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वो उस मां के जिगर का टुकड़ा था जो उसके सामने मांस का लोथड़ा बनके सड़क पर पड़ा था…

सरकार चाहे झारखंड की हो, गुजरात की हो या मध्य प्रदेश की हो एक चीज का ढिंढोरा खूब पीटा जाता है कि जच्चा-बच्चा की अच्छी देखभाल और स्वस्थ प्रसूति बहुत जरूरी है। इसके लिए तमाम नियम और कानून भी बने हैं, स्वास्थ्य सुविधाएं भी मुहैया कराई गई है। डॉक्टर और सहयोगी कर्मचारियों का अच्छा-खासा जखीरा है सरकार के पास। बेहिसाब एंबुलेंस और उनका रखरखाव पर सालाना हजारों करोड़ों खर्च होते हैं लेकिन जब वाकई जरूरत होती है इन सुविधाओं की तो समय पर मिल पाना टेढ़ी खीर हो जाती है।

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ऐसा ही कुछ हुआ है मध्य प्रदेश के कटनी जिले में जहां सरकारी एंबुलेंस के ना मिलने की वजह से गर्भवती को पैदल ही 20 किलोमीटर दूर स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जाना पड़ा। किंतु महिला को रास्ते में ही प्रसव पीड़ा शुरु हो गई और सड़क पर ही बच्चे का जन्म हो गया। सड़क पर गिरने की वजह से मासूम नवजात की बच्चे की मौके पर ही मौत हो गई। जबकि महिला का पति डेढ़ घंटे पहले ही स्वास्थ्य केंद्र पहुंचकर एंबुलेंस की फरियाद करता रहा लेकिन जब एंबुलेंस नहीं पहुंची तो वह महिला अकेले ही पैदल स्वास्थ्य केंद्र बरही की ओर चल पड़ी।

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20 किलोमीटर का लंबा सफर एक साधारण मनुष्य के लिए भी तय कर पाना 5 घंटे का काम है तो एक पूरे समय से गर्भवती महिला वह भी दर्द के साथ कितना दूर चल पाती। नतीजतन प्रसव रास्ते में ही हो गया। एक मां के लिए इससे अधिक शर्मसार और दुख का विषय और क्या हो सकता है कि उसके जिगर का टुकड़ा उसके सामने मांस का लोथड़ा बनके सड़क पर निर्जीव पड़ा था। खून और पानी का मिश्रण बहुत दूर तक बह कर उसकी बेबसी की कहानी कह रहा था।

यह है हमारा देश भारत जहां करोड़ों करोड़ों रुपए खर्च कर दिए जाते हैं विज्ञापन में लेकिन जरूरत पड़ने पर ना तो डॉक्टर है, ना एंबुलेंस है, ना दवा है अगर कुछ है तो सिर्फ विज्ञापन, विज्ञापन, और विज्ञापन…


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विज्ञापन में ही देश बढ़ रहा है। विज्ञापन में ही बहू बेटियां बचाई जा रही हैं। विज्ञापन में ही जननी सुरक्षा हो रही है। विज्ञापन में ही सब कुछ हो रहा है। यथार्थ के धरातल में सब हवाई महल साबित हो रहे हैं। मैं इसमें आसपास रहने वाले या उस सड़क से गुजरने वालों की सोच पर भी शर्मिंदा हूं जो उन्होंने ऐसी हालत से गुजर रही एक महिला को अस्पताल तक पहुंचाने की जरूरत नहीं समझी।

लोग क्यों भूल जाते हैं यह आवश्यकता यदि आज किसी और को पड़ी है तो कल उन्हें खुद को या उनके किसी सगे संबंधी को भी पड़ सकती है। हम इतने असंवेदनशील क्यों होते जा रहे हैं। मैं सोच कर हैरान हूं और आहत भी हूं।


(आर्टिकल पूनम लाल की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है।)

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