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विमर्श

क्या मैं हर किसी की उम्मीद बन सकता हूं?

हर बातचीत इसी बात से शुरू होती है कि मैं ही उम्मीद हूं। हर बातचीत इसी बात पर ख़त्म होती है कि आपसे ही उम्मीद है। ऐसा कोई दिन नहीं होता है जब बीस से पचीस फोन अलग अलग समस्याओं को लेकर न आते हों। बातचीत से ही कॉलर की लाचारी और पीड़ा झलकने लगती है, बात करते करते मैं अपनी पीड़ा बताने लगता हूं। क्या यह संभव है कि कोई एक रिपोर्टर इतनी उम्मीदों का बोझ उठा सकता है? पूरी कर सकता है? इम्तहान में प्रश्न पत्र लीक होने से लेकर बार बार भर्तियां लटकाने के मामले हैं, कहीं सरपंच ने कब्ज़ा कर लिया है तो कहीं किसी की हत्या हो गई है, कहीं कोई वीसी गबन कर गया है तो कोई सांसद ज़मीन कब्ज़ा कर रहा है। भर्ती बोर्ड के घपलों और लापरवाही को लेकर तो न जाने कितने फोन आते रहते हैं।

शनिवार और रविवार का दिन भी बाकी दिनों की तरफ फोन सुनते सुनते गुज़र जाता है। कितना सुन सकता है। हर बातचीत लंबी होने लगती है। कई बार मैं ही झुंझला जाता हूं। आज लगातार आठ कॉल आ गए। चार में एक ही समस्या थी और बाकी अलग अलग। सबमें कहा गया कि मुझसे उम्मीद है। सोने की कोशिश करता रहा, जागता रहा, मुझसे होता नहीं कि फोन बंद कर दें। हर दिन का यही आलम है। फोन करने वाले आम लोग ही नहीं कई बार ऐसे भी होते हैं कि आपके पास उनकी पूरी बातचीत सुनने के अलावा कोई रास्ता नहीं होता। आप उनका सम्मान भी करते हैं। क्या लोग बाकी एंकरों को भी इसी तरह फोन करते हैं? क्या वे फोन उठाते होंगे?

मैं कितनों की दास्तान सुन सकता हूं। लोगों को मना करना इतना आसान नहीं होता है। धीरे-धीरे लगता है कि कॉलर के साथ हो रही नाइंसाफ़ी का एक अपराधी मैं भी हूं। एक अपराध बोध से हल्का होते हैं कि दूसरा चढ़ जाता है। हर ख़बर में अर्जेंसी होती है। मेरे लिए सामान्य जीवन जीना मुश्किल हो गया है। मेरे पास न तो संसाधन है न उतनी क्षमता कि हर स्टोरी कर दूं। अकेले या दो तीन लोगों के सहारे जो बन पड़ता है, वो कर लेता हूं। लेकिन मुझे भी कभी कोई ख़ाली वक्त मिलेगा या नहीं। क्या लोगों ने मुझे सांसद विधायक चुन लिया है, जो सांसद विधायक चुने गए हैं वो क्या कर रहे हैं? मना जैसा किया नहीं कि जो आदमी यह बोल रहा होता है कि आप से ही उम्मीद है वो तुरंत बोलने लगता है कि समझ गए आपको। आपने दिल ही तोड़ दिया।

मना करने का मतलब है अपराध बोध। क्या आप रोज़ ऐसे बीसों अपराध बोध उठा सकते हैं? फर्क पड़ता है। दिन भर दिमाग़ उसी में उलझा रहता है। कॉलर की आवाज़ शून्य में तब्दील हो चुकी है। वो अब सिर्फ एक ज़िदा लाश भर है जिसके ऊपर अर्ज़ियों और पर्चियों के कफ़न रखे हुए हैं। मैं भी तो जो करता हूं, उस पर कुछ सुनवाई नहीं होती है। सरकारें चुप्पा मार जाती हैं। मुझसे पहले कई बार ख़बरें अख़बारों में छप चुकी होती हैं। परेशान व्यक्ति के पास कतरन की फ़ाइल बन चुकी होती है मगर उस पर कोई एक्शन नहीं।

