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सामाजिक न्याय की कब्रगाह बनता जा रहा है दिल्ली विश्वविद्यालय

दिल्ली विश्वविद्यालय देश की राजधानी में स्थित प्रतिष्ठित केन्द्रीय विश्वविद्यालय है। इस विश्वविद्यालय ने देश के सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन में हमेशा अपनी रचनात्मक भूमिका निभाई है। यह विश्वविद्यालय प्रगतिशील मूल्यों की बुनियाद पर खड़ा रहा है लेकिन पिछले कुछ वर्षों से आरक्षण सम्बन्धी असंवैधानिक प्रक्रिया अपनाने का मामला सामने आ रहा है दिल्ली विश्वविद्यालय के कई विभागों में एमफ़िल, पीएचडी की प्रवेश प्रक्रिया में व्यापक स्तर पर सामाजिक न्याय की संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन करते हुए देश के बहुसंख्यक वंचित तबके को उच्च शिक्षा से दूर किया जा रहा है। यह पूरा मामला प्रवेश प्रक्रिया में विश्वविद्यालय द्वारा की जा रही धांधली से जुड़ा है।

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आरक्षण का संवैधानिक सिद्धांत कहता है कि किसी भी प्रवेश प्रक्रिया में दो तरह के विभाजन होंगे। अनारक्षित कोटा व आरक्षित कोटा व अनारक्षित कोटे में आवश्यक संख्या के लिए मेरिट में क्रम से अभ्यर्थी चुने जाएंगे जिसमें आरक्षित वर्ग व सामान्य वर्ग किसी से भी हो सकते हैं। यह सभी के लिए प्रतिभा व मेरिट से प्रतिस्पर्धा हेतु खुला स्थान है जो अपनी प्रतिभा से अनारक्षित वर्ग में सफल है उसे अनारक्षित वर्ग का ही माना जाएगा। भले ही उसने आवेदन पत्र में अपनी श्रेणी आरक्षित लिख रखा हो क्योंकि आरक्षण एक अतिरिक्त सकारात्मक विभेद की प्रक्रिया पर काम करता है। अन्यथा लगभग 85% जनसंख्या को 49.5% तक में कैद करके लगभग 15% जनसंख्या कोअघोषित 50.5% आरक्षण मिलेगाण् इसलिए 49.5% आरक्षण के अलावा बची 50.5% सीटों को अनारक्षित माना जाना संविधान से लेकर न्यायालय तक में स्पष्ट तौर पर दर्ज है। दिल्ली विश्वविद्यालय की स्नातक प्रवेश प्रकिया सम्बन्धी पुस्तिका में भी यह साफ़ तौर पर दर्ज किया गया है। (देखें डीयू प्रवेश पत्रिका, पृष्ठ 31) लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय के कई विभाग एमफ़िल/पीएचडी की प्रवेश प्रक्रिया में इसका खुलेआम उल्लंघन कर तरहे हैं। एक ही विश्वविद्यालय अपने ही अलग अलग संकायों के लिएअलग अलग नियम कैसे बना सकता है?

