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सौ दिनों में उनचालीस लोगों की ‘हत्या’..यह सरकारी व्यवस्था का आतंकवाद है

सौ दिनों में उनचालीस लोगों की ‘हत्या’..


यह सरकारी व्यवस्था का आतंकवाद है..!

यह तमाम अंतरिक्षीय उड़ानों या मंगलयान के माथे पर लिखा हुआ शर्म है..!
यह धर्म की समूची कल्पना की बर्बर धूर्तता की महज एक झलक है..!
यह आतंकवाद है, यह शर्म है, यह बर्बरता पर गर्व की निर्लज्जता है..!


ये कोई सीवर हादसा नहीं, राजनीतिक हत्याएं हैं..!
ये सरकारी व्यवस्था की ओर से कुछ खास जातियों पर किए गए ‘सिलसिलेवार आतंकवादी हमले’ हैं…!

यह दिल्ली के किसी सीवर में उतरे सिर्फ चार लोगों की मौत का मामला नहीं है। यह ‘सीरियल मर्डर’ का एक पुख्ता इंतजाम है… जिसमें सरकारों ने इन लोगों की हत्या की सुपारी ली हुई है! महज पिछले सौ दिनों में उनचालीस लोग एक सरकारी व्यवस्था के तहत इसलिए मार डाले गए कि उन्होंने इस धर्म और जात के जाल में एक खास जात में जन्म लिया था!


हर अगले सौदे में लड़ाकू हवाई जहाज, ड्रोन या मिसाइल की खरीद, मंगलयान, बुलेट ट्रेन, हर कुछ दिनों के अंतराल पर अंतरिक्ष की वैश्विक उड़ान… विकास की ढोल… के बीच अगर सीवर या मैला साफ करने के लिए मामूली टेक्नोलॉजी या मशीनें नहीं हैं, तो इसका मतलब सिर्फ और सिर्फ यह है कि साफ-सफाई के कामों में कुछ खास जातियों को झोंके रखना है, ताकि इस पंडा-व्यवस्था की क्रूर जात-व्यवस्था बनी रहे!

पता नहीं कब, किस सरकार ने सीवर सफाई को मशीनों पर छोड़े या सीवर में उतरने वाले इन्हीं मजदूरों को आधुनिक मशीनें चलाने की ट्रेनिंग देकर उन्हें सीवर या पाखाने की गैस से मरने से बचने का इंतजाम किया..! बुलेट ट्रेन की मुनादी करती सरकारों और उसके हरकारों को कभी इसी पाखाने में डूब मरने का मन करता है इस हालात पर…?

लेकिन मुझे पता है कि दुनिया भर के उपग्रहों को अंतरिक्ष में ले जाने का गर्व ढोते इस देश की सरकारों और पार्टियों को किसी से डर नहीं है, लेकिन शर्म को भी उन्होंने उतार फेंका है!

(नोट- शनिवार को दक्षिण दिल्ली के घिटोरनी इलाके में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान दम घुटने से चार सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई है)


अरविंद शेष वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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