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विमर्श

ठेठ लालू, शिक्षा और वंचित तबका…

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क्रांति ज्योति ज्योतिबा फुले जी ने कहा है कि “विद्या के अभाव में मति गयी,मति के बिना नीति गयी, नीति के बिना गति गयी,गति के बिना वित्त गयी,वित्त के बिना शूद्रों की अधोगति हो गयी। इतने सारे अनर्थ एक अकेली अविद्या के कारण ही हुए।” बाबा साहब डॉ भीम राव अम्बेडकर साहब ने भी कहा है कि “शिक्षा वह शेरनी का दूध है जिसे जो पियेगा वह गुर्राएगा।”

मैं निःसंकोच कह सकता हूँ कि बिना शिक्षा के सब कुछ ब्यर्थ है इसीलिए शायद तुलसी दास जी ने भी लिख डाला है कि “शूद्र, गंवार, ढोल, पशु, नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी।” तुलसी दास जी को बखूबी भान था कि शूद्र को पढ़ने का अधिकार है नही, स्त्री को पढ़ने का अधिकार है नही फिर ये दोनों गंवार होंगे ही होंगे और गंवार तो गंवार ही है। पशु ज्ञान/विवेक शून्य है ही और फिर उससे बने चमड़े के ढोल का क्या? जब जिंदा पशु डंडे से पीटा जाता है तो उसका मरा चमड़ा बिन पीटे बजेगा नही, गंवार, शूद्र और स्त्री जब बिन पढ़े-लिखे हैं तो विवेक,ज्ञान,बुध्दि से उनका वास्ता होगा नही फिर वे पीटे जाएंगे ही।

भारतीय समाज कितनी विसंगतियों से परिपूर्ण रहा है कि एक पूरा 85 से 90 प्रतिशत इंसानों का हिस्सा ज्ञान-विज्ञान से महरूम रखा गया, वह भी जबरन/बलात कानून बना के। मनुस्मृति ने स्पष्ट विधान बनाया कि शूद्र मतलब 85-90 प्रतिशत दलित/पिछड़ा/आदिवासी आबादी पुस्तक छू ले तो हाथ काट डालो, कथित ज्ञान की बातें सुन ले तो कान में रांगा पिघला के डाल दो,कथित ज्ञान की बातें उच्चारित कर दे तो जीभ काट लो। ऐसा दुनिया के किसी भी असभ्य से असभ्य देश में नही हुवा है।

भारत देश मे ज्ञानार्जन के लिए शम्बूक से लेकर एकलब्य से होते हुए जान देने वालो और सजा पाने वालों की एक लंबी श्रृंखला है।कालांतर में कबीर,रैदास,नानक, फुले,सावित्री बाई,पेरियार,गाडगे,अम्बेडकर,लोहिया आदि असंख्य नाम हैं जिन्होंने इस अन्यायपूर्ण मनुवादी एकाधिकारवादी आरक्षण का प्रतिकार कर वंचितो को हक दिलाने का अभियान छेड़ा।

वर्तमान समय मे बिहार जैसे सामंतवादी राज्य में लालू प्रसाद यादव जी का अभ्युदय मेरी नजर में इन महापुरुषों की प्रेरणा से एक ऐसे ही महामानव के रूप में हुई है जिसने बिहार की राजसत्ता में मजबूत होने के बाद बिहार के दलित, दमित, पिछड़े, अहीर, लोहार, कोहार, नाई, धोबी, तेली, मुसहर, मल्लाह, कान्दू, कलवार, हेला, भंगी, चमार, पासी, दुसाध, लोनिया आदि हजारो जातियों को शिक्षोन्मुख किया।

लालू जी ने बचपन मे खुद भैंस चराया,अपने पिताजी के अशिक्षित व अहीर जाति का होने के नाते सामंती व मनुवादी प्रबृत्ति के लोगो द्वारा अपमानित होते देखा।लालू जी ने सर्वेन्ट क्वार्टर में रह करके पढ़ाई किया,पटना यूनिवर्सिटी से स्नातक कर छात्रसंघ अध्यक्ष बन महसूस किया कि शिक्षा/ज्ञान/मति में कितनी असीम ऊर्जा है।यह परमाणु बम से भी ज्यादा शक्तिशाली है। शिक्षा के महत्व को शिद्दत से समझने वाले लालू जी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद दलितों/पिछ्डों/अल्पसंख्यको को पढ़ने-पढ़ाने की ओर उन्मुख किया।शिक्षकों की बहुत बड़े पैमाने पर भर्ती की, विश्वविद्यालय से लेकर निचले स्तर तक के कॉलेज खोले। लालू जी सभाओ और गोष्ठियों में पढ़ने हेतु प्रेरित करना शुरू किए।

पूरी दुनिया को बिहार से “चरवाहा विद्यालय” का कॉन्सेप्ट यह चरवाहा बिरादरी का सुलायक बेटा लालू यादव ही दिया। चरवाहा विद्यालय का कॉन्सेप्ट बिल्कुल अलाहिदा और अजूबा था जो कोई भुक्तभोगी ही दे सकता था।लालू जी ने बिहार में गरीब एवं वंचित लोगों को पढ़ने को उद्यत किया।

मण्डल कमीशन की लड़ाई को लड़ करके उसे सदन और सर्बोच्च न्यायालय से मुक्त कराने का काम लालू जी ने बड़ी मेहनत के साथ किया।लालू जी ने खुद मुख्यमंत्री रहते त्रिस्तरीय आरक्षण (ओवरलैपिंग आरक्षण) प्रभावी बना दिया जो यूपी में अब तक नही हो सका है। बिहार में 1989 के बाद दलित/वंचित/पिछड़े वर्ग के पढ़े-लिखे-नौकरी कर रहे लोगो की एक बहुत बड़ी श्रृंखला तैयार हो चुकी है जो आज भले ही लालू जी के योगदान की न समझे लेकिन मैं 1889 के पूर्व की भी स्थिति देखा हूँ और आज की भी स्थिति देख रहा हूँ इसलिए बिना संकोच के कह सकता हूँ कि फुले और अम्बेडकर ने जो बातें सिद्धांत रूप में शिक्षा के प्रति दी थीं उन्हें लालू जी ने बिहार जैसे सामंतवादी प्रदेश में प्रयोग कर जमीन पर उतार करके जहां अपने इन पुरखो को श्रद्धांजलि दी है वहीं सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े,आदिवासी, अछूत लोगो को मुख्यधारा में जोड़ने का कार्य किया है।

जिस विद्या के बिना वंचितों की मति, नीति, गति और वित्त का ह्रास हुवा उस विद्या से इन्हें जोड़ने हेतु लालू जी ने जो महाभियान बिहार में चलाया आज वह सुफल है जिसके लिए मैं लालू जी को साधुवाद देता हूँ और मेरा यह निश्चित मत है कि आज मनुवादियो, हस्तिनापुरवादियो, नारदीय परंपरा की वाहक ताकतों द्वारा लालू जी को अपमानित करने के पीछे यही कारण है कि लालू जी ने क्यो वंचित तबकों को समझदार,लड़ाकू,पढ़ाकू, होनहार, नेतृत्वकर्ता बनाने का अभियान छेड़ा। लालू जैसे लोग सदियों में एकाध पैदा होते हैं जो अपमान का जहर पीकर औरों को सम्मान का अमृत बांटते हैं। लख-लख सलाम लालू जी!

(ये लेखक के निजी विचार हैं। चंद्रभूषण सिंह यादव ‘यादव शक्ति’ त्रैमासिक पत्रिका के प्रधान संपादक हैं।)

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