ताजा मामला डीयू के हिंदी विभाग से सम्बंधित है। हिंदी विभाग ने एमफिल/पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में कई वर्षों से यह नियम बना रखा है कि किसी अभ्यर्थी ने यदि आवेदन फॉर्म में आरक्षित वर्ग लिख दिया है तो उसे उसी आरक्षित वर्ग में ही सफल माना जाएगा। भले ही वह अनारक्षित वर्ग की कट ऑफ़ सूची में सफल हुआ हो। अब उदाहरण से समझें। मसलन इस बार हिंदी विभाग में 25 सीटें हैं जिनका वर्गवार विभाजन इस प्रकार है। UR-12, OBC-6, SC-4, ST-2, PWD-1। साक्षात्कार के लिए एक सीट पर 3 अभ्यर्थी लिखित परीक्षा में सफल किये जाएंगेण् जिसका नियमतः आंकड़ा कुछ इस प्रकार होगा। UR: 12*3=36, OBC: 6*3=18, SC:4*3=12, ST: 2*3=6, PWD: 1*3=3 हिंदी विभाग द्वारा जारी लिखित परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों की सूची में नियमतः शुरू के 36 अभ्यर्थियों को अनारक्षित श्रेणी में सफल माना जाना चाहिए था जिसमें आरक्षित वर्ग के भी अभ्यर्थी शामिल होते जिससे अनारक्षित वर्ग की मेरिट 290 ही जाती। उसके बाद ओबीसी आरक्षण की छूट पाए 18 अभ्यर्थियों के लिए मेरिट कम की जाती जो नियमतः 255 नंबर तक आनी चाहिए। इसी तरह एससी के लिए आरक्षित वर्ग की मेरिट आपेक्षित कोटे के लिए 238 नंबर तक एसटी के लिए 190 नंबर तक और पीडब्ल्यूडी के लिए यह मेरिट 220 नंबर तक आनी चाहिए थी जबकि हिंदी विभाग द्वारा सभी आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को उनके कोटे में ही माना गया है। यद्पि कि जिनकी मेरिट कट ऑफ़ अनारक्षित वर्ग में ही है इससे अनारक्षित श्रेणी मूलतः सामान्य श्रेणी के लिए पूरी 50% आरक्षित हो गई और उनकी कट ऑफ 263 नंबर तक नीचे आ गयी जबकि ओबीसी की कट ऑफ 290 रह गई क्योंकि ऊपर से मेरिट में नीचे आते आते जैसे ही 27% ओबीसी 15% एससी, 7.5% एसटी पूरे हुए वहीं कट ऑफ बंद कर दी गई। अब वे तमाम अभ्यर्थी जिनका अनारक्षित श्रेणी में नाम होने से आरक्षित वर्ग की सीटों पर लाभ हो सकता था वह लाभ नहीं मिला और वे सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी से ज्यादा अंक पाकर भी असफल है। अतः अघोषित आरक्षण पाकर सामान्य वर्ग में 263 नंबर पाया हुआ अभ्यर्थी सफल है जबकि 289 नंबर पाया हुआ ओबीसी और तमाम एससी एसटी असफल घोषित कर दिए गए हैं। (संलग्न मेरिट लिस्ट में दिया गया रंग संकेत नियमतः वह मेरिट कट ऑफ है जो होनी चाहिए थी। दोनों सूचियाँ संलग्न हैं।)

दिल्ली विश्वविद्यालय के ही भौतिकी विभाग में पीएचडी की प्रवेश परीक्षा में ओबीसी संवर्ग के लिए 14 सीटें निर्धारित की गई थीं जिसमें 1 अभ्यर्थी को ही प्रवेश मिला बाकि सीटों पर उम्मीदवार अयोग्य घोषित कर दिए गए। एससी एसटी के भी 2.2 उम्मीदवारों को अयोग्य करार दिया गया। वहीं सामान्य संवर्ग की सभी सीटें पर प्रवेश लिया गया है। दर्शनशास्त्र विभाग में एमफिल की प्रवेश प्रक्रिया भी आरक्षण का उल्लंघन का मामला सामने आया है। एमफिल की इस प्रवेश परीक्षा में 22 सीटें निर्धारित की गई थीं जिनमें नियमतः ओबीसी की 6 सीटों पर उम्मीदवारों का चयन किया जाना चाहिए था। जबकि मात्र दो उम्मीदवारों को ही प्रवेश मिला। अफ्रीकन स्टडीज विभाग में पीएचडी के लिए 15 निर्धारित सीटों में से 10 सीटों पर सामान्य वर्ग के छात्रों को प्रवेश है। कई अन्य विभागों में भी आरक्षण प्रक्रिया के उल्लंघन का मामला सामने आया है।

देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय ही सामाजिक न्याय को मानने से इनकार कर रहे हों। खुलेआम संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन किया जा रहा हो और पिछले कई वर्षों से यह चला आ रहा हो तो देश के साथ बहुत बड़ा धोखा है लोकतंत्र में संविधान समाज के वंचित तबके के अधिकारों व अवसरों का न्यायपूर्ण संरक्षण करता है लेकिन अगर ऐसा है तो यह देश और लोकतंत्र दोनों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। कैसे कोई देश अपने सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों में वंचित तबके के खिलाफ़ असंवैधानिक प्रक्रिया अपना सकता है और कैसे बड़े बड़े प्रोफ़ेसर व बुद्धिजीवी इसे स्वीकार करते चले आ रहे हैं। इस बार के प्रभावित वंचित तबके से आये छात्रों ने विरोध करने व अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष का रास्ता चुना है। जो देश अपने बहुसंख्यक वंचित दलित पिछड़े आदिवासी तबके को उच्च शिक्षा का अधिकार नहीं दे सकता जो देश मेरिट का उल्लंघन करके बड़ी संख्या में प्रतिभाओं की अकाल ह्त्या करता जाता है। जो देश अपने ही संविधान की अवमानना करते सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों को खुली छूट देता हो। वह देश बेहद अमानवीय व्यवस्था का पोषक और ब्राह्मणवादी सामंतवादी मूल्यों का पोषक ही होगा।


(ये लेखक के निजी विचार हैं। डॉ. लक्ष्मण यादव जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

 

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