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विमर्श

नीतीश कुमार: धारणाप्रधान राजनीति का अविश्वसनीय होता छवि केंद्रित चेहरा

मुल्क की राजनीति के क्रीड़ांगन में हर किसी ने नियमों का, मान्यताओं का, मैत्री-धर्म का व सियासी पाकीज़गी का मज़ाक उड़ाया है। ये ऐसा उपन्यास है, जिसमें हर एक किरदार ने हर दूसरे पात्र को किसी-न-किसी मोड़ पर धोखा दिया है। देश को हर मुसीबत में परिवर्तन के पहिए के लिए ज़मीन मुहैया कराने वाले बिहार की राजनीतिक उठापटक तेजी से बदल रही है। इसमें नीतीश कुमार के विपक्ष के साथ असहयोगात्मक रवैये और उनकी अतिशय महत्वाकांक्षा व छिछली अवसरवादिता सामने आई है।

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लोग इसे केंद्र सरकार द्वारा सीबीआई का बेजा इस्तेमाल करके विपक्षी नेताओं पर चयनित कार्रवाई के रूप में, तो कोई राष्ट्रपति चुनाव में दलित राजनीति की आड़ में भाजपा की अपनी स्वार्थसिद्धि के सहज साधन के रूप में देख रहा है। जिनकी याद्दाश्त थोड़ी ठीक-ठाक है, वो भाजपा के अकस्मात उमड़े परिस्थितिजन्य दलित-प्रेम के निहितार्थ को बख़ूबी समझ सकते हैं। वो शायद नहीं भूले होंगे कि यही भाजपा (जनसंघ) है, जिसने जननायक कर्पूरी ठाकुर के साथ गालीगलौज करते हुए रामसुंदर दास को आगे कर अपना दाँव चला था। ये कोई पहला मौक़ा नहीं है, जब भाजपा का दिल दलित के लिए धड़क रहा है। प्रतीकों को भुनाने के क्रम में पटेल, गाँधी, अंबेडकर के बाद भाजपा अब बिहार में पूरी बेशर्मी के साथ कर्पूरी की ओर लार टपकाते हुए देख रही है। पर, ये तो बिहार की उर्वर राजनीतिक ज़मीन है, जनाब। यहाँ इतनी आसानी से जोड़, जुगत, जुगाड़, तिकड़म, छल-प्रपंच या षड्यंत्र से किसी की दाल नहीं गलती।

एक राजनीतिक कार्यकर्ता के हवाले से एक वाक़ये से नीतीश कुमार को समझने में मदद मिलेगी। एक लोकसभा चुनाव में पर्चा दाखिल करने से पहले नीतीश जी पासवान जी के भाई पशुपति कुमार पारस के ह्वीलर रोड स्थित कार्यालय पहुंचे। पारस से वे बोले कि पारस भाई, चलिए, दस आदमी चलकर नोमिनेशन कर आते हैं। गाड़ी है नहीं ज़्यादा, पैसे हैं नहीं मेरे पास, कार्यकर्ता सब मेरा माथा नोच रहा है। पारस जी हंसे और बोले कि अब कार्यकर्ता है, तो मिठाई-उठाई, धूमधाम से नोमिनेशन चाहेगा ही। वे अंदर गए और पार्टी को मिला कुछ चंदा लाकर उनके हाथ पर रख दिया। बोले, जाइए, बढ़िया से कीजिए।

यह कहने का मेरा लब्बोलुआब बस इतना है कि नीतीश कुमार में हर वो खामी हो सकती है जो येन-केन-प्रकारेण सत्ता तक पहुँचने और वहाँ बने रहने की ख़्वाहिश रखने वाले एक तिकड़मी नेता में होती है। पर, जो एक बात उनके पक्ष में जाती है, और जिसकी वजह से लोगों के बीच वो एक धारणा बनाने में सफल रहे, वो ये कि व्यक्तिगत रूप से उनके अंदर धनलिप्सा, धनसंचय, आदि दुर्गुण उस परिमाण में नहीं है।

रही बात भ्रष्टाचार की, तो उनके पहले कार्यकाल के आख़िरी वर्ष में 500 करोड़ रुपये का बहुत बड़ा आबकारी घोटाला सामने आया,और खुलासा करने वाले कोई और नहीं, बल्कि ख़ुद आबकारी (उत्पाद एवं मद्यनिषेध) मंत्री जमशेद अशरफ़ थे। उन्होंने मुख्य सचिव को बताया, जब उधर से हरकत नहीं हुई, तो मुख्यमंत्री को 9 पन्ने की चिट्ठी लिखकर निगरानी विभाग या महालेखाकार से जांच कराने की सलाह दी। एक सप्ताह तक ख़बर चली, पर विज्ञापनों से मीडिया का मुंह उन्होंने ऐसा भर रखा था कि ख़बर दब गई। नीतीश कहते रहे कि वित्तीय समंजन में गड़बड़ी का मामला है जो हर ज़िला से विभाग को भेजी जाने वाली रिपोर्ट में देरी के चलते हुई। विपक्ष सीबीआई जांच की मांग करता रह गया, पर नीतीश जी ने बड़ी ढिठाई से संबंधित मंत्री को ही सैक कर दिया यह कहते हुए कि अराजनीतिक व्यक्ति को राजनीति में प्रोमोट करने से ऐसे ही नुक़सान उठाना पड़ता है। जबकि मंत्री अंत तक मुख्यमंत्री पर भ्रष्ट अफ़सरों को बचाने का आरोप लगाते रहे। पर, सुशासन की छवि बिगड़े नहीं, इसलिए मंत्री को बलि का बकरा बना दिया गया।


बहरहाल, धारणाप्रधान राजनैतिक समाज में नीतीश जी को स्टैंड वाइज़ ढुलमुल, पर ऐसे ज़ाती तौर पर ईमानदार माना जाता है। वैसे ईमान का पैमाना इतना नीचा और मूल्यांकन की परिधि इतनी सीमित हो, तो आप महज़ “टू चीयर्स फॉर डेमोक्रेसी” कह सकते हैं। कभी बाल गांधी कहे जाने वाले नीतीश जी पता नहीं विपक्ष के साथ कौन-सा असहयोग आंदोलन चला रहे हैं। राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए के उम्मीदवार को जदयू ने समर्थन दिया। जिस वक़्त जिसका जलवा होता है, नीतीश जी उसी के हो लेते हैं। जस्टिफ़िकेशन ढूंढने में इनका कोई सानी नहीं। शुरू से मजमा लूटने वालों के ही साथ रहे। इनकी चौअनिया मुस्कान को कोई न पढ़ पाया।

