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जाति विनाश- एक थकाऊ और अनावश्यक प्रोजेक्ट

caste system in india

आर्य आक्रमण थ्योरी सही हो या न हो, इतना तो पक्का हो चला है कि मूल रूप से इस देश में श्रमणों की संस्कृति थी जो पहले गंगा यमुना के संगम के इलाके से पूर्व की तरफ फ़ैली हुई थी। बाद में बौद्ध संस्कृति के रूप में इसका विस्तार कंधार बामियान तक हुआ। ये श्रमण असल में जैन, बौद्ध और आजीवक सहित चार्वाक लोकायत आदि थे। कई खो गये संप्रदाय भी हैं, बाकी अन्य सब संप्रदायों का ब्राह्मणीकरण हो चुका है।

इन मूल श्रमणों के धर्म और परम्पराओं को चुराकर (सभ्य भाषा में ‘आत्मसात’ करके) आज के ब्राह्मणी हिन्दू धर्म का निर्माण किया गया है जिसमे अपना मौलिक कुछ नहीं बल्कि सब कुछ पुराने श्रमणों से उधार लिया गया है। ब्राह्मणी धर्म का अगर कुछ मौलिक है तो वो है वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था। इसका श्रेय उन्हें दिया जा सकता है। मतलब ये हुआ कि भारत के नैतिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक, सामरिक और सामाजिक पतन के लिए जो मौलिक काम हैं वो इन्होने किये।

जाति व्यवस्था आर्य आक्रान्ताओं या आर्यों की इजाद है। इसलिए भारत की गरीब और बहुजन आबादी को न तो जाति तोड़ने के थकाऊ काम में लगना चाहिए न ही आर्यों के धर्म के खिलाफ कुछ करना चाहिए। बहुजनों को धर्म परिवर्तन की भी कोई आवश्यकता नहीं है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि अपने मूल श्रमण धर्म (मूलतः बौद्ध) को पहचान लें और उसका सही अर्थों में पालन करना शुरू कर दें। अन्धविश्वासी शास्त्रों, देवी देवताओं, व्रत त्योहारों, पूजा पाठ, कथा, हवन जगराते आदि से दूरी बना लें।

इससे भी जरुरी ये कि अपने मूल बौद्ध, श्रमण, आदिवासी त्यौहार और व्यवहारों, महापुरुषों, शास्त्रों, निर्देशों (जो समता और बंधुत्व सहित जीवन के सम्मान से भरे हैं) को खोजकर उन्हें जीना और उनका उत्सव मनाना शुरू कर दें। आपस के जाति भेद भूलकर बहुजन जातियों में परस्पर विवाह और भोजन के प्रतिबन्ध तोड़ दिए जाये।

स्वर्ण द्विजों और ब्राह्मणों से जाति उच्छेद की मांग करना या देश से जाति को खत्म करना एक थकाऊ और अनावश्यक काम है, इसकी नाकामी हम पिछले सत्तर सालों में देख चुके हैं। कम से कम दलितों बहुजनों को अब इस असफल सिद्ध हो चुके प्रयोग में अपनी ऊर्जा खर्च नहीं करनी चाहिए।

जिन्हें जाति व्यवस्था से फायदा होता आया है वो इसे खत्म नहीं होने देंगे। आपको इससे नुक्सान है तो पहले आप अपने दायरे में इसे खत्म कीजिये। बहुजनों या दलितों आदिवासियों में पहले खुद के जातिभेद मिटेंगे और अन्धविश्वासी धर्म, शास्त्रों, देवीदेवताओं, इश्वर और बाबाओं आदि की गुलामी मिटेगी तभी जाकर कुछ बदलाव होगा। ये बात लिखकर रख लीजिये।

आपको जिन्होने जाति और वर्ण के जाल में फसाया उनसे आप मांग करते हैं कि जाति वर्ण का वे नाश कर दें तो आप गलती कर रहे हैं। जो चीज आप देखना चाहते हैं उसे अपने आसपास अपने दायरे में अपनाना शुरू कीजिये, आपकी संख्या काफी बड़ी है, आप बदलेंगे तो पूरा देश भी इससे प्रभावित होगा।

लेखक- संजय जोठे

(ये लेखक के निजी विचार हैं। संजय जोठे टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के शोधार्थी हैं।)

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