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‘गोदी मीडिया के लिए सत्ता के चरण में बैठना ही आज़ादी है’

मेरा भाषण-

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स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं। 15 अगस्त सिर्फ 15 अगस्त में नहीं है वो उन तमाम संघर्षों में हैं जो आम लोगों के हक और आज़ाद भारत के स्वप्न को ज़िंदा रखने के लिए किए जा रहे हैं। ऐसे लाखों लोगों की संघर्ष भावना को बधाई। सरकारें आज भी झूठ बोलती हैं। नेता आज भी झूठ बोलते हैं। झूठ की इन रवायतों के ख़िलाफ़ आज़ादी का जंग जारी रहे। गोदी मीडिया की लरज़ती ज़बान बता रही है कि हमारी इस आज़ादी पर किसी की नज़र लग गई है। आज न कल आप इस गोदी मीडिया से आज़ादी के संघर्ष में सड़क पर उतरेंगे। हमारी आज़ादी की सबसे बड़ी निशानी आज़ाद नहीं है। कोई शक!

ये जो सूट में एंकर दिख रहे हं वो हमारी आज़ादी के घटते स्तर हैं। बच्चों की मौत पर भी वो गीतों के राग में उलझे रहे। आज़ादी का सबसे बड़ा मूल्य जीवन के सम्मान और सवाल में है। गोदी मीडिया हर भारतीय के लिए दैनिक शर्म का प्रतीक है। आपको जागना ही होगा। वरना एक दिन आपका भी गला घोंटा जाएगा और गोदी मीडिया किसी और के गीत में मशगूल हो जाएगा। जो बाहर से दिख रहा है उसकी ये हालत है तो अंदाज़ा कीजिए अंदर क्या हालात होंगे। चुप्पियों की असंख्य मजबूरियां लिखी जा रही हैं। डरपोकों की जमात पैदा हो रही है जो बोलने पर धावा बोलती हैं।

एक अरब की आबादी वाले बेमिसाल मुल्क हिन्दुस्तान के ये पांच पचीस एंकर ग़ुलाम हो चुके हैं। इनकी आज़ादी की दुआ कीजिए। इनके मालिकों की आज़ादी की दुआ कीजिए। ये हाथ में तिरंगा लेकर आपसे दिन रात झूठ बोल रहे हैं। तिरंगे की शान को हर दिन कम कर रहे हैं। जिस तिरंगे को लहराने के लिए लोग सीने पर गोलियां खा गए, उस तिरंगे को हाथ में लेकर ये टीवी चैनल के एंकर सत्ता की खुशी के लिए आपसे झूठ बोल रहे हैं। ये आपके लोकतंत्र की हार है। आपके आज़ादी के सपनों की हार है। चैनलों के लिए सत्ता की रज़ामंदी ही मुल्क है। उसके चरणों में बैठना ही इनके लिए आज़ादी है।

मेरे देशवासियों, एक बार फिर से जवानी के ख़्वाब देखो। एक बार फिर से आज़ादी के ख़्वाब देखो। इस ख़्वाब के लिए टीवी चैनल बंद कर दो। आप राजनीतिक निष्ठा में इन बातों को नज़रअंदाज़ किए जा रहे हैं। टीवी के बग़ैर भी आप राजनीतिक निष्ठा निभा सकते हैं। मगर अपने आज़ाद स्वाभिमान से कैसे समझौता कर सकते हैं। कैसे आप इस गोदी मीडिया की झूठ को ख़रीद सकते हैं। हमारा मीडिया चरमरा गया है। उसे जब सत्ता से आलोचना की रियायत मिलती है तब वह गोरखपुर की तरफ झांकता है। वरना वो इसी में उलझा रहा कि बच्चों की मौत पर बात कर देने से कहीं हुज़ूर की नाक पर बैठी मक्खी उड़ न जाए।


जो सब भाषणों में कहा जा रहा है, वो झूठ है। उनके दावों की जांच नहीं है। आप इस मुल्क के रहबर हैं। पहरेदार हैं। वो जिन्हें आपने पहरेदार समझा था अब वो हुज़ूर के तिमारदार हो चुके हैं। उनके ख़ातिरदार हो गए हैं। हम उम्मीद करते हैं कि एक दिन आप इस आज़ाद भारत में लड़कर फिर से आज़ाद मीडिया हासिल करेंगे। जहां आपका चेहरा होगा। आपकी बातें होंगी। आपकी जगह नेता और उसके विशालकाय तंत्र के द्वारा बिठाया गया प्रोपेगैंडा नहीं होगा। यह दिल चीर देने वाली विडंबना है कि जिस आज़ादी का जश्न आपने जिन चैनलों पर देखा, वही आज़ाद नहीं हैं। जय हिन्द। जय भारत। भारत माता की जय। वंदे मातरम। वंदे मातरम।

(ये लेखक के निजी विचार हैं। रवीश कुमार एनडीटीवी के सीनियर एडिटर हैं। ये पोस्ट मूलत: उनके फेसबुक पेज पर पोस्ट की गई है।)

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