इनके मन की बात अभी मन की बात करने वाले ही समझते। दिल की बात न इन्होंने की, न स्वभाव में है। ये पहले डगर-डगर पर दारू की दुकान खोलते हैं, फिर शराबबंदी में मानव चेन का अभिनय करते हैं। पूरा विपक्ष चलेगा पूरब तो ये चलेंगे पश्चिम। इनकी आधी बात मुंह में, आधी बात पेट में रहती है। ढोंग में इनका कोई जवाब नहीं। नीतीश कुमार के बारे में कहा जाता है कि ये हाफ़ रोंग, हाफ़ राइट रहते हैं, इन्हें ढुलमुल कुमार कहना ज़्यादती नहीं होगी। “जीत मामु जीत जेकरे जीत ओकरे दिस” (मने जिसकी जीत होगी, हम उसी की तरफ होंगे)- इसको अगर नीति कहते हैं, तो यह बड़ी स्वार्थी, भद्दी और क़िला भिड़ाते हुए Glorious Defeat (गौरवशाली हार) की परंपरा के मज़ाक और अपमान की नीति है। किसी भी क़ीमत पर जीतने वाले का जयकारा लगाने वाले फूहड़ ही नज़र आते हैं। इसमें नीतिज्ञ होने जैसी कोई बात नहीं जिसे चेरिश किया जा सके। वसीम बरेलवी साब नीतीश जी को बहुत पहले पहचान गए थे। इनका स्वभाव है – “इधर का लगता रहे, उधर का हो जाए”। पतंग जैसा ये उड़ना भी कोई उड़ना है / के उड़ रहे हैं मगर दूसरों के हाथ में।

नीतीश जी, जब कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहते हैं कि मैं किसी का पिछलग्गू नहीं, तो बस हंसी आती है। वो कौन आदमी था जो धीरे से कांग्रेस को 40 सीटें थमा आया, सिर्फ़ इसलिए कि चुनाव के पूर्व ही दबाव की राजनीति बनाकर उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया जाए। हम तो इसे 242 विधायकों के मुख्यमंत्री होने की संवैधानिक संभावना को समय से पहले ही ख़त्म कर देने के रूप में देखते हैं। संसदीय लोकतंत्र में ऐसा चलन बंद होना चाहिए चाहे जो भी दल उसे बढ़ावा दे।

युपी में प्रेस कांफ्रेंस कर रहे लोगों को गिरफ़्तार किया जा रहा है, पर नीतीश कुमार को व्यक्ति विशेष और नीतिविशेष– नोटबंदी, सीटबंदी, जीएसटी को समर्थन करने से फ़ुर्सत नहीं मिलती। संस्थानों के अंदर संवैधानिक प्रावधानों व सकातात्मक कार्रवाइयों के कुचले जानेपर इनका कोई बयान नहीं आता। ध्यान रहे कि इतिहास सेटिंगबाज़ों को याद नहीं रखता, और लड़ने व गाली सुनने वाले कभी बिसराए नहीं जाते। एक तरफ लालू जी की भरोसेमंद धर्मनिरपेक्ष छवि है तो दूसरी ओर नीतीश जी की अनप्रेडिक्टेबल हिस्ट्री। सच ये है कि सामाजिक-सांप्रदायिक सौहार्द हेतु गैरसमझौतावादी सोच व दृष्टि के साथ-साथ प्रशासनिक कौशल व दृढ़ता से सत्ता-शासन चलता है। इसलिए, आज और कल हमें बिहार में एक ऐसे नेतृत्व क्षमता का आदमी चाहिए जो (लालू + नीतीश) / 2हो। जनता मांग रही है– “टू इन वन”।

सामाजिक न्याय की राह पकड़ने वाले को आरंभ से ही लोभ का त्याग, इच्छाओं को कम और अपनी ज़रूरतों को सीमित करने की कला सीखनी चाहिए। एक बात आपको गांठ बांध लेनी चाहिए कि कोई लाख गड़बड़ करे, आपको लोभलालच और धनसंचय में नहीं पड़ना है। अगर इस दलदल में फंसे, तो फिर अतीत में चाहे आपका कितना भी लिबरेटिव रोल रहा हो, वह ढक जाएगा। फलां ने भी किया तो कहां कुछ हो रहा उनके साथ, ऐसा कहके आप कन्विंस नहीं कर सकते। उनके पास ग़लत करके बच निकलने के सैकड़ों रास्ते हैं, आपके पास नहीं, और न ही आपको चोरगली ढूंढने के पीछे समय ज़ाया करना चाहिए। फिर भी मन नहीं मानता तो परेशानी तो झेलनी पड़ेगी। ऐसा करके ये नेता ख़ुद के लिए तो आफत मोल लेते ही हैं, बहुतों की मामूली उम्मीदों पर भी पानी फेरते हैं।

आरएसएस का मुक़ाबला धनलिप्सा में उलझे रहकर, भ्रष्टाचार में फंस कर तो नहीं कर सकते। इतनी सीधी बात समझ में नहीं आ रही, तो रहने दीजिए। जो अकूत धन भाजपा-कांग्रेस वाले जमा करते- रहे हैं, वही आप भी करेंगे, तो फिर आपको झूला झुलाने के लिए जनता थोड़े चुनती है? आपकी जनता आपको राजसी ठाठबाट व उद्योगपति घराने में शुमार होते देखना नहीं पसंद करती, वो आपको सियासी रूप से सबल और बेदाग़ देखना चाहती है, ताकि वो ख़ुद को सशक्त और सुरक्षित महसूस कर सके, उसका नैतिक बल कभी कमज़ोर न पड़े, समाज में चौकचौराहे पर खड़े अगलगुआ को जवाब देते हुए उसे दाएं-बाएं नहीं झांकना पड़े। कहां लेकर जाइएगा ये पचास जगह जो अट्टालिका खड़ी करते जा रहे हैं, सब यहीं रह जाना है। यह सच है कि कर्पूरी जी और रामनरेश जी ने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा था, फिर भी उनकी शान में लोग अपनी अद्भुत तुकबंदी कला का प्रदर्शन करने लगे :

दिल्ली से चमरा भेजा संदेश
कर्पूरी केश बनावे,
भैंस चरावे रामनरेश।

कर कर्पूरी कर पूरा
छोड़ गद्दी, धर उस्तुरा।

आरक्षण कहां से आई
कर्पुरिया की माई बिआई।

एमए – बीए पास करेंगे
कर्पुरिया को बांस करेंगे।

बिहार के मेरे कुछ अभिन्न मित्र इन दिनों लगातार पूछते हैं कि लालू प्रसाद ने बिहार के लिए क्या किया? उनके प्रश्न, उनकी चिंताएं वाजिब हैं। पर, बिहार में 1947 से 1989 तक का हिसाब-किताब करने में जब उनकी नगण्य दिलचस्पी देखता हूँ तो मुझे बिल्कुल हैरत नहीं होती। वे श्री कृष्ण सिंह, केदार पांडेय, बिंदेश्वरी दूबे,भागवत झा आज़ाद, जगन्नाथ मिश्रा, आदि के कार्यकाल को खंगालने के लिए जब माथापच्ची नहीं करना चाहते, तो मैं उनके लिए ख़ुश होता हूँ कि इस भीषण गर्मी में अच्छा है कि इन महान मुख्यमंत्रियों पर रिसर्च करते हुए उनके पसीने नहीं छूट रहे।

