के साथ दिनभर का इंतजार जरूरी है, क्योंकि उनके मरीज़ों की संख्या काफी है. इसमें कोई शक नहीं कि वे बहुत ही बेहतर इलाज करते है. लेकिन जब उनके क्लीनिक रूम पर नजर पड़ी तो मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उनकी टेबल पर व्यवसाय बढ़ाने हेतु तमाम अंधविश्वास की वस्तुएं रखी हुई थी. जैसे पानी में डूबा हुआ कछुआ, ताबिज, नींबू मिर्च और डॉक्टर के हाथों में बहुरंगी अंगूठियां. देश में वे अकेले डॉक्टर नहीं है जो इस प्रकार विज्ञान पर कम अंधविश्वास पर ज्यादा भरोसा करते है. बल्कि यूं कहें कि ज्यादा संख्या में ऐसे ही डॉंकटर आप को मिलेंगे जो कही ना कहें अंधविश्वास, टोने-टोटके का दामन थामे हुए है.

इसी प्रकार एक नामी गिरामी आर्किटेक्ट इंजीनियर के घर के सामने अजीब डिज़ाइन का पत्थर पड़ा हुआ था. मैंने कहा इस खूबसूरत घर में आपने इस बदरंग पत्थर को क्यों रखा है. उन्होंने बताया कि यह क्रिस्टल पत्थर है. इसे घर के सामने रखने से मेरे आय में बढ़ोतरी होगी ऐसा किसी iit के उनके दोस्त ने बताया. फिर मैंने उनके निवास पर तमाम ऐसी अवैज्ञानिक अंधविश्वास से भरी वस्तुएं देखी. जिससे मुझे उनकी शिक्षा पर संदेह होने लगा. जाहिर है उन्हे भी अपने हुनर पर कम टोटके पर ज्याजदा विश्वास है. राजस्थान भरतपुर के पूर्व सरकारी डांक्टर ने तो बाक़ायदा एक मरीज को दवाई देने के साथ-साथ प्रिस्क्रप्सन में टोने-टोटके करने की सलाह दी, जो सोशल मीडिया में काफी चर्चित भी रहा.

क्या हम ऐसे डाक्टर इंजीनियर से यह अपेक्षा कर सकते हैं, कि वे अंधविश्वास के खिलाफ खड़े हो सकेंगे, उनका प्रतिरोध कर सकेंगे? उन शासकीय कर्मचारियों अधिकारियों को जिन्हें देश का क्रीम समझा जाता है. जो कंपटीशन पास करके सरकारी सेवा में आते हैं. क्या हम उन से अपेक्षा कर सकेंगे कि वह ऐसी अंधविश्वास का विरोध करेंगे? या हम उन मंत्रियों नेताओं से अपेक्षा करेंगे जो सारी दुनिया घूमते हैं जिन्हें यह ज़िम्मेदारी है कि देश को अंधविश्वास से मुक्त कराएं?


आज देश में चुनौती वह बाबा और अंधविश्वास फैलाने वाले व्यवसाई नहीं है.आज विज्ञान के लिए सबसे बड़ी चुनौती है खुद हमारे डॉक्टर इंजीनियर वकील शासकीय कर्मचारी अधिकारी मंत्री नेता और वैज्ञानिक. हमारी शिक्षा प्रणाली को धर्म से अलग करना होगा और अंधविश्वास पर एक खास चैप्टर रखना पड़ेगा ताकि अंधविश्वास और विज्ञान का घालमेल ना हो सके. यह विचार करना होगा कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ 100 यूनिवर्सिटीज में हमारी एक भी यूनिवर्सिटी शामिल क्यों नहीं हो पायी?
बावजूद इसके इस पहलू का सकारात्मक तथ्य यह है कि तमाम डाक्टर इंजीनियर समेत कई लोग ऐसे है जो ऐसे अंधविश्वास, टोने टोटके का विरोध करते है और लोगों को जागरूक करने का काम कर रहे है. लेकिन ऐसे लोगो की संख्या कम है. बावजूद इसके वे एक आशा कि किरण बने हुये है. भवदीय

(लेखक का संक्षिप्त परिचय:-संजीव खुदशाह का जन्म 12 फरवरी 1973 को बिलासपुर छत्तीसगढ़ में हुआ. आपने एम.ए. एल.एल.बी. तक शिक्षा प्राप्त की. आप देश में चोटी के दलित लेखकों में शुमार किये जाते है और प्रगतिशील विचारक, कवि,कथा कार, समीक्षक, आलोचक एवं पत्रकार के रूप में जाने जाते है. आपकी रचनाएं देश की लगभग सभी अग्रणी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है. “सफाई कामगार समुदाय” एवं “आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग”, “दलित चेतना और कुछ जरुरी सवाल” आपकी चर्चित कृतियों मे शामिल है. आपकी किताबें मराठी, पंजाबी, एवं ओडिया सहित अन्य भाषाओं में अनूदीत हो चुकी है. आपकी पहचान मिमिक्री कलाकार और नाट्यकर्मी के रूप में भी है. आपको देश के नामचीन विश्वविद्यालयों द्वारा व्याख्यान देने हेतु आमंत्रिकत किया जाता रहा है. आप कई पुरस्का र एवं सम्मान से सम्मानित किए जा चुके है.)

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