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मोदी ने शौच करती महिलाओं की फोटो लेने वाली ‘हत्यारी भीड़’ खड़ी कर दी

राजस्थान में सीपीआई-एमएल कार्यकर्ता जफर हुसैन को सरकारी कर्मचारियों ने इसलिए पीटकर मार डाला क्योंकि वो शौच कर कर रही महिलाओं का फोटो खींचने से मना कर रहे थे। वे महिलाएं जिस कच्ची बस्ती से आती हैं, वहां शौचालय न होने के बाबत वे पहले भी शिकायत कर चुके थे।

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यदि आपको यह बात अविश्वसनीय लग रही हो कि सरकारी कर्मचारी शौच कर रही महिलाओं की तस्वीर भला क्यों उतारेंगे तो जान लीजिए – ‘स्वच्छ भारत’ अभियान को सफल बनाने के लिए हमारे राज्य के कुछ जिलों में बाक़ायदा ज़िला शिक्षा अधिकारियों द्वारा स्कूल शिक्षकों की ड्यूटी लगायी गयी थी कि वे सुबह पाँच बजे उठकर घूमेंगे और खुले में शौच कर रहे लोगों की तस्वीरें खींचकर उसी समय व्हाट्सएप करेंगे। यही नहीं, जिन बच्चों के घरों में शौचालय नहीं है, प्रार्थना में उन्हें शेष से अलग करके अपमानित करने के भी निर्देश थे।

राजस्थान में लम्बे अरसे तक रहे और अब झारखण्ड निवासी कॉमरेड जिज्ञासु ने उनके बारे में लिखा है, “अपने डेढ़ दशक के राजस्थान प्रवास के दौरान जिन चुनिन्दा साथियों के साथ गरीबों, अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों और महिलाओं की समस्याओं के समाधान के लिए संघर्ष करने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ उन साथियों में से एक अत्यंत जुझारू और संघर्षशील साथी थे कामरेड ज़फर हुसैन।

कई आन्दोलनों में राजस्थान पार्टी कमिटी ने मुझे उस क्षेत्र में संगठन निर्माण के लिए जिम्मेवारी दी जहाँ कामरेड ज़फ्फर कार्यरत थे। कामरेड चंद्रदेव ओला और शंकरलाल चौधरी के साथ मिलकर आन्दोलन और संघर्ष की रणनीति बनती थी। राजस्थान निर्माण मजदूर संगठन हो या ट्रेड यूनियन के मोर्चे पर संगठनात्मक गतिविधियाँ- हर वक़्त कामरेड ज़फर तैनात रहते थे।

https://www.youtube.com/watch?v=OvxuYn9Grmg

मोदी सरकार के स्वच्छ भारत अभियान ने उनकी जान ले ली। प्रतापगढ़ आदिवासी बहुल इलाका है। एक दशक से भी ज्यादा समय से गरीबों के लिए आवाज़ उठाकर आरएसएस और बीजेपी की आँखों की किरकिरी बन गए थे कामरेड ज़फर। एक तो मुसलमान ऊपर से कम्युनिस्ट क्रांतिकारी। फासीवादी सोच की वर्तमान अवधारणा ने स्वच्छ भारत अभियान की पोल खुलते देख उन्हें निशाना बनाया।


शौचालय नहीं, महिलाएं खुले में शौच को बाध्य और बीजेपी आरएसएस के लोग इस स्थिति की तस्वीरें लगातार ले रहे थे। महिलाओं को बेईज्ज़त कर रहे थे। संघर्ष की बुलंद आवाज़ एक बार फिर मुखर हुई। कामरेड ज़फर ने विरोध करना शुरू किया। शौच करती महिलाओं की तस्वीरें क्यों ले रहे हो _ बस, क्या था। निशाना बना डाला जालिमों ने। पीट पीट कर मार डाला कामरेड ज़फ्फर को।”

वैसे यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि इस सरकार की सारी बड़ी पहलकदमियाँ अंततः दलित, अल्पसंख्यक, किसान, मजदूर विरोधी ही क्यों साबित होती हैं। आपातकाल को याद कीजिये। तब भी बड़ी मानीखेज पहलकदमियाँ हुई थीं।

‘लिंचिंग मॉब’ एक मानसिकता है। यह मूलतः वर्णाश्रमवादी मानसिकता है। ढेर से व्हाट्सएप वीडियो आपको धीरे धीरे इसके प्रति सहज बनाते हैं। हत्यारी भीड़ एक दिन में नहीं बनती है।

अखलाक, पहलू खान और और आज मारे गए जफ़र हुसैन में एक और समानता है। ज़फर हुसैन के खिलाफ भी ऍफ़ आई आर हुई है- सरकारी काम काज में बाधा डालने की। ये सारे मृतक दोषी थे। इनके हत्यारे बेगुनाह हैं। रामराज्य आ ही गया है।

(लेखक राजकीय महाविद्यालय,डूंगरपुर में लेक्चरर हैं।)

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