इसमें कोई दो मत नहीं कि लालू प्रसाद का शासनकाल संपूर्णता में कोई आदर्श उदाहरण नहीं कहा जा सकता है। ‘विकास’ के लिहाज़ से कोई आमूलचूल परिवर्तन हो गया हो, ऐसा भी नहीं। मगर, जो लोग उस “पंद्रह साल” के मीडियानिर्मित जंगलराज के पहले कई दशक की यंत्रणा भोग रहे थे, वो क्या उस ‘मंगलराज’ को भूल जाएंगे ? चार दिन पहले ही मधुबनी के एक पुराने जेएनयूआइट से बात हो रही थी कि जगन्नाथ मिश्रा ने बिहार में उच्च शिक्षा का भट्ठा बैठाया, रातोरात प्राइवेट कालिजिज़ को कंस्टिट्युएंट युनिट में बदल कर सजातीय व दरबारी क़िस्म के लोगों को भर दिया जाता था। लालू प्रसाद के समय में बड़े पैमाने पर शिक्षकों के तबादले ने माध्यमिक शिक्षा का बंटाधार किया, और नीतीश जी ने प्राथमिक शिक्षा का बेड़ा गर्क किया।

इतना बड़ा मुंगेर ज़िला (उस समय बेगूसराय, खगड़िया, जमुई,लखीसराय, शेखपुरा – सब मुंगेर ज़िला में ही आता था) होने के बावजूद श्री कृष्ण सिंह ने वहां कितने मेडिकल-इंजीनियरिंग कालिज खोले ? एक भी नहीं। कारण बताने की ज़रूरत नहीं। फिर भी मित्रगण लालू के कार्यकाल का निर्मम मूल्यांकन करने में लगे रहते हैं।

लालू प्रसाद के शासनकाल को दो हिस्सों में देखा जाना चाहिए। उनकी एक भूमिका यह भी है कि जहाँ दलितों-पिछड़ों-आदिवासियों-अक़्लियतों को बूथ से खदेड़ दिया जाता था, और वर्चस्वशाली जातियां उन्हें मताधिकार का प्रयोग तक करने नहीं देती थीं; उसे लालू ने बंद कराया, और मामला उलट गया। उनकी दूसरी भूमिका वह है जो हमारे साथी चित्रित करते हुए किंचित निष्ठुरता दिखाते हैं।बाक़ी, बहुतेरे उचक्कों के प्रति उदारता बरतते हुए, घोटालों में फंसने के बाद लालू प्रसाद को राजनीतिक अस्पृश्य बना दिया इस देश की मीडिया ने। इस 90 के उभार को यूं भी देखना चाहिए कि अगर लालू प्रसाद नहीं आते, तो नीतीश की बारी नहीं आती, और नीतीश नहीं आते, तो मांझी को मौक़ा शायद ही मिलता।

पिछली बार मांझी ने दरअसल वही किया, जो कभी नीतीश ने किया था। आइए, आपको 90 के दशक के पूर्वार्द्ध में लिए चलता हूँ। पटना के गाँधी मैदान में जनता दल ने कोयरी-कुर्मी जाति एकता सम्मेलन आयोजित किया था और लालू प्रसाद को इसे संबोधित करना था। किन्तु, ऐन वक़्त पर उन्होंने नीतीश कुमार को अपना प्रतिनिधि बनाकर भेज दिया। उस सम्मेलन में लालू यादव के नहीं आने की ख़बर से अफरातफरी मच गयी। पर, जैसे ही नीतीश ने बोलना शुरू किया, लोग धीरे-धीरे शांत हुए और जब नीतीश कुमार का भाषण ख़त्म हुआ, कुर्मी समाज को उनका भरोसेमंद नेता मिल चुका था। कुछ विश्लेषक इसे लालू प्रसाद की पहली सियासी चूक मानते हैं। बिहार की राजनीति में जातीय गोलबंदी का एक नया खेल यहीं शुरू हो गया। नीतीश को लगने लगा कि लव-कुश (कोयरी-कुर्मी) समाज को संगठित कर वो जनता दल में ताक़तवर चेहरा बन सकते हैं। ज़ाहिर है, 1977 से विधानसभा का कई चुनाव हारने के बाद जब 89 में पहली बार वे लोकसभा पहुँचे थे, तो वी.पी. सिंह सरकार में उन्हें बतौर राज्य मंत्री काम करने का तज़ुर्बा भी हासिल हुआ। इसके पहले युवा लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते उन्हें सांगठनिक दक्षता भी प्राप्त थी। जब तक नीतीश लालू प्रसाद के कनीय साथी की भूमिका में रहे, सब ठीक चलता रहा। पर, जैसे ही लालू प्रसाद को नीतीश की सियासी हसरत की भनक लगी व जुदा राजनीतिक शैली का अहसास हुआ, उन्होंने पार्टी के अंदर नीतीश पर अंकुश लगाना शुरू किया।

एक बार बिहार भवन में नीतीश के साथ किसानों की कुछ माँग को लेकर पहुँचे ललन सिंह ने मुलाकात के क्रम में ज्योंहि लालू जी के मिज़ाज को भाँपे बगैर कुछ बोलना चाहा, लालू प्रसाद ने सीधे कमरे से बाहर कर दिया। फिर क्या था, यहीं से नीतीश और लालू के बीच कड़वाहटें बढ़ने लगीं, दरारें पनपने लगीं। और, जैसे ही जॉर्ज साहब का वरदहस्त प्राप्त हुआ, नीतीश ने बागी तेवर अपनाते हुए समता पार्टी का गठन कर डाला। पर, सामाजिक न्याय के तानेबाने में लालू के क़िले को हिलाना उस वक़्त लगभग नामुमकिन-सा था। शुरूआती ज़बरदस्त चुनावी झटकों ने नीतीश को अहसास करा दिया कि बगैर किसी मज़बूत साथी के लालू प्रसाद की सत्ता को चुनौती देना इतना आसान नहीं। यहीं वो भाजपा का दामन थमते हैं और शनैः-शनैः बिहार की सियासत की नयी इबारत लिखने में जुट जाते हैं। और, आज आलम ये है कि 17 साल की साथी रही भाजपा की शातिराना सक्रियता को नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के प्रवक्ता उसके साथ के पूर्व संबंध को राजद के साथ से ज़्यादा सहजतापूर्ण बता रहे हैं।

