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विमर्श

सांप्रदायिकता से जूझने वाला सामाजिक न्याय का योद्धा..

पत्थर तोड़ने वाली भगवतिया देवी, जयनारायण निषाद, ब्रह्मानंद पासवान, आदि को संसद भेजने वाले, खगड़िया स्टेशन पर बीड़ी बनाने वाले विद्यासागर निषाद को मंत्री बनाने वाले एवं बिना डिगे सांप्रदायिकता से जूझने का माद्दा रखने वाले लोकप्रिय व विवादास्पद नेता लालू जी को 70वें जन्मदिन की बधाई व उनके आरोग्यमय जीवन की सद्कामनाएं !

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यह तस्वीर है 90 और 91 की। पहली तस्वीर में हैं जनता के बीच मक़बूल व मशहूर तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद, माकपा के समर्पित नेता गीता यादव, अभिनंदन भाषण करते पिताजी व अन्य। (खगड़िया के तत्कालीन डीएम सुधीर त्रिपाठी जी कुछ कहते हैं तो पापा पीछे मुड़कर देखते हैं।) दूसरी तस्वीर में हैं बलिया के तत्कालीन सांसद सूरज दा, चौथम के विधायक व संप्रति भाकपा के प्रांत सचिव कामरेड सत्यनारायण सिंह, पिताजी व अन्य। तब जनता दल व बड़े वामपंथी धड़े का गठबंधन था।

आरएसएस की उन्मादी, सांप्रदायिक, विभाजनकारी व राष्ट्रभंजक राजनीति करने वालों के खिलाफ खड़ी होनेवाली लोकतांत्रिक शक्तियों की भूमिका व हमारे संघर्ष में उनके अंशदान को हम नम्रता से स्वीकार करते हैं। जिनके पैर शूद्रों और दलितों को ठोकर मारते थे, उनके दर्प को तोड़ने का काम लालू प्रसाद ने किया।

मुख्यमंत्री बनने के बाद 90 में अलौली में लालू जी का पहला कार्यक्रम था मिश्री सदा कालिज में। पिताजी उसी कालिज में गणित के व्याख्याता थे। कर्पूरी जी को याद करते हुए लालू जी ने कहा, “जब कर्पूरी जी आरक्षण की बात करते थे, तो लोग उन्हें मां-बहन-बेटी की गाली देते थे। और, जब मैं रेज़रवेशन की बात करता हूं, तो लोग गाली देने के पहले अगल-बगल देख लेते हैं कि कहीं कोई पिछड़ा-दलित-आदिवासी सुन तो नहीं रहा है। ज़ादे भचर-भचर किये तो कुटैबो करेंगे। ये बदलाव इसलिए संभव हुआ कि कर्पूरी जी ने जो ताक़त हमको दी, उस पर आप सबने भरोसा किया है।”

लगातार पाँच चुनावों (फरवरी 05 व अक्टूबर 05 का विधानसभा चुनाव, 09 का लोस चुनाव, 10 का विस चुनाव एवं 14 का लोस चुनाव) में करारी हार के बाद आदमी सत्ता के गलियारे में अलबला के न जाने किस-किस से हाथ मिलाने को तैयार हो जाता है, मगर लालू प्रसाद ने भाजपा के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया। इसीलिए, वे जॉर्ज फर्णांडिस, शरद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार से कहीं ज़्यादा बड़े नेता के रूप में अक़्लियतों के बीच स्थापित हैं। ऐसा नहीं कि जॉर्ज-शरद-रामविलास-मुलायम की पहले की लड़ाई को लोग भूल गये हैं या उसकी क़द्र नहीं है। लेकिन, सामाजिक न्याय साम्प्रदायिक सौहार्द के बगैर अधूरा रहेगा। लालू प्रसाद के प्रति मेरी अपनी आलोचनाएँ हैं, पर सियासी मूल्यांकन सदैव निरपेक्ष नहीं हो सकता। देश की मौजूदा परिस्थिति में मेरी यही मान्यता है। यह भी सच है कि जम्हूरियत में चुनाव ही सबकुछ नहीं है, सामाजिक-सांस्कृतिक जागृति के लिए उत्तर भारत में व्यापक स्तर पर कोई पहल कम ही हुई है।


कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार-सा है। (कैफ़ी आज़मी)

बाक़ी बातें एक तरफ, लालू प्रसाद का सेक्युलर क्रेडेंशियल एक तरफ। लालू जी की इसी धर्मनिरपेक्ष छवि का क़ायल रहा हूं। 90 के बाद बिहार में कोई बड़ा दंगा नहीं होने दिया। मौजूदा हालात में जहां धर्मनिरपेक्ष देश को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करने की जबरन कोशिश की जा रही है, वैसे में सामाजिक फ़ासीवाद से जूझने का जीवट रखने वाले नेता कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकते। बिहार में किसी को अपना कार्यकाल पूरा करने नहीं दिया जाता था।

कर्पूरी ठाकुर पर घोटाले का कहीं कोई आरोप नहीं था, पर दो-दो बार उनकी सरकार नहीं चलने दी गई। 70 के उत्तरार्ध में सिर्फ़ सिंचाई विभाग में वे 17000 वैकेंसिज़ लेकर आते हैं, और जनसंघी पृष्ठभूमि के लोग रामसुंदर दास को आगे करके एक हफ़्ते के अंदर सरकार गिरवा देते हैं। जहां एक साथ इतने बड़े पैमाने पर फेयर तरीक़े से ओपन रिक्रुटमेंट हो, वहां मास्टर रोल पर सजातीय लोगों को बहाल कर बाद में उन्हें नियमित कर देने की लत से लाचार जातिवादी लोग इस पहल को क्योंकर पचाने लगे।

श्री कृष्ण सिंह के बाद अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा करने वाले लालू प्रसाद बिहार के पहले मुख्यमंत्री हैं। हां, अंतर्विरोधों से दो-चार होना भारतीय लोकतंत्र की नियति बनती जा रही है, जो कचोटता है। जिसने संचय-संग्रह की प्रवृत्ति से पार पा लिया, वह संसदीय राजनीतिक इतिहास में कर्पूरी ठाकुर-मधु लिमये की भांति अमर हो जाएगा। ऐसे त्याग की भावना के साथ  जनसेवा करने वाले जनता के नुमाइंदे विरले आते हैं। पर, मैं आश्वस्त हूं कि आज भी भले लोग हैं जो ओछी महत्वाकांक्षाओं से परे समाज में परिवर्तन के पहिए को घुमाना चाहते हैं ताकि व्यक्ति की गरिमा खंडित न हो, सब लोगों के लिए प्रतिष्ठापूर्ण जीवन सुनिश्चित हो सके।

नीतीश जी ने कहा है कि लालू जी का जीवन संघर्ष से भरा है। वे जिस तरह के बैकग्राउंड से निकलकर आए हैं और जिस ऊंचाई को हासिल किया है, वह बहुत बड़ी बात है।

90 के दौर में जब आडवाणी जी रथयात्रा पर निकले थे और बाबरी को ढहाने चले थे, तो लालू प्रसाद ने उन्हें समस्तीपुर में नाथ दिया था। सभी राष्ट्रीय नेताओं की मौजूदगी में पटना की एक विशाल  रैली में वे कहते हैं, “चाहे सरकार रहे कि राज चला जाए, हम अपने राज्य में दंगा-फसाद को फैलने नहीं देंगे। जहां बावेला खड़ा करने की कोशिश हुई, तो सख्ती से निपटा जाएगा। 24 घंटे नज़र रखे हुए हूँ। जितना एक प्रधानमंत्री की जान की क़ीमत है, उतनी ही एक आम इंसान की जान की क़ीमत है। जब इंसान ही नहीं रहेगा, तो मंदिर में घंटी कौन बजाएगा, जब इंसान ही नहीं रहेगा तो मस्जिद में इबादत देने कौन जाएगा ?”

