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विमर्श

प्रेमचंद के दलित पात्र कभी विद्रोह नहीं करते, यही उनका धर्म और संस्कृति चाहती थी

प्रेमचन्द से पहली बार ठीक से आम जनता का साहित्य आरंभ होता है। इसका श्रेय उन्हें दिया जाना चाहिए। साथ ही प्रेमचन्द स्वयं धर्म राष्ट्र और संस्कृति के मुद्दों पर कई बार दलित विरोधी, शूद्र विरोधी नजर आते हैं। उनके दलित पात्र कभी विद्रोह नहीं करते, यही प्रेमचन्द और उनका धर्म और उनकी संस्कृति चाहती थी/है।

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असल में प्रेमचन्द एकदम नई धारा बना रहे हैं… उनके पहले जन-हितैषी साहित्य की कल्पना ही नहीं थी। प्रेमचंद अपने समय में जितने प्रगतिशील हो सकते थे उतने वे होते हुए नजर आते हैं। निश्चित ही उनके व्यक्तिगत और साहित्यिक सोच की अपनी सीमा थी जो कि उनके व्यक्तित्व उनके शिक्षण उनके धर्म और उनके संस्कृति बोध से सीमित होती आई है।

ये हर इंसान के साथ उसके समय में होता है, होता रहेगा।

प्रेमचंद स्वयं एक नये मार्ग पर निकल रहे हैं, इसलिए उनमे पुराने का भी बहुत सारा हिस्सा बाकी है। तत्कालीन परिस्थितियों में वे इससे ज्यादा “क्रांतिकारी” हो भी नहीं सकते थे। फिर भी उनका आलोचनात्मक मूल्यांकन दलितों और स्त्रीयों को करना ही होगा।

दलितों स्त्रीयों के लिए और दलित स्त्रीयों के लिए उनके विचार उनके पात्रों के मुख से और उनके नेरेशन (कथा-विस्तार/कथा कहने/टिप्पणी करने के ढंग) में साफ़ नजर आते हैं। एक तरीका ये है इसे समझने का कि उनकी कलम से तत्कालीन धर्म और संस्कृति बोल रही है। जो कि ठीक ही है। लेकिन प्रेमचंद जैसे व्यक्ति से समाज का आइना बन जाना ही अपेक्षित नहीं है।


https://www.youtube.com/watch?v=k4yfHngCIl4&t=5s

उनसे अपेक्षित है कि वे समाज का आइना बनते हुए समाज को भी आइना दिखाएँ। समाज को उसकी गंदगी का सीधा दर्शन कराएं। इसका रास्ता वे अपनी शैली में ढूंढते भी हैं तो वो दलितों की दरिद्रता और उनके विलाप के वर्णन में फिसल जाता है।

प्रेमचंद के दलित या स्त्री पात्र समाज को आइना दिखाने का प्रयास नहीं करते या बहुत कम अवसरों पर करते हैं। उस प्रयास को विद्रोह या बदलाव का प्रयास न कहके ताना मारने या असंतोष व्यक्त करने भर का प्रयास कहना उचित होगा।

प्रेमचंद के पात्र और स्वयं प्रेमचंद की टिप्पणियाँ नई सामाजिक व्यवस्था की या शोषण विहीन समाज की या शोषण से मुक्त होने के तरीके की कोई कल्पना नहीं देना चाहती। इसीलिये उनके पात्र यथास्थिति का चित्रण करते हुए यथास्थिति को बनाये रखने में ही मदद करते हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=9M8S777hcY0

साहित्य वही काम का है जो विकल्प दे और विकल्प के संधान का मार्ग और नक्शा बताये। ऐसा साहित्य भारतीय साहित्यकारों की कल्पना में कम ही उभरता है। विकल्प देने की बात आते ही सब स्थापित नाम एकदम घबराने लगते हैं। उनके तर्क होते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण है जैसा समाज है उसे दिखाकर चुपचाप गुदड़ी ओढ़कर सो जाता है।

ऐसे मुंह छुपाकर सो जाने वाले साहित्य के कारण शोषण की रात और गहरी और लंबी होती जा रही है। इसलिए विकल्प देने वाले साहित्य की बात करनी जरुरी है। साहित्य ही नहीं बल्कि न्यूज मिडिया, पत्रकारिता, फिल्म, संगीत और धर्म के आयाम में भी नये विकल्पों की बात करने की हिम्मत चाहिए।

यहाँ इस बिंदु पर ये बात नोट करके लिख लीजिये कि भारत के शोषक धर्म और शोषक संस्कृति में आकंठ डूबे हुए साहित्यकार, मीडिया गुरु, पत्रकार, संगीतकार या बुद्धिजीवी ये काम नहीं करने वाले हैं। ये काम उन्हें करना है जिन्हें इस धर्म और संस्कृति ने सताया है और जो इस शैतानी ढाँचे को उखाड़ फेंकना चाहते हैं।

(लेखक टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में रिसर्च फेलो हैं।)

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