जो लोग आज गठबंधन के अंदर नीतीश कुमार की ज़्यादती व रहस्यमयी चुप्पी को भावुकता के चश्मे से देखते हैं, वो शायद भूल रहे हैं कि अपने उन्नयन व पार्टी के अंदरूनी लोकतंत्र को कुचलने के लिए, विरोध के हर संभव स्वर को तहस-नहस करने हेतु नीतीश ने हर अनैतिक काम किया। जिस जॉर्ज फर्णांडीस ने नीतीश को ‘बाल गाँधी’ की छवि अता की, उन्हीं का टिकट चाटुकारों के कहने पर 2009 के लोकसभा चुनाव में मुज़फ्फरपुर से काट दिया। जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे कद्दावर और शिक्षाविद् नेता दिग्विजय सिंह का टिकट काटकर उन्हें अपमानित किया। हालाँकि, उन्होंने बाँका से निर्दलीय चुनाव जीतकर नीतीश कुमार को करारा सियासी तमाचा जड़ा और साबित किया कि जनतंत्र में जनता किसी की जागीर नहीं हुआ करती। पार्टी अध्यक्ष शरद यादव, जो तीन-तीन राष्ट्रीय सरकार / गठबंधन के संयोजक रहे, तीन अलग-अलग राज्यों (मध्य प्रदेश – जबलपुर सीट, उत्तर प्रदेश – बदायूँ सीट और बिहार – मधेपुरा सीट) से लोकसभा का चुनाव जीतने वाले देश के चौथे मात्र सांसद [उनके अलावा ऐसा करने वाले तीन अन्य सांसद हैं : पी.वी. नरसिम्हा राव – बरहमपुर (उड़ीसा) रामटेक (महाराष्ट्र) और नंदयाल (आंध्रप्रदेश), अटल बिहारी वाजपेयी – बलरामपुर & लखनऊ (उत्तरप्रदेश), नई दिल्ली (दिल्ली),ग्वालियर (मध्यप्रदेश) और गांधीनगर (गुजरात) एवं मीरा कुमार -बिजनौर (उत्तर प्रदेश), करोलबाग (दिल्ली) और सासाराम (बिहार)]हैं और राजनीतिक संकट-प्रबंधन के कुशल योद्धा हैं; के परामर्श की भी नीतीश पूरी तरह अनदेखी करते रहे हैं।

बहुत वक़्त नहीं हुआ, जब दो साल पहले यही नीतीश कुमार अपनी सरकार को बचाने हेतु लालू प्रसाद की पूरी पार्टी को तोड़ने में लगे हुए थे। उसके पूर्व रामविलास पासवान की लोजपा के विधायक दल का ही छलपूर्वक अपने दल में विलय करा लिया था। थोड़ा और अतीत में लौटें, तो 2005 में पासवान के 29 विधायकों में 17-18विधायकों को तोड़कर अपने पक्ष में कर लिया और लोक जनशक्ति पार्टी टूटते-टूटते बची थी। उस वक़्त नरेंद्र सिंह लोजपा के प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे और पार्टी को पॉकिट में लेकर चलते थे। आगे चलकर वही नरेंद्र सिंह माँझी को ताड़ पर चढ़ाकर नीतीश को मुँह चिढ़ा रहे थे। बिहार के लोग कहते हैं कि ऐसा निर्लज्ज नेता बिहार में कम ही पैदा हुआ है।

अब बात करते हैं उस दौर की जब बिहार में लालू प्रसाद की तूती बोलती थी और कांग्रेस को उन्होंने उखाड़कर बंगाल की खाड़ी में फेंक दिया था। पर, केंद्र में लोक मोर्चा सरकार भाजपा के समर्थन से चल रही थी, तो बिहार में भी वह सिलसिला जारी रहा। समस्तीपुर में आडवाणी की गिरफ़्तारी कर जब कमंडल का रथ लालू प्रसाद ने रोका और भाजपा ने समर्थन वापस लिया, तो सरकार पर संकट आ गया। एक वो भी समय आया, जब कटिहार से कांग्रेस के दिग्गज नेता सीताराम केसरी, जो बाद में अध्यक्ष भी बने; को हराकर देश की राजनीति में बहुचर्चित हुए ज्ञानेश्वर यादव को अपने पाले में करके लालू प्रसाद ने भाजपा के कई विधायकों को जनता दल में मिला लिया। बसपा, आदि छोटी पार्टियों का अपने ‘प्रताप’ से (ये लालू जी का ही शब्द है) अपने दल में सीधे विलय ही करा लेते थे। ज़ाहिर है, इस राजनीतिक दांवपेंच में उस वक़्त शरद यादव, रामविलास पासवान, आदि भी उनके साथ थे। पर, जब लोकसभा का चुनाव आया, तो लालू जी ने ज्ञानेश्वर यादव को ये कहते हुए बेटिकट कर दिया कि जो आदमी भाजपा का नहीं हुआ, वो मेरा क्या होगा। ज़ाहिर है,ये आह आगे चलकर लालू प्रसाद को ऐसी लगी कि आज उन्हें राजनीतिक वनवास झेलना पड़ रहा है।

15 के चुनाव से पहले वही शकुनी चौधरी नीतीश के लिए वाकई शकुनी साबित हुए, जिनके बेटे सम्राट चौधरी को उन्होंने लालू की पार्टी से तोड़कर अपनी तरफ किया था और माँझी के मंत्रीमंडल में नगर विकास मंत्री बनवाया। वो तो समय रहते लालू प्रसाद का तगड़ा सूचना तंत्र नीतीश के कुत्सित मंशे पर पानी फेर गया, वरना लालू की पार्टी को टूटने से कोई बचा नहीं सकता था। नीतीश कुमार को जो निकट से जानते हैं, वे ये मानते हैं कि नीतीश अपने विरोधियों को नेस्तनाबूद करने में पूरी निष्ठुरता व निर्ममता से प्रहार करते हैं। हर स्तर पर गिरकर अपनी सारी ऊर्जा झोंककर, तमाम सियासी शस्त्रास्त्रों का प्रयोग कर मैदान में उतरते हैं और कई बार न्यूनतम राजनीतिक शालीनता व राजधर्म भी भूल जाते हैं।

जिसने तहज़ीबे-मोहब्बत कभी देखी ही नहीं
उसके मेयारे-अदावत में मराआत नहीं।
– डॉ. मसऊद अहमद

2009 में रामविलास पासवान को हाजीपुर में हराने के लिए अपनी तरफ से कई पासवान उम्मीदवारों को आर्थिक साधन से लैस कर निर्दलीय लड़वाया। सभी निर्दलीय प्रत्याशियों को कुल मिलाकर 52 हज़ार के आसपास वोट मिले और पासवान मात्र 38 हज़ार वोटों से पूर्व मुख्यमंत्री रामसुंदर दास से हारे। फिर, समस्तीपुर से पासवान के छोटे भाई रामचंद्र पासवान के खिलाफ नीतीश ने पासवान के ही ममेरे भाई महेश्वर हज़ारी को घर में ही आग लगवाकर उतारा और लगातार दो बार से जीत रहे रामचंद्र बुरी तरह हारे। पाटलिपुत्र से लालू प्रसाद के विरुद्ध उनके कभी अति निकटस्थ रहे व बाद में धुर विरोधी हो चुके रंजन यादव को लोजपा से तोड़कर अपने दल में लाकर चुनाव लड़ा दिया और लालू के ख़िलाफ हर दाँव चलकर उन्हें शिक़स्त दिलायी।

