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औरत होना यानी हर हाल में दो पाटों के बीच पिसना

वही चूल्हा चौका, वही बच्चे पैदा करना, वही घर की चारदीवारी और वही बात-बात पर मर्दों का मुंह ताकना। पर धीरे-धीरे शिक्षा के बढ़ते स्तर ने स्त्रियों को अपने विषय में सोचने का मौका दिया। शिक्षा पूरी होने के वक्त से ही लड़कियों को स्वतंत्रता का स्वाद लग चुका होता है। अब वह इस स्वतंत्रता का भरपूर आनंद उठाना चाहती हैं। वह वापस घर की जंजीरों में कैद नहीं होना चाहती। इसलिए, पढ़ाई पूरी होते ही नौकरी कर स्वयं को स्थापित करने की इच्छा अंकुरित होने लगती है।

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हलांकि शादी के बाद भी औरतों को नौकरी करने की इजाजत समाज और घर- परिवार देने लगा है किंतु इजाजत तो दे दिया लेकिन घर और बाहर संभालने की दोहरी जिम्मेदारी भी ओढ़ा दी गई। जिसकी वजह से वह ऑफिस की जिम्मेदारी और घर की जिम्मेदारी के मध्य पीसी जाने लगी। ऑफिस में अक्सर उसे यह कहकर नीचा दिखाया जाने लगा कि यदि बच्चे और घर परिवार की इतनी फिक्र है तो घर ही बैठना था न…नौकरी करने की क्या आवश्यकता थी? और घर पर यह ताना दिया जाता है कि काम करती हो तो एहसान नहीं करती। अपने पति और अपने बच्चों के लिए कमाती हो, इसलिए रौब दिखाने की या साहिबगिरी झाड़ने की जरूरत नहीं है।

औरत हो तो औरत के तरीके से ही रहना होगा, मर्द बनने की कोशिश करने की आवश्यकता नहीं है। यानी उसे हर हाल में दो पाटों के बीच पिसना ही है। उसका दिन का सुकून और रात में की नींद हराम हो जाती है वह अलग। इसलिए, लड़कियां अब शादी के बंधन से ही कतराने की लगी हैं। वे अपने जीवन को पति और बच्चों के अलावा भी देखती हैं। यह एक ऐसी पहल है जिसकी इजाजत घर परिवार और समाज दोनों नहीं देता। लड़का हो या लड़की आखरी पड़ाव शादी ही माना जाता है। पर लड़कों के लिए बंदिशें उस तरह से नहीं लागू होती हैं जैसे औरतों पर लाद दिया जाता है।

https://youtu.be/WNy-GK0E4EM

परंतु क्या एकल जीवन इतना आसान है? जी नहीं, क्योंकि समाज उसकी इस स्वच्छंदता को चरित्रहीनता से जोड़कर देखने लगता है और यह दुहाई दी जाने लगती है कि यह हमारी भारतीय परंपरा और संस्कृति के विपरीत आचरण है। यानी शादीशुदा होना चरित्रवान होने का सर्टिफिकेट मान लिया जाता है। ऐसे में यदि स्त्री का कोई पुरुष मित्र है तो संदेश को यकीन का जामा अविलंब पहना दिया जाता है।

आसान नहीं होता एकल जीवन जीना क्योंकि प्रश्न पूछती निगाहें हर वक्त पीछा करती रहती हैं। और चरित्र हनन की मुहर बिना कहे ही लगा दी जाती है। किंतु इन सब को इग्नोर करते हुए आज स्त्री अपनी एकल जिंदगी से खुश भी है और संतुष्ट भी।


 

– ये लेखिका के निजी विचार हैं।

 

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