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विमर्श

भारत की गुलामी और पिछड़ेपन का असली कारण

इस देश में एक तबका है जो अपने छोटे से दायरे में एक ही जाति और वर्ण के लोगों की टीम में बैठकर सदियों से निर्णय लेता रहा है। अन्य वर्ण और जातियों की क्या सोच हो सकती है उन्हें पता नहीं, न ही वे पता करने की जरूरत समझते हैं। इसीलिए जिस हुजूम को भारत कहा जाता है वो कभी “एक समाज” नहीं बन सका। एक समाज बनते ही ऊपर के 15 प्रतिशत लोगों की सत्ता खत्म हो जायेगी और हाशिये पर पड़े लोगों को समाजनीति, राजनीति, व्यापार और धर्म में भी शामिल करना पड़ेगा।

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इस तरह समाज और देश में लोकतन्त्र को वास्तव वे जगह देनी होगी। इस डर के कारण समानता के विचार से इस देश के ठेकेदारों को हमेशा से चिढ़ सी रही है। समानता अगर आ गयी तो सामन्तवादी, पूंजीवादी और इश्वरसत्ता वादी कहां जायेंगे? ये प्रश्न ही खड़ा न हो इसलिए वे 15 प्रतिशत अभिजात्य नीचे के 85 प्रतिशत ओबीसी (शूद्रों) दलितों और आदिवासियों को शिक्षा, धर्म, राजनीती इत्यादि में शामिल ही नहीं होने देते थे।

जब भारत अकेला था तब आंतरिक खेल में इसका जबरदस्त फायदा उन 15 प्रतिशत को होता रहा है। लेकिन जब दूसरे सभ्य और जाति वर्ण विहीन मुल्कों से भारत की टक्कर हुई तब ये भारत का ये शोषक मॉडल बुरी तरह बेनकाब होकर पिट गया।

इन 15 प्रतिशत मे से सिर्फ 5 प्रतिशत ने युद्ध और लड़ाई का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखा था। 3 प्रतिशत ने पढ़ने का अधिकार रखा और शेष ने व्यापार पर कब्जा किया था। लेकिन मुस्लिम, मंगोल, तुर्क, अफ़ग़ान, डच, स्पेनिश, पुर्तगीज, फ्रेंच और ब्रिटिश आदि समाजों की संरचना में ऐसे विभाजन न थे। वहां कोई भी आदमी योग्य होने पर कोई भी व्यवसाय या ज्ञान सीखकर सम्मान से जी सकता था। कोई भी सैनिक, व्यापारी, शिक्षक इत्यादि बन सकता था।

एक खुली प्रतियोगिता वहां थी। इसीलिये वहां ज्ञान विज्ञान व्यापार और यद्ध कौशल का भी तेजी से विकास हुआ। भारत में सिर्फ 3 प्रतिशत लोग ज्ञान विज्ञान खोज रहे हैं, 5 प्रतिशत युद्ध अभ्यास कर रहे हैं। गौर से देखिये तो सिर्फ 8 प्रतिशत मानव संसाधन ही कुछ निर्णय लेने की स्थिति में है, इसमें भी अधिकांश आपस में लड़ रहे हैं।


लेकिन अन्य देशों में 100 प्रतिशत लोगों को अधिकार है कि वे योग्यता साबित करके कुछ भी बन सकते हैं। इसीलिये जब वहां के 1 प्रतिशत से भी कम लोगों ने भारत पर आक्रमण किया तब भारत का ज्ञान विज्ञान और भारत की सेनाएं उनके सामने टिक नहीं सकीं। नतीजा क्या हुआ? भारत दो हजार साल लगातार गुलाम रहा जिन देशों ने भारत पर राज किया वहां का समाज ईमानदारी से सबको मौके देता था इसलिए वे किसी भी मुद्दे पर बहुत जल्द कोई स्पष्ट राय बना पाते थे। इसी कारण वे युद्ध और आक्रमण जैसे अभियानों को संगठित कर सके। लेकिन भारत कभी कोई निर्णय न ले सका और आक्रमण तो बहूत दूर रहा आत्मरक्षा के लिए भी संगठित नहीं हो सका।

विभाजन इतने गहरे थे कि क्षत्रियों में भी आपसी फूट थी। ये खुद आपस में लड़ रहे थे। जिन लोगों ने भारत में ऐसी समाज व्यवस्था बनाई और चलाई वे असली गुनाहगार हैं। गौर से देखिये और समझिये भारत की गुलामी का यही बुनियादी कारण है। बाकी दूसरी बातें तो इसी बुनियादी कारण का परिणाम भर हैं। जो लोग वर्ण और जाति व्यवस्था को बनाये रखते हैं और उसकी प्रशंसा में ग्रन्थ लिखते हैं सामाजिक नियम बनाते हैं वे ऐतिहासिक रूप से भारत के दुश्मन हैं।

उन्होंने जान बूझकर इस देश को दो हजार साल से ज्यादा की गुलामी दी है। असली देशद्रोहियों को पहचानिये। लेकिन दुर्भाग्य देखिये इस देश का! आजकल ये ही लोग हमें राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रवाद सिखा रहे हैं। जब चोरों के हाथ में तिजोरी की चाबी हो तो चोर सबसे पहले ईमानदारी पर भाषण देते हैं। भारत में यही दौर चल रहा है। उनके भाषण सुनिये और तालियां बजाते रहिये। लेकिन आपको इस देश की जरा भी फ़िक्र है तो इस वर्ण और जाति के खिलाफ खड़े होइए। अब भारत ज्यादा देर तक इस आंतरिक फूट के साथ नहीं चल सकता। देखिये ये देश ग्लोबल समाज के सामने कितना कमजोर और फिसड्डी साबित हो रहा है। अभी तक ओलम्पिक में क्या मिला है? कितने नोबेल मिले है? कितने ऑस्कर मिले हैं?

अगर आप सच में भारत से प्रेम करते हैं तो ब्राह्मणवाद और वर्णव्यवस्था सहित जाति व्यवस्था के खिलाफ सक्रिय हो जाइए। बाकी 15 प्रतिशत गद्दारों की लफ्फाजी से खुद को और अपने लोगों को बचाइये।

(ये लेखक के निजी विचार हैं। संजय जोठे टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में शोधार्थी हैं।)

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