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काठ का उल्लू बनाने वाले बाबाओं के चमत्कारों की दरकार हर युग में रही है

फिलहाल मौका और दस्तूर बाबाओं को क्रिटिसाईज करने का है तो इस बहाने मैं भी अपना नजरिया पेश किये दे रहा हूँ। जहां तक मेरी समझ है कि बाबा दोषी है या नहीं, उससे पहले आपको ‘राम रहीम’ या ‘आसाराम’ को ‘बाबा’ से अलग करना होगा। यह व्यक्ति दोषी हो सकते हैं लेकिन बाबा को दोष देंगे तो पहले दोषी आप खुद हैं। इस बाबा को पैदा होने का मौका देने वाले आप हैं, इस बाबा को पनपने देने वाले और धीरे-धीरे शक्तिमान बन जाने की सुविधायें देने वाले आप हैं… फिर बाबा कैसे दोषी?

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एक बाबा से पीछा छूटता है तो दूसरा बाबा पकड़ लेते हैं… सिलसिला चलता रहता है, खिलाड़ी बदल जाते हैं। कारण सिर्फ एक है… आपको आस्थागत चमत्कार की दरकार हर युग में रही है काठ का उल्लू बनने के लिये। आज भी बन रहे हैं और कल भी बनेंगे। आपके पिता ने धर्म को आपके जिस्म में घोला था, आप अपने बच्चों में घोल रहे हैं… और वे अनदेखी ताकतों, ईश्वरीय अवतारों पर यकीन करते हुए बड़े हो रहे हैं, बूढ़े हो रहे हैं।

जैसे ही आम लोगों के बीच से कोई जगलर, ठग, हाथ की सफाई, छोटे मोटे जादू करने वाला या अध्यात्म के नाम पर पीछे कहीं से पढ़ी लंबी लंबी तकरीरें फेंकने वाला निकला… आप पल्लू पकड़ कर लटक गये। कहते हैं अगर आदमी अंधा हो तो उसकी दूसरी इंद्रियां और ज्यादा विकसित हो जाती हैं… लेकिन आस्था के अंधे की तो सारी इंद्रियां जड़ हो जाती हैं।

एक पल के लिये नहीं समझ में आता कि ‘जीवन और मरण तो प्रभु के हाथ में है’ कहने वाला ढोंगी खुद अपने जीवन से इतना मोह रखता है कि ‘जेड प्सल सिक्योरिटी’ या अंगरक्षकों की निजी सेना लिये बैठा है।

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आपको एक पल के लिये ख्याल नहीं आता कि ‘जीवन तो मोह माया है’ बताने वाला ठग खुद अपनी बेशुमार प्रापर्टी बढ़ाता जा रहा है, बड़ी सी गाड़ी/हैलीकॉप्टर में चल रहा है, एयरकंडीशनर युक्त महल में रहता है और एसीयुक्त हाल में प्रवचन देता है। जीवन के सभी भौतिक सुखों का उपभोग करते हुए आपको प्रभु की इच्छानुसार जीवन के कष्ट भोगने की सलाह दे रहा है।

आप अपने बीमारों और बीमारियों को लिये उसकी किरपा को तरस रहे हैं, ढो रहे हैं और वह अपनी जरा सी बीमारी पर डाक्टरों की फौज तलब कर रहा है, एम्स अपोलो में ट्रीटमेंट ले रहा है। आपको संकट से मुक्त कराने के सपने दिखा रहा है और खुद पर संकट आने पर मुक्ति के लिये निजी हत्यारे, वकील, नेता मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों की मदद लेने में देर नहीं करता।

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आप बाबा बाबा का जाप करते, गंडे, माला, प्रसाद, भभूत, चटनी, समोसे के रूप में दी हुई किरपा को ढोते फिर रहे हैं और आप की सेवा के लिये सौंपी हुई बहन बेटियों का भोग हो रहा है, लेकिन आस्थाजनित अंधापन यह सब देखने नहीं देता।

न ऐसे बाबा कहीं बाहर से आते हैं और न ऐसे बाबाओं को शक्तिमान बनने का मौका देने वाले कहीं बाहर से आते हैं। सब हमारे बीच से ही संभव होता है… हाँ आप सीना ठोक कर यह कह सकते हैं कि वह बाबा बुरा होगा लेकिन हमारे गुरूजी ऐसे नहीं हैं, कम से कम तब तक… जब तक आपके गुरू के कारनामे सामने नहीं आते।

अपनी हरकतों के जितने जिम्मेदार यह एज ए पर्सन खुद हैं, उससे कहीं ज्यादा ऐसे लोगों को मौका देने वाले लोग भी जिम्मेदार हैं, जो चमत्कार के आसरे पे जीवन जिया करते हैं। जिन्हें हमेशा किसी दैवीय/ईश्वरीय किरपा की उम्मीद बनी रहती है और जो ठगों, धूर्तों, जगलरों में ‘अवतार’ ढूंढते रहते हैं। कम से कम इस मामले में नास्तिक लाख बेहतर कि इस पाप से मुक्त तो हैं।

(लेखक सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं।)

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