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खाना बनाने वाली ब्राह्मण नहीं निकलीं तो अफसर का धर्म हो गया भ्रष्ट, महिला पर केस दर्ज कराया

यादव जी! आप खुद को क्षत्रिय समझे या भगवान कृष्ण का वंशज या यह रटते रहें कि “यदोरबंशः नरः श्रुत्वा,सर्व पापयै प्रमुच्यते”(यदुवंश का इतिहास सुनने से सारे पापों का विनाश हो जाता है) लेकिन आपकी मान्यता तुलसीदास मुताबिक “आभीर, यवन, किरात, खल, स्वपचादि अति अध रूपजे” (अहीर….अत्यंत अधम/नीच है।), ब्यास स्मृति के मुताबिक “बर्द्धिको, नापितो, गोपः, आशापः, कुम्भकारकः,…..ऐते अंत्यणाः समारण्याता ए चान्ये च गवासनाः। एसाम संभाषानात्मानम दर्शनाद के बृक्षणम।” (बढ़ई, नाई, ग्वाला, चमार, कुम्भकार, बनिया, चिड़ीमार, कायस्थ, माली, कुर्मी, भंगी, कोल और चांडाल,ये सभी अपवित्र हैं। इनमें से एक पर भी दृष्टि पड़ जाय तो सूर्य दर्शन करने चाहिए तब द्विजाति का व्यक्ति पवित्र होता है।)

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यादव जी! आप चाहे जितनी तरक्की कर जांय पर जाति आपका पीछा नही छोड़ेगी तभी तो कथित त्रेता में राम ने समुद्र के यह कहने पर कि “हे राम! हमारे बगल में स्थित पवित्र राज्य द्रुमकुल्य निवासी पापी व नीच अहीरों के स्पर्श से हमे बड़ी पीड़ा होती है,आप अपने अमोघ व अशनि बाण को उन्ही पर छोड़ दीजिए”,राम ने अपना बाण उन पर छोड़कर के अहिरो को मार डाला था।(देखें- बाल्मीकि रामायण-युद्ध कांड के 22 वें अध्याय का राम-समुद्र संवाद देखें।)

यादव जी! आप चाहें कथित त्रेता के अहीर कृष्ण को भगवान कहें, वैज्ञानिक कहें, गणतंत्र के महान रचयिता कहें लेकिन आर्यो का ऋग्वेद उन्हें असुर, दानव कहता है और उनका वध इंद्र के हाथों उनकी गर्भिणी पत्नियों सहित करवा देता है। (ऋग्वेद मण्डन-1के सूक्त 101का पहला मन्त्र,मण्डन-1,सूक्त-130 का आठवां मन्त्र,मण्डन -8,सूक्त-96 के मंत्र -13,14,15,17 को देखें।)

यादव जी! कथित कलियुग में आप मुलायम, लालू, शरद, अखिलेश, तेजश्वी या और भी अन्यान्य क्षेत्रो के महारथी यादवो का नाम लेकर खुद को गौरवान्वित महसूस करते रहे पर पढ़ी-लिखी, शोधार्थी, वैज्ञानिक, आईएएस ब्राह्मण महिला डॉ मेधा विनायक खोले की नजर में आप नीच, शूद्र, अधम और तिरस्कार योग्य ही हैं।


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दक्षिण भारत मे ब्राह्मणवाद के मजबूत किले के रूप में विद्यमान पुणे की मौसम वैज्ञानिक डॉ मेधा विनायक खोले को खाना बनाने हेतु ब्राह्मण महिला कुक चाहिए थी। निर्मला नाम की एक विधवा ने इस वैज्ञानिक ब्राह्मणी के वहां खाना बनाने हेतु सारी तहकीकात के बाद नौकरी कर लिया।एक वर्ष बाद जब इस ब्राह्मण वैज्ञानिक को पता चला कि उसकी रसोइया निर्मला ब्राह्मण न होकर यादव है तो इस आधुनिक भारत के वैज्ञानिक मेधा की मेधा ने मनुवाद के समक्ष घुटने टेक दिया और इस वैज्ञानिक महिला ने उस विधवा निर्मला यादव के बिरुद्ध धार्मिक भावना भड़काने सहित 419,352,504 आईपीसी के तहत सिंहगढ़ रोड पुलिस स्टेशन पुणे में मुकदमा लिखवा दिया है।

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मामला बड़ा पेचीदा है। देश का कानून अस्पृश्यता को अपराध मानता है लेकिन अहीर (यादव) अस्पृश्य नही है इसलिए अस्पृश्यता निवारण कानून अहीर से अस्पृश्यता करने पर प्रभावी नही होगा।अहीर स्वयंभू क्षत्रिय है लेकिन कोई उसे क्षत्रिय मानता नही।बड़ी पेशोपेश में स्थिति है क्योंकि अहीर न शूद्र/अस्पृश्य है और न क्षत्रिय, अहीर खुद को चाहे जो समझे पर उसे इस आधुनिक और तरक्की कर रहे भारत मे डॉ मेधा विनायक खोले ने खोल करके रख दिया है और इसमें थाना ने विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कर एक नए विमर्श का दरवाजा खोल दिया है।

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निश्चित तौर पर हम सवाल कर सकते हैं कि इस आधुनिक भारत मे हम किस तरह का समाज बनाने जा रहे हैं? पढ़ने-लिखने के बावजूद हमारा दकियानूस स्वभाव क्यो हमे जातीय दम्भ से निकलने नही दे रहा है?इस वैज्ञानिक महिला को आप किस नजरिये से देखेंगे?

यादव जी! सुनिए, गुनिये, धुनिये और आगे का निष्कर्ष निकालते रहिए कि आप हैं क्या-85% वाले शोषित या 15% वाले शोषक? कमेरे या लुटेरे? लड़ाई श्रमजीवी और परजीवी के बीच है पर यह परजीवी है बहुत चालाक जिसे हमारे जातीय विभाजन और खुद की झूठी श्रेष्ठता के दम्भ का लाभ मिल रहा है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं। चंद्रभूषण सिंह यादव त्रैमासिक पत्रिका यादव शक्ति के प्रधान संपादक हैं।)

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