https://www.youtube.com/watch?v=MCeG-57kBb8

आख़िर सिस्टम में इतना घमंड आया कहां से है। सिस्टम ने आम आदमी को खिचड़ी जैसी तीन नंबर की बहस में उलझा कर उसे निहत्था कर दिया है। वो मारा मारा फिर रहा है। इस अख़बार से उस अख़बार तक। इस पत्रकार से उस पत्रकार तक। इस उम्मीद को ख़ुद जनता ने ख़त्म किया है। जब तक आप समूह में हैं, करते रहिए ये पार्टी वो पार्टी, हिन्दू मुस्लिम सब करते रहिए, जैसे ही किसी समस्या से सामना होगा, वो भीड़ आपको छोड़ देगी। आपको अकेला और निहत्था कर देगी। आप धरना प्रदर्शन की उन तमाम ख़बरों को समेटे लोकतंत्र में पोलिथिन का बैग बन कर इधर से उधर उड़ते रहेंगे। इक्का दुक्का लोग लड़ रहे हैं, बाकी उन्हें लड़ता हुआ छोड़ कुछ और कर रहे हैं। हम सब एक दूसरे की हताशा के कारण हैं।

लोग पूछने लगते हैं कि बताइये क्या करें? ज़ाहिर है वो सब कर चुके होते हैं। मैं क्या और क्यों बताऊं कि किस किस को क्या करना है। धरना और प्रदर्शन, चिट्ठी लिखना ही तो कह सकता हूं, मगर वो भी तो बेअसर हो गया है। चैनलों पर दिन पर नेताओं के फ़र्ज़ी बयान भरे रहते हैं, जब देखो तब किसी चिरकुट का थोबड़ा बक बक करता नज़र आता है। हर जगह से जनता की आवाज़ ग़ायब होती जा रही है। मीडिया ने भी जनता को निहत्था कर दिया है। उसकी परेशानियों में पानी मिलाकर पेश करता है ताकि धार कम हो जाए।

यह वही जनता है जिसके प्रदर्शन करने की जगह हर शहर से ग़ायब कर दी गई है। उसे कोई फर्क नहीं पड़ा। तब वो बेख़बर रही। जैसे ही सिस्टम ने उसे भर्ती के नाम पर छल किया, पत्रकारों को खोजने लगती है। आपने पत्रकारों की हालत ये कर दी है कि सवाल पूछने पर कहने लगे कि हैं फलां जी का विरोध क्यों करते हैं। सीधा कहिए न कि थाली में दीप सजाकर आरती क्यों नहीं करते हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=RDKz8Z72O9M

एक ही रास्ता बचा है। हर दूसरे की लड़ाई को अपना बना लीजिए। सबकी लड़ाई में शामिल हो जाइये और सबमें अपनी लड़ाई मिला दीजिए। किसी को किसी की अकेले की लड़ाई से कोई फायदा नहीं हो रहा है। जनता थोक शब्द नहीं रही। नेताओं ने उसका खुदरा खुदरा कर दिया है। चवन्नी अठन्नी की रेज़गारी की कीमत दो हज़ार के नोट के ज़माने में क्या रहेगी। क्या इसके बाद कुछ हो जाएगा? मैं नहीं जानता। मैंने इस पर सोचा नहीं है। लेकिन एक बात जानता हूं। मैं सबकी उम्मीद नहीं बन सकता। मीडिया से कवर करवा लेना अगर आपकी उम्मीद का पैमाना है तो आप भी किसी उम्मीद के लायक़ नहीं हैं।

(ये लेखक के निजी विचार हैं। रवीश कुमार एनडीटीवी से जुड़े हैं। ये लेख उनके ऑफिशियल फेसबुक पेज से लिया गया है।)

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