लालू प्रसाद अपने अंदाज़ में मीडिया को भी अपनी साख बचाए व बनाए रखने की सीख देते हैं। ‘राष्ट्रीय पत्रकारिता’ के हवनात्मक पहलू के उभार के दौर में बतौरे-ख़ास एक नज़र :

मनोरंजन भारती : कुछ ज्ञानवर्धन कीजिए सर हमारा।
(Please, enlighten me on your ideals in life.)
लालू प्रसाद : ज्ञानवर्धने है, हरा-हरा सब्जी खाओ, दूध पियो, और सच्चा ख़बर छापा करो।
(Eat green vegetables, drink milk and tell the truth in your reports.)
(सौजन्य से : NDTVClassics)

उसी चारा घोटाले में फसने जगन्नाथ मिश्रा जगन्नाथ बाबू बने रहते हैं, पर लालू प्रसाद ललुआ हो जाते हैं। लालू प्रसाद से ललुआ तक की फिसलन भरी यात्रा में लालू प्रसाद की सारथी रही मीडिया का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण तो करना पड़ेगा न…

परिवार के आग्रह और पुत्रमोह व भ्रातृप्रेम में रामविलास पासवान अपना धड़ा बदलें, तो उसूल से भटका हुआ, पदलोलुप, अवसरवादी और न जाने क्या-क्या हो जाते हैं, वहीं कर्नाटक के मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र के राज्यपाल व देश के विदेश मंत्री रहे एस. एम. कृष्णा, दिग्गज कांग्रेसी नेता व युपी के मुख्यमंत्री रहे हेमवतीनंदन बहुगुणा की पुत्री व युपी कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं रीता बहुगुणा जोशी, और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे उनके पुत्र विजय बहुगुणा कांग्रेस से सीधे भाजपा की गोद में जाकर बैठ जाते हैं, तो उस पर कोई हंगामा नहीं बड़पता, कोई चर्चा नहीं होती, उन्हें मीडिया की मंडी में खलनायक सिद्ध करने के लिए सांध्यकालीन बहस में टीवी के पर्दे हिलने नहीं लगते; उल्टे वो महान बागी व दूरदर्शी नेता कहलाते हैं।

आख़िर क्या वजह है कि घनघोर शुद्धतावादियों की निर्मम-निष्ठुर आलोचनाओं का दायरा लालू-मुलायम-नीतीश के चंदन-टीका करने से नवब्राह्मणवाद की उत्पत्ति तक ही सीमित रहता है ?

महिला आरक्षण बिल पर कोटे के अंदर कोटे की लड़ाई जिस तरह लालू प्रसाद ने शरद जी व मुलायम जी के साथ सदन के अंदर लड़ी, वो क़ाबिले-तारीफ़ है। आख़िर को वंचित-शोषित-पसमांदा समाज की महिलाएं भी क्यों नहीं सदन का मुंह देखें ? इतना-सा बारीक फ़र्क अगर समझ में नहीं आता, और संपूर्ण आधी आबादी की नुमाइंदगी के लिए संज़ीदे सियासतदां की पहल व जिद को कोई महिला विरोधी रुख करार देता है, तो उनकी मंशा सहज समझ में आती है। वे बस विशेषाधिकार प्राप्त महिलाओं को सदन में देखना चाहते हैं, ग़रीब-गुरबे, हाशिये पर धकेली गई, दोहरे शोषण की मार झेल रही खवातीन उनकी चिंता, चिंतन व विमर्श के केंद्र में नहीं हैं।

लालू प्रसाद के कामकाज की शैली के प्रति मेरी अपनी समीक्षा है, और आलोचना व असहमति लोकतंत्र की बुनियादी शर्त हैं। आशा है कि पूर्व में की गई कतिपय प्रशासनिक भूलें नहीं दुहराई जाएंगी, और वर्तमान सरकार समतामूलक समाज की स्थापना हेतु कुछ क़दम और आगे बढ़ाएगी।

– जयन्त जिज्ञासु
(ये लेखक के निजी विचार हैं। जयन्त जिज्ञासु जेएनयू में शोधार्थी हैं।)

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