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किसानों की बदतर हालत पर पत्रकार रीवा सिंह का प्रधानमंत्री मोदी को खुला पत्र…

आदरणीय प्रधानमंत्री जी,

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आप प्रधानसेवक हैं, देश आपके लिए सर्वोपरि है। 125 करोड़ भुजाओं के बल के साथ आपको अपार शक्ति मिलती है। ऐसी कई बातें आपके भाषण में सुनती आयी हूं। अच्छा लगता था कि आप ऐसे नेता बने जिनसे लोग सीधे तौर पर जुड़ा हुआ महसूस करते हैं।

सर, हमारा वो प्रतिनिधि जो देश को पूर्णतः समर्पित है इस वक्त कज़ाकस्तान में है, जब देश में किसान मर रहे हैं। निश्चित तौर पर आपका वहां जाना ज़रूरी था पर महाराष्ट्र में लगातार चौथे किसान ने आत्महत्या की इसकी जानकारी भी आपको रही होगी। मध्य प्रदेश में पुलिस की गोलियों से 6 किसान मारे गये ये आप जानते होंगे। कृषि विभाग राज्य (स्टेट लिस्ट) के अधीन है पर देशप्रेम और देशवासियों को समर्पित हमारे प्रधानमंत्री ने लोगों से एक बार मिलने की, उनसे समस्याएं पूछने की ज़हमत भी नहीं उठायी। भाषणों में जो प्रेम छलकता है, वो शब्द-मात्र में भी अब सुनने को नहीं मिला। यदि आपके आखिरी तीन दिन के ट्वीट्स पर ग़ौर करें तो अस्ताना के कार्यक्रम और योग के फायदे के अलावा एकमात्र संवेदनशील संदेश मिला जो म्यांमार से लापता सैनिक विमान के संदर्भ में था।

आपको अंदाज़ा है सर, कैसा लगता है जब फसल तैयार होने को हो और सूखे के कारण बरबाद हो जाए? किसान उम्मीद भरी निगाहों से आकाश की ओर देखता रहता है और इस सोच से भीतर ही सिकुड़ जाता है कि पानी नहीं बरसा तो खाने को कुछ नहीं मिलेगा। सोचिए कैसा लगता होगा जब खेत में लहलहाती फसल तैयार हो, कटाई में 20 दिन शेष रह गए हों और इंद्र का वज्रपात शुरू हो जाए।

आपको खेती शायद न समझ आए सर, इसे इस तरह समझें कि कुछ पैसे हैं जो आपने उधार लिए हैं, उनसे आपने एक दुकान खोल ली और वो खूब चली। फिर अचानक एक दिन आपके सामने उसे लूट लिया गया और आप कुछ न कर सके। लूटने वाले के खिलाफ़ शिकायत भी न दर्ज करवा पाये। अब आपके पास दोबारा दुकान खोलने के पैसे भी नहीं हैं और पुराना कर्ज़ भी चुकाना है, इस स्थिति की कल्पना कीजिएगा। आपको एहसास होगा कि जन-धन योजना और किसान बीमा योजना से पहले उस टूट चुके इंसान को एक ऐसी आवाज़ ही ज़रूरत होती है, जो कहे कि – मैं साथ हूं, सब ठीक हो जाएगा। पिछले तीन-चार दिन में आपसे इतना भी कहते न बना।


राज्य सरकारों की पूरी ज़ि्म्मेदारी है पर माननीय शिवराज सिंह का इस मामले में पड़ना तभी सही है जब उन्होंने अपने जूतों का बीमा करवा लिया हो। पिछले वर्ष मुख्यमंत्री महोदय ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का मुआयना कंधों पर चढ़कर किया था ताकि उनके जूते न गंदे हों। महाराष्ट्र में तो चुनाव का प्रचार भी आपने ही किया था, ऐसे में क्या जनता का आपसे भावनात्मक स्तर पर जुड़ाव नहीं होना चाहिए? वो राज्य जिसने आपके नाम पर भाजपा को वोट दिया और आपके द्वारा चुने गए उम्मीद्वार को अपना प्रतिनिधि मान लिया, क्या उसके प्रति आपका इतना दायित्व भी नहीं बनता कि आप वहां के किसानों से अपील कर सकें कि – धरती में जान उगाने वालों, अपनी ज़िंदगी में सलफ़ास मत बोओ।

पर आपने ऐसा नहीं किया सर। मध्य प्रदेश के किसानों की जींस पर चर्चा हो रही है, तमिल नाडू के 176 किसान 41 दिनों तक आपके दरबार में आते हैं, सड़क पर खाना खाते हैं, निःवस्त्र घूमते हैं, अपना ही मूत्र पीते हैं पर आप अपने भवन से बाहर उनसे मिलने नहीं आते। उन्हें वित्तिय सहायता मिली थी इसका ज्ञान है मुझे, पर 41 दिनों की तपस्या के बाद यदि आम आदमी अपने प्रधानमंत्री से मिल सकने में असमर्थ है तो मुझे यह स्वीकार करने में आपत्ति है कि भारतवर्ष विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राज्य है और यहां जनता की सरकार है।

सर, आपने कभी सोचा है आत्महत्या करने से पहले कैसा लगता होगा? कैसे ख़्याल आते होंगे? ज़िंदगी के बाद ऐसा कुछ भी अच्छा नहीं होता है जिसके लिए जीना छोड़ दिया जाए फिर भी वो मृत्यु चुनते हैं, अपने परिवार को बेबस देखकर भी, अपने बच्चों को भूखा देखकर भी, अपनी मां को बीमार देखकर भी… क्योंकि वो ये दृश्य सहन कर पाने की क्षमता खो चुके होते हैं और इस तस्वीर को बदलने में असमर्थ होते हैं।

किसी ईश्वर में भी इतना साहस और इतनी सहनशीलता नहीं आयी कि वो किसान बनकर अवतरित हो। ईश्वर राजा रहा है, योद्धा रहा है, भिक्षु रहा है, निर्मोही रहा है.. कभी किसान नहीं हो सका। आप प्रधानसेवक हैं न सर, एक बार किसान होकर देखिये।

हमारी-आपकी थाली में रोटी रखने वाले भूखे मर रहे हैं सर, और आपको नींद आ जाती है। कृषि के देश में वो पेड़ से लटक रहे हैं सर, और आपको नींद आ जाती है। आपके द्वार पर आकर वो मूत्र पी रहे हैं, और आपको नींद आ जाती है। वाकई, सबके बस की बात नहीं है इतना बहादुर होना। निश्चय ही इसके लिए 56 इंच वाले सीने की ज़रूरत पड़ेगी। आपकी हिम्मत सराहनीय है!

 

रीवा सिंह टाइम्स ग्रुप में सीनियर कॉपी एडिटर हैं

riwadivya@gmail.com

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