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विमर्श

कर्नल पुरोहित पर विलापते मीडिया का कभी मुस्लिमों के रिहा होने पर दिल दुखा है?

असल में आज अगर भारतीय मीडिया दुनिया के सबसे गैरभरोसेमंद संस्थानों में आता है तो इसका जिम्मेदार अकेला मीडिया नहीं, बल्कि हम भी हैं।

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अभी खबरों की तलाश में न्यूज चैनल्स की झाड़ी ली तो आज के दिन ऐसा लगा जैसे सारी समस्यायें उनके लिये बेमानी हो गयी हैं क्योंकि ज्यादातर चैनल बेचारे, बेकसूर और मासूम कर्नल पुरोहित को जमानत मिलने की खबर प्रमुखता से दिखाते और डिबेट चलाते दिखे।

एबीपी न्यूज वाले काफी तकलीफ में थे कि कैसे एक मासूम को कांग्रेसी साजिश की वजह से नौ साल जेल में बिताने पड़े। कर्नल पुरोहित दोषी थे या नहीं, मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता लेकिन क्या कभी दस पंद्रह साल जेल में रह कर, बेकसूर साबित होकर रिहा होने वाले मुस्लिम नौजवानों पर ऐसे रियेक्ट करते देखा है न्यूज चैनलों को… जिन्हें आतंकवाद के आरोप में जेलों में ठूंस दिया गया हो?

वे ऐसे प्रोग्राम नहीं चलाते… वे आज के दौर में बस वे चलाते हैं जिस पर पक्ष और विपक्ष में जोरदार प्रतिक्रिया हो सके। वे जहर की गोलियां सड़क पर मजमा लगा कर बेचने बैठे हैं, आप खरीद रहे हैं तो वे बेचने से पीछे क्यों हटें… यह भीड़ उन्हें टीआरपी देती है, टीआरपी उन्हें विज्ञापन दिलाती है और विज्ञापन से उनकी अच्छी कमाई होती है। बाकी सरकारी चापलूसी से कुछ अतिरिक्त सुविधायें भी मिल जाती हैं।

आज की तारीख में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पैसे वाली सरकार के लिये प्रचार का बेहतरीन साधन है। लगभग पूरा मीडिया वाया अंबानी सरकार के नियंत्रण में है। ज्यादातर वक्त वे सरकारी भोंपू जैसा बर्ताव करते हैं पर यह व्यवहार स्थाई नहीं है। कल को अगर सरकार बदल गयी तो तत्काल मीडिया के सुर भी बदल जायेंगे। यह बाजार का नियम है।


आप खुद को देखिये… मीडिया की दिन रात की नकारात्मक भसड़बाजी को कोसते भी हैं और देखते भी हैं। सीधा सा फार्मूला है… आप खरीद रहे हैं तो ही वे बेच रहे हैं। कहने को तो आपको वह सब पसंद नहीं लेकिन अगर आप मोदी विरोधी हैं तो किसी हादसे के दौरान दिखावे के तौर पर ही सही, पर महफिलें मोदी, भाजपा या संघ विरोध में जमती हैं तो आप खुशी खुशी वह भसड़ झेल लेते हैं और अगर मोदी समर्थक हैं तो फिर तो रोज ही आपके लिये मसाला उपलब्ध है।

लेकिन ध्यान रहे कि जर्नलिज्म राजा की चापलूसी करने वाला तंत्र नहीं होता, बल्कि एक जिम्मेदार प्रहरी की तरह होता है जो न सिर्फ घटनाओं के बारे में बिना अपना व्यू शामिल किये हमें सूचित करता है बल्कि हर गलत के खिलाफ लड़ाई में आमजन का हथियार भी बनता है। आज अगर मोदीभक्ति में वह आपको अपना हितैषी दिख रहा है तो कल विरोधी भी दिख सकता है… इसलिये उसके मौजूदा स्वरूप का विरोध कीजिये, बहिष्कार कीजिये ऐसे संस्थान का जो किसी एक दल का प्रचार माध्यम बना हुआ है… अपनी एकतरफा महफिलों से समाज में लगातार नकारात्मकता घोल रहा है।

मैं बहुत मुश्किल से ही न्यूज चैनल्स की तरफ जाता हूँ। खबरें पाने का जरिया अखबार भी हैं… अगर आप देखने के बजाय पढ़ने की आदत डाल सकते हैं तो डालिये। अनसब्सक्राईब कर दीजिये अपने प्लान्स से उन्हें। दर्शक नहीं मिलेंगे तो विज्ञापन भी नहीं मिलेंगे, और कमाई नहीं होगी… तो शायद इस तरह उन्हें अपनी जिम्मेदारी का अहसास हो।

(लेखक सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं। यह आर्टिकल उनके फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है।)

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