फिर, 2010 के बिहार विधानसभा के चुनाव में एक अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार के अधिकांश ज़िले में एक ही जाति के जिलाधिकारी व आरक्षी अधीक्षक को तैनात किया। सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर,कथित रूप से ईवीएम में छेड़छाड़ कराकर परिणाम को अपने पक्ष में कराने में अप्रत्याशित ढंग से कामयाब रहे और इस षड्यंत्र में भाजपा बराबर की साझीदार रही। रामविलास पासवान के गृह विधानसभा अलौली, जहाँ से वो 1969 में कद्दावर कांग्रेसी नेता मिश्री सदा (जो बाद में शिक्षा राज्य मंत्री भी बने थे) को हराकर विधानसभा पहुँचे थे; में पासवान के मँझले भाई पशुपति कुमार ‘पारस’, जो 1977से लगातार (एक बार छोड़कर) जीत रहे थे (द्रष्टव्य :2000 में जबकि नीतीश चंद दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने थे, तो यही पारस उनके साथ उपमुख्यमंत्री बनने वाले थे);के विरुद्ध राजकुमार सदा को उतारा। यहाँ से श्री पारस को हराने के लिए नीतीश ने पूरे बिहार से हर जाति व धर्म के नेताओं को लाकर अलौली में कैम्प करा दिया और अपना स्तर गिराकर इस मक़सद में क़ामयाब रहे। इतना ही नहीं,पासवान के पटना के ह्वीलर रोड स्थित पार्टी कार्यालय को वहाँ से हवाई अड्डे की निकटता व कुछ नियमों का हवाला देकर विस्थापित कराने के लिए नीतीश ने एड़ी-चोटी एक कर दिया। मगर इसमें उन्हें मुँह की खानी पड़ी।

अभी-अभी राष्ट्रपति चुनाव में जो रुख नीतीश कुमार ने अपनाया, उससे ख़ुद जदयू के तीन बार राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे शरद यादव हतप्रभ थे। तब जबकि वो संसद में लगातार सरकार को घेर रहे थे, शरद यादव को अपने जनता दल के साथ समता पार्टी का विलय कराकर जदयू बनाने पर अफ़सोस हो रहा होगा। किसी निर्णय के लायक़ नीतीश कुमार ने उन्हें नहीं छोड़ा। नीतीश कुमार मिथकीय चरित्र के मुताबिक भारतीय राजनीति के भस्मासुर हैं। पहले जार्ज साहब शिकार हुए, अब शरद जी। अविश्वसनीयता और अनप्रेडिक्टेबिलिटी के मामले में नीतीश कुमार सियासी मैदान में सबसे आगे हैं। पिछले दिन एक इंटरव्यू में शरद जी कह रहे थे कि मधु दंडवते (निर्वाचन अधिकारी) की देखरेख में चुनाव के तहत जब वो लालू प्रसाद को हराकर जनता दल के अध्यक्ष बने, तो दल टूट गया, फूट के बाद लालू जी का राष्ट्रीय जनता दल (राजद) बना।

पार्टी चलाने के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए पार्टी पदाधिकारियों की राय पर एनडीए के साथ जाना पड़ा, जिससे देवगौड़ा सहमत नहीं थे, और एक और फूट हुई, देवगौड़ा जी ने जनता दल (सेक्युलर)बना लिया। आज मैं मानता हूँ कि मैं ग़लत था, देवगौड़ा जी सही थे। हमें एनडीए के साथ नहीं जाना चाहिए था। पर,देखिए कि इस इंटरव्यू को दिए अभी बीस दिन भी नहीं हुए थे कि नीतीश कुमार ने एनडीए प्रत्याशी का समर्थन कर दिया। नोटबंदी के दौरान तो नीतीश के चलते शरद जी को राज्यसभा में बोलते हुए शर्मसार तक होना पड़ा जब जेटली जी ने कहा कि पहले आप अपनी पार्टी में फरिया लीजिए कि नोटबंदी के पक्ष में है कि ख़िलाफ़ में ? जनता दल से निकल कर उड़ीसा में बीजू जनता दल बना, फिर पासवान ने अलग होकर लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) बना ली। और इस धड़े का सबसे पहले साथ छोड़कर अलग होने वालों में चंद्रशेखर, आदि थे जिन्होंने समाजवादी जनता पार्टी का गठन कर लिया। फिर इससे निकलकर मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी बना ली। उधर हरियाणा में ताऊ देवीलाल गुट आज इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) चला रहे हैं।

एक दिल के टुकड़े हज़ार हुए, कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा।
ये लोग अब न किसी उम्मीद के क़ाबिल हैं, न भरोसे के।

यह जानते हुए भी कि नतीजे क्या आने वाले हैं, विपक्ष की क़ाबिल उम्मीदवार मीरा कुमार के साथ मज़बूती से खड़ा होना चाहिए था। सियासत शिक़स्त-फ़तह से बहुत आगे का सफ़र है। कलाम के ख़िलाफ़ लक्ष्मी सहगल को उतारा गया था। मालूम नहीं, नीतीश जी की कौन-सी कमज़ोर नस दबी पड़ी है कि अपनी चिरपरिचित राजनीतिक अविश्वसनीयता को दिन-ब-दिन और भी पुख़्ता किए जाते हैं। ऐसे बात-बात पर लाचार-सा, सहमा-सा दिखना और गठबंधन की मिट्टी पलीत कर विपक्ष को पलीता लगाने की अपनी आदत से बाज नहीं आना; उनका हश्र बहुत बुरा कराने वाला है। कुछ चाटुकारों की सोहबत में उनकी जनपक्षधर सियासत अमरत्व प्राप्त करती जा रही है। जहां बोलना चाहिए, वहां मौनव्रत रख लेते हैं, और जहाँ मौनधारण करना चाहिए, वहाँ एक्सक्लुसिव बाइट देते हैं। ऐसे-ऐसे समाजवादी हों, फिर तो लड़ चुके आप लड़ाई। “अब बिहारी कहलाना शर्म का नहीं, गर्व का विषय होगा” कहकर, भावनात्मक मुद्दों की बैसाखी पर बिहारी अस्मिता का अलख जगाने (ढिंढोरा पीटना भी कह सकते हैं) वाले नीतीश कुमार महिला आरक्षण पर बहुत बोलते रहते हैं, उनसे विपक्षी दलों की बैठक तक एक दिन भी इंतज़ार नहीं हुआ, और कोविंद की उम्मीदवारी का समर्थन कर दिया।

