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औरत मासिक चक्र के समय अपवित्र कैसे हो जाती है?

औरत मासिक चक्र के समय अपवित्र कैसे हो जाती है? जरा मुझे भी समझाना। तुम कहते हो कि उन 5 दिनों में ना तो वह पूजा पाठ का सामान छुए, ना तो किसी मंदिर में जाकर आराधना उपासना करें और ना ही नमाज़ पढ़े। हिंदू घरों में तो और भी बुरी दुर्गति होती है इन 5 दिनों में किसी छुआ छूत द्वारा फैलने वाले रोग की तरह से व्यवहार किया जाता है।

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यह लोग कैसे भूल जाते हैं कि जिस दिन से मां के गर्भ में रोपित होते हैं उसी दिन से माहवारी बंद हो जाती है और इसी माहवारी के तरल द्रव्य में तुम जीवनदाई पोषक तत्वों से खुद के वजूद को गतिमान करते हो। फिर 9 महीने बाद तुम उसी रक्त से सने हुए इस दुनिया में तुम्हारा आगमन होता है। जब तुम्हारा वजूद ही उस रक्त की वजह से है तो तुम तो अपवित्र नहीं हुए??

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उसी रक्त की वजह से तुम आज एक पुरुष बनकर समाज में औरतों पर अपवित्र होने के लिए उंगली उठा रहे हो और उसे इस बात के लिए शर्मिंदा करते रहते हो। क्यों भूल जाते हो कि वही रक्त तुम्हारी धमनियों में प्रवाहित है। इस बात को क्यों नहीं समझते कि जिस प्रकार सर्दी होने से तुम्हारी नाक बहती है वैसे ही यह एक मासिक चक्र है जो प्रकृति द्वारा स्त्रियों को प्रदान किया गया है इसमें अपवित्र जैसा क्या है?

https://youtu.be/XiQEIO3KNEo

जब वह घर के सारे काम कर सकती है, उसके रहते तुम उसके साथ सेक्स कर सकते हो तब अपवित्र नहीं होते? और जब पूजा करने की बारी आती है तो अचानक वह अपवित्र हो जाती है। जबकि रात में डुबकी लगाने के बाद भी तुम अपवित्र नहीं होते। क्यों???


– ये लेखिका के निजी विचार हैं।

 

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