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किसानों का मरना राष्ट्रहित नहीं होता है क्या?

ravish-kumar

तमिलनाडु के तिरुनेवेली ज़िले में साहूकार ने एक परिवार को इतना तंग कर दिया कि परिवार के तीन सदस्यों ने ख़ुद को जला डाला है। तीन लोग मर गए। सोमवार सुबह इसाक्की मुथु, उनकी पत्नी सुबुलक्ष्मी, पांच साल की मदिसरन्या डेढ़ साल के अक्षय भरनी ने खुद पर पेट्रोल छिड़क लिया। हम सब इसे देख रहे हैं. बर्दाश्त कर रहे हैं और नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। 1 लाख 40 हज़ार का कर्ज़ा लिया था, दो लाख तक चुका दिया था, मगर साहूकार फिर भी पैसा मांग रहा था।

राज्य सरकार ने घटना की जांच के आदेश दिए हैं। साहूकारों के नेटवर्क पर नियंत्रण के न तो आदेश दिए जाएंगे न जांच होगी। तब तक किसी किसान के आत्मदाह या आत्महत्या का इंतज़ार करते रहिए। साहूकार चुपके से किसी नेता को फंड करके किसानों और गरीबों का गला दबाता रहेगा। दिल्ली की बड़ी सरकार ने बैंकों को दो साल में दो लाख 11 हज़ार करोड़ देने का फैसला किया है।

इसे उद्योगपतियों का कर्ज़ा माफ़ी नहीं कहा जाएगा। बैंकों का रि-कैपिटलाइज़ेशन फंड कहा जाएगा। सीधे-सीधे माफी न लगे, इसके लिए सरकार ने पहले बैंकों के विलय का रास्ता अपनाया, दिवालिया करार देने का कानून बनाया, उसकी प्रक्रिया चालू की, लोगों को यकीन दिलाया कि संपत्ति बेचकर बैक पैसे वसूलेंगे। कितना वसूल लिया? अब जाकर दो साल में दो लाख 11 हज़ार करोड़ देने का एलान हुआ है। इसे कर्ज़ माफी नहीं, री-कैपिटलाइज़ेशन कहते हैं।

सही है कि एन पी ए 2014 से पहले की देन है मगर एन पी ए 2017 में भी फला फूला है। नोटबंदी के बाद एन पी ए और बढ़ा है। नोटबंदी ने बैंकों को बर्बाद किया है। कोई बैंक वाला बोलेगा नहीं डर के मारे। उद्योग बर्बाद हुए तो कर्ज़ चुकाने की स्थिति में नहीं रहे। एन पी ए बढ़ता रहा, बैंक घटते रहे।

मनीकंट्रोल वेबसाइट से अंग्रेज़ी में एक प्वाइंट उठाकर डाल रहा हूं।

Jaitley says that whether or not the recapitalisation bonds will impact fiscal deficit is a function of what the nature of the bond will be and which agency issues the bonds. But even if it is a part of the fiscal deficit, it will be in the larger interest of the nation.

बताइये तो ये राष्ट्रहित की स्थिति किसने पैदा की कि बैंकों को 2 लाख करोड़ जनता के खज़ाने से दिए जा रहे हैं? उद्योगपतियों का हित राष्ट्रहित कब से हो गया?

आप इस सरकार बनाम उस सरकार करते रहिए, मगर आप जो देख रहे हैं, उसका इशारा दो साल से लगातार कुछ लोग कर रहे थे। सरकार उन सवालों को चुनावी जीत दिखा कर झटक दे रही थी। अब चुनावी जीत के बाद भी वे सवाल उसे झटक रहे हैं। बिहार, यूपी और गुजरात जीत जाने से अर्थव्यवस्था की लचर हालत की हकीकत नहीं बदल जाएगी।

भक्तों, तुम्हारी नियति ही अजीब है। गाली देने के लिए दुनिया में आए हो,सो यहां आ जाओ और गाली देना शुरू करो। जीएसटी के बाद बैंकों पर जितने भी लेख लिखे हैं, वो इस पेज पर हैं और मेरी अपनी वेबसाइट कस्बा पर भी है। भक्तों को इस बार पढ़ लेना चाहिए। जिसे आप मोदी विरोधी बता रहे थे, दरअसल वही राष्ट्रहित में था। जिसका नाम लेकर अब सरकार ने दो लाख करोड़ देने का एक पिटा हुआ फार्मूला अपनाया है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं। रवीश कुमार एनडीटीवी से जुड़े हैं। ये लेख उनके फेसबुक पेज से लिया गया है।)

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