कभी नीतीश जी की एक फोटू ‘युगपुरुष’ मोदी जी के साथ दिख गयी थी बिहार में तो डिनर कैंसिल कर दिया गया था कि मुसलमान कहीं ख़फ़ा न हो जाएं। बिहार के गांव-देहात में उसे पत्तल देकर खींच लेना कहते हैं। ग़ज़ब की हिपोक्रसी है, पता नहीं अक्लियतों को क्या समझ के रखा है इन चिंटु-पिंटु सियासतदानों ने। आज शिष्टाचार में बड़े चाव से साथ बैठ कर भोजन करते हैं मोदी जी के साथ, जबकि विपक्षी दलों की बैठक में पहुंचने को अपनी प्राथमिकता में शुमार नहीं करते। वहीं, लालू प्रसाद ने दो टूक कहा,“व्यक्ति की सुंदरता, सज्जनता, दुर्जनता देख कर फ़ैसला नहीं लिया जाता। हम आयडियोलाजी की राजनीति करते हैं। शुरू में ही हमने कहा कि विचारधारा के साथ हम कोई समझौता नहीं करेंगे। हमको कांग्रेस, और पार्टी भी कहती कि इ भाजपा का आदमी है, बड़ा भला है, सपोर्ट करना है तो मैं उल्टा रहता। व्यक्ति की सुंदरता पर हम नहीं लड़ते, इ जो प्रोपोज्ड आदमी हैं, इ जिनको बड़ा भारी और अच्छा गवर्नर बोल के सपोर्ट किया है जदयू का कुछ सेलेक्टेड लीडर वहां बैठ के; घोर आरएसएस हैं। बिहार की क़ाबिल बेटी है,विदेश से लेके लोकसभा सब जगह काम किया है। फिर से अपील करेंगे नीतीश से कि इ ऐतिहासिक ग़लती मत करिए। विचार करिए इस पर, आपलोगों का ग़लत निर्णय हो गया है। (एक सवाल कि जिस आरएसएस के ख़िलाफ़ आप लड़ रहे हैं, उसी के कैंडिडेट को जदयू ने सपोर्ट कर दिया है, फिर भी उनके नेतृत्व में आप सरकार चलाते रहेंगे ?, के जवाब में) तो, आपलोगों की यही न कोशिश थी कि दोनों टूटे ! सरकार चल रही है, हम कोई ख़तरा पैदा करने वाले नहीं हैं, अपनी तरफ से सरकार पर हम कोई ख़तरा पैदा नहीं करेंगे। फिर से अपील है नीतीश से कि ग़लत निर्णय बदले, हमारा डिसिजन हो गया है, मीरा कुमार को वोट करेंगे”। लालू प्रसाद का बयान बहुत कुछ कह रहा है।

यहां पर हम लालू और नीतीश का तुलनात्मक अध्ययन करें, तो बिंदुवार पाते हैं :
नीतीश कुमार के लिए आडवाणी-जोशी की जोड़ी सेक्युलर है, मोदी  कम्युनल। लालू प्रसाद के लिए तीनों समान रूप से कम्युनल हैं। नीतीश को अभी मोदी कहें कि आइए, बाक़ी के दो साल आप देश चलाइए, मुझे अब झोला लेके फ़कीरी करने निकलना है, तो नीतीश जी हुलस कर अपनी पार्टी का भी विलय भाजपा में कर देंगे। नीतीश और मोदी, दोनों व्यक्तिवाद और एरोगेंस से ग्रस्त, चुनावी प्रबंधन में माहिर मीडिया फ्रेंडली नेता हैं। इसीलिए, दोनों समानधर्मी एक-दूसरे से बहुत डरे रहते हैं, असुरक्षित महसूस करते हैं। वहीं लालू जी को यह ऑफर दिया जाए सारे आरोप-मुक़दमे ख़त्म कराने का आश्वासन देकर, तो लालू जी कहेंगे,रखो अपना पोस्ट अपने पास, दो-दो प्रधानमंत्री बनाए हैं हमने। हमारा मक़सद तुम्हारी नफ़रतिया-अगलगुआ पोलटिस की छाती पर मूंग दलना है।

नीतीश कुमार इफ-बट-दो-आलदो-हाउएवर में पीएचडी हैं, जबकि लालू प्रसाद का किंतु-परंतु-लेकिन-हालांकि-यद्यपि-तथापि से दूर-दूर तक लेना-देना नहीं रहता है। नीतीश गोल-मटोल बाजते हैं, वहीं लालू प्रसाद खरी-खरी कहने-सुनाने वाले नेता हैं। ज़रूरत पड़ने पर किसी को भी पलीता लगाने और किसी की भी ठकुरसुहाती कर आने के उस्ताद हैं नीतीश। जब कमज़ोर थे तो छह दलों के विलय के लिए उतावले थे, दसों बार मुलायम सिंह के यहां गये, शरद जी को आग्रह करके सबसे बातचीत के लिए मनाया। जब ख़ुद फिर से ताक़तवर हुए, तो यूपी में जानबूझ कर अखिलेश को डैमेज करने के लिए चुनाव ही नहीं लड़ा।

जो आदमी जार्ज फर्नांडिस, दिग्विजय सिंह को ठेंगा दिखा सकते हैं,वो शरद जी के क्या होंगे। जिस लालू प्रसाद ने अपनी पार्टी को तोड़ने का षड्यंत्र रचने वाले नीतीश जी की सरकार बचाई उदारता दिखाते हुए, उन्हीं पर दबाव बनाने व ख़ुद को मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित करवाने के लिए दिल्ली पहुंच सोनिया गांधी से मिलकर कांग्रेस को 40 सीटें आफर कर आए, जिसके लायक़ पार्टी की बिहार में स्थिति नहीं थी। आज उन्हें शार्ट नोटिस का बहाना बनाकर सोनिया गांधी के भोज में शामिल होने के लिए वक़्त नहीं है, जबकि बिहार चुनाव से पहले लालू जी का भोज छोड़कर सोनिया गांधी द्वारा दी गई पार्टी में शामिल होने फट से फ्लाइट पकड़ लिए। वक़्त की विडंबना देखिए कि इस बार मारीशस के पीएम से मिलने के नाम पर मोदी जी के यहां भोज खाने के लिए उत्सुक हैं। नोटबंदी के समय जब भी दिल्ली आते थे, जेटली जी से ज़रूर मिलते थे।

वहीं लालू प्रसाद राजनीतिक रूप से मिट जाएं, पर नीतीश जी की तरह हर सियासी तिकड़म के लिए जस्टिफिकेशन ढूंढ के नहीं ला सकते। पांच चुनाव लगातार हारे, पर भाजपा के प्रति हमलावर रुख़ में कहीं कोई कमी नहीं आई। हो सकता है कि जेल भी चले जाएं,पर जिसके लिए बहुत मशहूर हैं या बदनाम हैं, उस अंदाज़ में बदलाव नहीं आने वाला।

जब रामविलास पासवान ने 2005 में 29 विधायकों के साथ जदयू से मिलकर सरकार बनाने से इंकार कर दिया, तो उनकी समूची पार्टी को ही छिन्न-भिन्न कर दिया, कथित तौर पर करोड़ रुपए एक विधायक को ख़रीदने में लगाए। जबकि लालू प्रसाद ने पासवान जी के चलते अपनी सरकार के जाने के बावजूद बदली परिस्थिति में उन्हें राज्यसभा भेजा ताकि उनका 12- जनपथ का आवास बचा रहे। नीतीश ने एक समाचारपत्र की रिपोर्ट के मुताबिक एक चुनाव में अधिकतर ज़िले में अपनी ही जाति के एसपी-डीएम को तैनात कर दिया था, जबकि लालू प्रसाद ने इस तरह कभी नहीं किया।

