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आरएसएस का ताजमहल कैसा है?

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ताजमहल भारत में है, दुनिया भर से लोग उसे देखने भारत आते हैं। पर वह भारतीय संस्कृति का प्रतीक नहीं है। लालकिला भी भारतीय संस्कृति का प्रतीक नहीं है। इसके सिवा और भी बहुत सारी इमारतें हैं, जो आरएसएस और उनके नेताओं के लिए इसलिए भारतीय संस्कृति का प्रतीक नहीं हैं, क्योंकि इन सबके निर्माता मुस्लिम शासक थे। इसलिए वे उनके खिलाफ यदाकदा और गाहेबगाहे बोलते ही रहते हैं। पर इनको लेकर आरएसएस के नेताओं की समस्या यह है कि वे इन इमारतों पर सिर्फ बोल सकते हैं, उन पर राजनीति नहीं कर सकते।


राजनीति वे सिर्फ उन्हीं मुद्दों की करते हैं, जो धार्मिक भावनाएं भड़का सकते हैं। वे भावनाएं चाहे हिन्दुओं की हों, मुसलमानों की हों, सिखों की हों या ईसाइयों की हों, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। बस भावनाएं भड़कनी चाहिए, क्योंकि इसी से उनके तथाकथित हिन्दू राष्ट्र को ऊर्जा मिलती है।

ताजमहल जैसे मुद्दे बहुत सतही हैं, जिन्हें वे चाहकर भी गरमाने में सफल नहीं हो सकते, क्योंकि वे मुस्लिम शासकों से जुड़ी चीजें हैं, किसी धर्म से जुड़ी हुई नहीं हैं। शायद किसी ने ताजमहल के नीचे किसी हिन्दू मन्दिर की परिकल्पना का विचार भी गढ़ा था, पर वह सफल इसलिए नहीं हुआ कि ताजमहल मस्जिद नहीं है। वह एक एकांगी विचार था, इसलिए फेल हो गया।


योगी आदित्यनाथ इस बात की बड़ी प्रशंसा करते हैं कि प्रधानमंत्री विदेश जाते हैं, तो वहाँ के राष्ट्राध्यक्ष को भगवद्गीता भेंट करते हैं। लेकिन वे यह नहीं बताते कि यह आरएसएस के नेताओं की वैचारिक विवशता है कि वे गीता ही भेंट कर सकते हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने गीता को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करने का हंगामा यूँ ही नहीं किया था, उसके पीछे भी आरएसएस की हिन्दू वैचारिकी का ही दबाव था। मोदी ही नहीं, अगर आरएसएस का कोई अन्य नेता भी प्रधानमंत्री होता तो वह भी विदेश में गीता ही भेंट करता।

क्या गीता भारतीय संस्कृति का प्रतीक है? कोई नासमझ ही कहेगा कि गीता भारतीय संस्कृति का प्रतीक है? अगर गीता भारतीय संस्कृति का प्रतीक है, तो ताजमहल भी भारतीय संस्कृति का प्रतीक क्यों नहीं है? अगर आरएसएस के लिए ताजमहल मुस्लिम संस्कृति का प्रतीक है, तो गीता हिन्दू संस्कृति का प्रतीक क्यों नहीं है?


लेखक- कंवल भारती


(ये लेखक के निजी विचार हैं। कंवल भारती दलित लेखक, चिंतक और स्तंभकार हैं।)

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