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धर्म से भी तेज़ी से बढ़ रहे अफ़वाहों के ख़िलाफ़ जारी हों जनहित विज्ञापन!

भारतवर्ष को जनहित में जारी विज्ञापनों के तहत ऐसे विज्ञापनों की सख़्त ज़रूरत है जो अंधविश्वास और अफ़वाहों की ख़िलाफ़त कर जनमानस को सचेत करें। हमारा सामाजिक ढांचा ऐसा है कि हम सब जानते हुए भी अफ़वाहों को अगर स्वीकारते नहीं तो नकारते भी नहीं। जो अंधविश्वास फैले हुए हैं उन्हें मानते नहीं तो उनका विरोध भी नहीं करते और इस तरह वो फलते-फूलते जाते हैं।

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अभी चोटी काटने वाली अफ़वाह ज़ोरों से फ़ैल रही है। एक तबका है जो इन अंधविश्वासों को परम सत्य मानने के लिये तैयार बैठा होता है। हम जानते हैं कि ऐसा सच नहीं है फिर भी हम अपनी बातों में उसका ज़िक्र ये कहकर कर देते हैं कि सुनने में आया है। इससे इन बातों को हवा मिल जाती है।

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सन् 2006 में इसी तरह एक अफ़वाह फैली थी कि रात में कोई बूढ़ी औरत प्याज़ मांगने आती है और देने न देने दोनों ही स्थिति में घर के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है। ये भी कहा गया कि वो उन घरों में नहीं मांगने जाती जहाँ गोबर से ॐ नमः शिवाय लिखा होता है। ऐसा सुनकर सभी लोगों ने अपने घर की बाउंड्री पर गोबर से ॐ नमः शिवाय लिखना शुरू कर दिया था और 3-4 दिनों में ही शहर के 80-85% घर ॐ नमः शिवाय से गोद दिए गए।

http://www.youtube.com/watch?v=9CVKN0AdlGA

उस वक़्त भय इतना प्रचंड था कि उसने सम्प्रदाय को भी पछाड़ दिया और सभी धर्म के लोगों ने आँखें मूंदकर ऐसा किया। मैंने कई शिक्षित लोगों से इस पर बात की थी कि उन्होंने क्यों लिखा, वो जानते हैं कोई नहीं आएगा तो मुझे ये जवाब मिला कि – सभी तो लिख ही रहे हैं और कोई नहीं आएगा ये अच्छा है पर लिख लेने में ही क्या बुराई है। अगर ऐसा होने की 1% भी सम्भावना हो या ये दिमागी फ़ितूर भी हो तो कम से कम मन तो शांत रहेगा।


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इस तरह एमबीए के प्रोफेसर्स से लेकर इंजीनियर्स तक ने अपनी दलील दी। हम अनुयायी बने समाज में रह रहे हैं। यहां बातों का लोगों तक पहुँच जाना ही उसका महत्वपूर्ण हो जाना सुनिश्चित करता है। जब भय और श्रद्धा हावी होने लगे तो तर्क माचिस की तिल्लियों की तरह बिखर जाते हैं। ऐसे में ये बेहद ज़रूरी है कि इस बात को प्रमुखता से बार-बार हमारे कानों में डाला जाये कि ऐसी अफ़वाहें और अंधविश्वास खतरनाक हैं और इनसे दूर रहना है।

रीवा सिंह टाइम्स ग्रुप में सीनियर कॉपी एडिटर हैं।

riwadivya@gmail.com

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