भाजपा-जदयू की सरकार के दौरान नीतीश जी ने विज्ञापनों पर पानी की तरह पैसे बहाए, इसलिए वो मीडिया के लाडले बने रहते हैं, जबकि लालू प्रसाद ने सबदिन मीडिया को हड़का के रखा,इसलिए भी बहुत हद तक वो विलेन बनाए जाते रहे हैं।

बकौल शरजील इमाम, “नीतीश जी इसलिए भी दुलरुआ नज़र आते हैं कि उनके ख़िलाफ़ लिखने वाले को परेशान किया गया, उनकी नकारात्मक छवि दिखाने ही नहीं दी गई, और लालू जी के बारे में परसेप्शन इसलिए बना कि उनके समय में मीडिया पर सेंसरशिप इतनी नहीं थी जितनी नीतीश जी के समय में”।

इतना कुछ कहने का मेरा सिर्फ़ और सिर्फ़ यही अभिप्राय है कि नीतीश अपनी तमाम अच्छाइयों व विकासोन्मुख समाजवाद के स्पष्ट दर्शन के बावजूद आरम्भ से ही ‘अगली ईगो’ और ‘अटेंशन सीकिंग सिंड्रोम’ के शिकार रहे हैं। यही वजह है कि बिहार में पूर्व से मौजूद प्रभावी सामाजिक ताने-बाने को क्षणिक वोटबैंक की राजनीति की नयी परिभाषा के दायरे में बाँधने के चक्कर में वे लगातार अपना प्रभाव खोते रहे। उन्हें पता भी नहीं चला और उनकी छवि दरकती चली गयी।

रामविलास पासवान के पर कतरने के लिए जिस दलित समाज में दो फाड़ करने का अदूरदर्शी क़दम उन्होंने उठाया, लालू प्रसाद की सियासी ताक़त व उनके राजनीतिक समीकरण को निष्प्रभावी कर उन्हें किनारे लगाने के लिए जिस पिछड़े वर्ग को दो भाग में विभाजित करने का दुस्साहस किया; आज वही दाँव उनके लिए उल्टा पड़ रहा है। पासवान ने शुरु में कहा था कि ‘महादलित’ शब्द ठीक वैसे ही अपमानजनक है, जैसे ‘महाचंडाल’। पहले बिहार में अगड़े व पिछड़े की लड़ाई, संसाधन पर हक़ व प्रतिनिधित्व के लिए संघर्ष की वर्षों पुरानी दास्तां लिखी-सुनाई जाती थी, चौक-चौराहे,स्कूल-कॉलिजों में ये आवाज़ गूँजती थी। पर, आज बिहार में दलित और महादलित के बीच अघोषित टकराव है, पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग में अंतर्संघर्ष व विद्वेष बढ़ा है। आदिवासी अपने वजूद की रक्षा हेतु निरंतर संघर्षरत रहकर जल, जंगल व ज़मीन की जंग में सत्ता के गलियारों के इन कोलाहलों से लगातार दूर हो रहे हैं। आखिर, समतामूलक समाज की स्थपना की लड़ाई को कमज़ोर करने के लिए कौन ज़िम्मेदार ? आज ये सवाल बिहार की भावुक व मासूम जनता रहनुमाई व रहबरी का दावा करने वाले अपने ‘मसीहाओं’ से पूछना चाहती है :

एक तू ही नहीं जो मुझसे ख़फ़ा हो बैठा
मैंने जो संग तराशा, वो ख़ुदा हो बैठा।

बदलती परिस्थिति में बिहार की पार्टियों को अपने प्रवक्ताओं को बोलने का शऊर सिखाना चाहिए। किसी प्रवक्ता को तुरत किसी की औकात मापने की मशीन बाज़ार से खरीद कर टीवी चैनल के सामने नहीं चला जाना चाहिए। अभी शिवानन्द जी का नीतीश कुमार के नाम हालिया खत ही कोई पढ़ ले, तो पता चलेगा कि संवाद कैसे किया जाता है। इन नए-नए महाजन के साथ यही दिक्कत है कि मुंह के आगे माइक आयी नहीं कि अलबलाना शुरू कर देते हैं। मतलब, इनके पार्टी अध्यक्ष की चरणवंदना करने वाले की ही औकात है, बाक़ी सब बेवकूफ़ हैं। मैं फिर कह रहा हूँ कि नीतीश जी मोदी जी की ही तरह अपनी पार्टी में कुछ छुटभैये, मुंहफट टाइप के लोग पाले हुए हैं जिन्हें राजनीति का न्यूनतम लोकव्यवहार भी नहीं मालूम। राग अलापते हैं छवि और शून्य सहिष्णुता की।

बिहार लेनिन बाबू जगदेव प्रसाद की किस बर्रबरता और अमानवीयता से हत्या की गई, वह किसी से छिपा है क्या? उन्हें घसीटा गया, लाठियां बरसायी गईं, प्यास लगने पर उनके मुंह पर पेशाब करने की बात की गई, और साज़िश में जो रामाश्रय सिंह शामिल थे, लोजपा से भागकर एक करोड़ में जदयू के हाथों बिके उस आतताई को छविप्रिय ‘बालगांधी’ नीतीश जी ने अपने मंत्रीमंडल में संसदीय कार्य और जलसंसाधन मंत्री बनाया था। छविप्रधान नेता सुनील पांडे, मुन्ना शुक्ला और अनंत सिंह के आगे करबद्ध खड़े रहें, तो बहुत अच्छा, तब इनकी छवि घास चरने चली जाती है! नीरज सिंह जैसे लोग चाहते हैं कि शिवानन्द भी बाक़ियों के जैसे ही शीश नवाने लगें। इनको पता नहीं कि रामानन्द तिवारी जैसे प्रखर समाजवादी नेता की परवरिश में पले लोग सियासत में टुच्चई करने नहीं आते। नीरज सिंह ऐसे ही नीतीश के यशगान से अपने मोक्ष की राह सजाते रहें, तो किंआश्चर्यं!

