fbpx
ट्रेंडिंग  
ट्रेंडिंग  
विमर्श

मीडिया की स्वतंत्रता पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश उर्मिल की दर्द भरी टिप्पणी

तब और अब: सन् 1986 से पत्रकारिता में हूं। वैसे स्वतंत्र रूप से अखबारी लेखन की शुरुआत सन् 1983 में हो गई थी। शायद ही कभी किसी सत्ता की भजनमंडली में शामिल हुआ। दिल्ली, बिहार, यूपी, पंजाब और जम्मू कश्मीर की तमाम आई-गई सरकारों को जब कभी कुछ गलत या जनविरोधी करते देखा या पाया, हमेशा उनके ऐसे कदमों की लिखकर या बोलकर आलोचना की।

Advertisement

इसके ठोस सबूत मेरी पुस्तकों, ‘बिहार का सच'(1991), ‘झारखंड जादुई जमीन का अंधेरा'(1999) ‘भारत में आर्थिक सुधार के दो दशक'(2010) और ‘कश्मीर विरासत और सियासत’ (2006) में भी मिल जायेंगे। लेकिन इस तरह के मेरे अखबारी लेखन, प्रसारित टिप्पणियों या पुस्तकों को लेकर कभी किसी मित्र या अमित्र की ऐसी बातें सुनने को नहीं मिलीं कि ‘तुम ये सब या इस तरह का, क्यों लिखते हो, वक्त ठीक नहीं! कुछ भी हो सकता है! थोड़ा संयम बरतो(यानी अपने को स्वयं ही सेंसर करके लिखो या बोलो)!’

पढ़ेः दिलीप मंडल के बीस सवाल, जो नरेंद्र मोदी से नहीं पूछता सेल्फी मीडिया

वीपी, राव, देवगौड़ा, गुजराल, वाजपेयी, मनमोहन के दौर में अखबार क्या सरकारी प्रसारण माध्यमों में भी (हालांकि कांग्रेसी शासन में दूरदर्शन आदि पर मुझे यदाकदा ही बुलाया गया) सरकार की आलोचना करता रहता था। अब तो खैर, वहां से साल में एकाध बार कभी बुलावा आता है, वह भी ठोस सुझाव के साथ कि ‘सर, ध्यान रखिएगा, ज्यादा न हो जाय!’

पढ़ेः विकास का मॉडल क्या होता है? आइये सरल भाषा में बात कर लें


इधर, कुछ अखबारों ने तो कालम छापना भी बंद कर दिया, कुछ चैनलों ने बुलाना बंद कर दिया! कुछ यदाकदा अब भी छाप देते हैं या बुला लेते हैं। शुभचिंतक अक्सर हिदायत देते हैं, ‘थोड़ा बदलिये अपने को, जमाना ठीक नहीं!’ ये फर्क तो दिख रहा है भाई! भारत उर्फ इंडिया सचमुच ‘बदल’ रहा है!

Latest अपडेट के लिए National Dastak पेज को Like और Follow करे

0
To Top

© copyright reserved National Dastak. All right reserved