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अखिलेश यादव के शिलापटों को तोड़, यूपी योगी जी के नेतृत्व में विकास की ओर……

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बस अंतर सिर्फ सोच का है, किसी को निर्माण पसन्द है तो किसी को विध्वंश। समाज मे दोनों तरह की धाराएं मौजूद हैं, ये रहनी भी चाहिए क्योंकि यदि विध्वंश न होगा तो पुनर्निर्माण भी न होगा। यदि वर्तमान सरकार के लोग शिलापट्ट न तोड़ेंगे तो अखिलेश यादव व अन्य का अंतर कैसे ज्ञात होगा? जिन्होंने बाबरी मस्जिद तोड़ दी, वे अखिलेश यादव  का शिलापट्ट क्यो रहने देंगे?

यह तो निश्चित सत्य है यूपी में कि अखिलेश यादव को निर्माण पसंद है तभी तो क्या अयोध्या, क्या गोरखपुर, क्या कानपुर, क्या लखनऊ क्या देवरिया या क्या प्रदेश का कोई अन्य स्थान पूरे 5 वर्ष अखिलेश यादव ने केवल और केवल निर्माण ही किया है। इस निर्माण के बलबूते अखिलेश यादव पुनः सत्त्तासीन होने की बात सोच रहे थे लेकिन उन्हें यह नही पता था कि विध्वंशकारी शक्तियां निर्माणकारी शक्तियों से मजबूत हैं। यूपी में निर्माण को परास्त कर विध्वंश का राज स्थापित होना था सो हुवा और अब विध्वंश जारी है।

एक्सप्रेस वे पर जहां विमान उतरा था और फिर उतरने वाला है,योगी की सरकार के एक मंत्री महोदय गैता लेकर पँहुच गए और चला दिए गैता पर एक्सप्रेस वे की सेहत पर कोई असर नही पड़ा, उल्टे मंत्री जी गिरते-गिरते बचे।

गोमती रिवर फ्रंट के साथ भी कुछ वैसा ही हुवा और निर्माण कार्य प्रभावित,जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय केंद्र का काम भी जांच के नाते शिथिल, इसी तरह से देवरिया के बरहज का मोहन सेतु का निर्माण ठप, देवरिया नगर में निर्माणाधीन मोहन सिंह स्मृति आडिटोरियम का निर्माण कार्य बंद, देवरिया के पूर्वी ओवर ब्रिज के नाम मे मोहन ब्रिज से मोहन शब्द मिटाया गया।

अयोध्या में सरकारी दल के कुछ साथी अखिलेश यादव के नाम के शिलापट्ट को तोड़ दिए हैं क्योंकि उन्हें अखिलेश “यादव” का नाम पसन्द नही है। सब कुछ चल सकता है पर अखिलेश “यादव” नही चलेगा। अखिलेश यादव के नाम का शिलापट्ट वह भी राम की नगरी अयोध्या में, कदापि नही रह सकता, कदापि नही, इसलिए इसे अयोध्या से हटना पड़ेगा और इसे हटाने के लिए तोड़ना पड़ेगा, अस्तु तोड़ दिया।

अखिलेश यादव यूपी की नई सरकार बनने के बाद किसी रूप में यूपी में नही रहेंगे क्योकि अखिलेश यादव के नाम से मनु विधान के मुताबिक अजीब तरह की बू आती है जिसे मिटाने हेतु 5 कालिदास मार्ग लखनऊ स्थित सीएम आवास को गंगाजल व गोमूत्र से धुला गया था। यदि आवास को गंगाजल व गोमूत्र से धुला जाएगा तो अयोध्या में अखिलेश यादव का नाम कैसे बर्दाश्त होगा, अस्तु नाम का पत्थर तोड़ डाला।बधाई! विध्वंश जारी रहे।

(ये लेखक के निजी विचार हैं। चंद्रभूषण सिंह यादव त्रैमासिक पत्रिका ‘यादव शक्ति’ के प्रधान संपादक हैं।)

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