बिहार में महागठबंधन की जीत के बाद जेएनयू में लगातार गोष्ठियां हो रही थीं, लोग मार्च निकाल रहे थे। उसी दौरान एक परिचर्चा में प्रो. बद्रीनारायण ने जो कहा, उसे आज याद करने की ज़रूरत है, “जनता ने बड़ी उम्मीदों से यह मैंडेट गठबंधन को दिया है, और लालू-नीतीश दोनों के लिए इस विजय को संभाल के रखने की ज़रूरत है”। कुछ साथी मुझसे सवाल करते हैं कि आप लालू के प्रति सॉफ्ट क्यूं रहते हैं, तो मेरा कहना है कि बात किसी के प्रति नरम रहने या किसी के प्रति भभकने की नहीं है। असल बात किसी बात को पूरे परिप्रेक्ष्य में एक नज़रिए के साथ देखने की है।

जेएनयू के लोग तो इतने खोखले व तंगदिल नहीं हुआ करते। जब सारे देश में ही विपक्ष को शंट करने की कवायद चल रही है, तो हम हर उस निर्भीक व मुखर आवाज़ के साथ खड़े होंगे, जिन्हें दबोचने-दबाने की साज़िश चल रही है, जिनके साथ मीडिया चयनित प्रश्नाकुलता दिखाती है, सरकार द्वारा सेलेक्टिव टारगेटिंग के ख़िलाफ़ बोलना वक़्त की मांग है। मैं ऐसे हालात में घनघोर शुद्धतावादी रवैया अपनाने का हिमायती नहीं हूँ, किसी का मूल्यांकन भी निरपेक्ष नहीं हो सकता। किसी ने कोई विसंगति-अनियमितता की है, तो न्यायालय अपना काम करेगा। क़ानून अपना काम करे, इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता। मगर क़ानून को गर्दनिया देकर उसके पीछे अपना काम कराने वाले शातिर दिमाग़ जब हरकत में आने लगे, तो समझिए कि क़ानून का चालचलन बिगाड़ा जा रहा है। लक्षण ठीक नहीं लग रहे। क़ानून के सेलेक्टिव इस्तेमाल पर जोनाथन स्विफ़्ट ने बड़ी सटीक टिप्पणी की थी :
“Laws are like cobwebs, which may catch small flies, but let wasps and hornets break through.”

बिहार में दस साल नीतीश ने संघ को अपना पैर पसारने का भरपूर अवसर मुहैया कराया व शासकीय संरक्षण दिया। मैंने लालू को लगातार पांच चुनाव में शिक़स्त खाते देखा है, पर विचारधारात्मक स्तर पर, धर्मनिरपेक्षता के मामले में लड़खड़ाते कतई नहीं। जब नवंबर 2015 में बिहार चुनाव के परिणाम की घोषणा के दिन ही पटना से दिल्ली लौट रहा था, तो पोस्टल बैलट की गिनती के साथ ही जो भद्दा मज़ाक मेरी बागी में शुरू हुआ, वो बयां नहीं कर सकता। एक सहयात्री अधिकारी ने तो यहाँ तक कहा कि “इ ललुआ तs बेचारा नीतीशो कs सोध लिहलिस”, फिर ‘भो’ और ‘ड़ी’ अक्षर के बीच जो चटखारे लेकर ‘स’ का इस्तेमाल किया गया, तो मन में आया कि यह आदमी लालू और उनकी आरंभिक लड़ाई के प्रति कितना विद्वेष जमा करके रखा हुआ है। पर, जैसे ही नतीजे स्पष्ट होने लगे, उनका चेहरा मुक्केबाज़ी में ताबड़तोड़ घूंसे खाए खिलाड़ी की तरह हो गया।

ट्रेन में एक साथी से लगातार बात हो रही थी, दोनों की नज़र ईटीवी के अपडेट्स पर बनी हुई थी। एक समय उन्होंने कहा, अब नतीजे स्पष्ट हो चुके हैं। ट्रेन में ही मैंने जेएनयू के अपने प्रगतिशील साथियों से बात की कि आज एक “मार्च फॉर सोशल जस्टिस एंड कम्युनल हारमनी” निकल ही जाए। मतगणना के आरंभ में ब्रह्मपुत्र हास्टल में टीवी रूम में जो माहौल था, वो ग़ज़ब ही था। असीम हुल्लड़बाज़ी के बीच दोपहर तक पाकिस्तान का वीज़ा बनवा देने के लिए बिन मांगे मदद देने को तैयार बैठे कुछ दरियादिल फील्ड छोड़ के, अपना ग़म भुलाने इंडिया गेट की तरफ निकल चुके थे।

पटना से जब मैं जेएनयू पहुँचा, बाक़ी लोगों के साथ पंखुड़ी, लेनिन, सारिका, हामिद, फ़ैयाज़, आनंद, प्रतिम, अरुण और बहुत से साथी गोदावरी पर पहले से ही पटाखे के साथ तैयार थे। एक राउंड शाम में ही कुछ हॉस्टल के बाहर-बाहर सब घूम लिए। फिर रात को कौन उस मार्च में शामिल नहीं था! एक को छोड़कर (हालांकि उनमें से भी कई साथी शरीक हुए थे) तमाम प्रगतिशील जनसंगठनों के साथी और बड़ी तादाद में किसी संगठनविशेष से असंबद्ध मित्र उस जुलूस में शामिल हुए। लोग फ़िरकापरस्त ताक़तों के धराशायी होने की ख़ुशी मना रहे थे।

नीतीश कुमार आज मनमानी करें, लुढ़कने लगें, तो उनके विरोध में स्वाभाविक रूप से स्वर फूटेंगे। इतिहास गवाह है कि 94 में जब नीतीश अलग हुए थे, तो लालू पर कोई दाग़ नहीं था, और 15 में जब गठबंधन किया, तो लालू प्रसाद चुनाव तक नहीं लड़ सकते थे। अभी तेजस्वी पर हुए एक एफआइआर में ही प्रवक्तागण अलबलाने लगे। इसको नीतीश की नैतिकता कहेंगे, तो फिर हिपोक्रेसी किस चिड़िया का नाम है? कबिरा तेरे देश में भांति-भांति के लोग…

हद से ज़ादे ‘साफ-सुथरी’ छवि के नीतिज्ञों के नीतिज्ञ नीतीश कुमार 2010 में कैसी नैतिकता का मुजाहिरा कर रहे थे? नीतीश, सुशील मोदी, नंदकिशोर यादव और कुछ अन्य मंत्रियों के ख़िलाफ 11,412 करोड़ रुपए के अवैध धन निकासी को लेकर मुक़दमा दायर हुआ था। बात थोड़ी पुरानी हो गयी है। मार्च 2012 में आयकर विभाग ने जदयू के कोषाध्यक्ष रहे विनय कुमार सिन्हा के यहां छापेमारी के दौरान 20 बोरों में कई करोड़ रुपए बरामद किए। ये वही विनय कुमार सिन्हा हैं, जिनके तथाकथित आवास में नीतीश कुमार का आशियाना हुआ करता था जब वे मुख्यमंत्री नहीं थे। यह मकान ए. एन. कॉलेज के पास विवेकानंद मार्ग में है। खैर बाद में जदयू के एक और नेता राजीव रंजन प्रसाद के यहां भी आयकर ने छापा मारा था। अकूत धन मिलने की बात हुई थी। मतलब, यहां कोई दूध का धुला नहीं है।

सियासतदानों को हम आदमी समझें तो क्यूं समझें
सियासत आदमी को आदमी रहने नहीं देती।

(लेखक जेएनयू में रिसर्च स्कॉलर हैं)

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