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90 का दशकः वंचितों की सामाजिक इन्साफ की लड़ाई बनाम ब्राह्मणवाद का जंगलराज

बिहार ही नहीं पूरे देश के अभिजात्य वर्ग की मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग ने एक साजिश के तहत यह बहस स्थापित किया की 1990 के बाद बिहार बर्बाद हो गया। इन जनता दली समाजवादियों और लालू यादव ने शिक्षा व्यवस्था को चौपट कर दिया है। 70 के दशक मे जब प्रसिद्ध समाजवादी नेता, सामाजिक न्याय के पुरोधा कर्पूरी ठाकुर जी दबे कचुले और अंतिम पायदान के लोगों के लिए शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम उठाये। उन्होंने 1978 में पिछड़े वर्ग के लिए 26 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा और मैट्रिक की परीक्षा मे अंग्रेजी की अनिवार्यता को ख़त्म किया। तब एक छत्र राज करने वाला स्थापित समाज हिल गया। उन्हें सामंती वर्ग चौक चौराहे पर भद्दी भद्दी गालियों से उनके नाम का सम्बोधन करते और नारा लगाते- ‘एम.ए. बी.ए. पास करेंगे, कर्पूरी को …बांस करेंगे।’ ‘पिछड़ी जाति कहां से आयी, कर्पूरी की …बियायी।

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हर दौर में पेरियार से लेकर फुले, अम्बेडकर, जगदेव, ललई, कांशीराम, इन तमाम बहुजन नायकों के साथ-साथ जिसने भी सामाजिक न्याय के सवालों पर काम किया है उसको यथास्थितिवादीयो ने गालीयों से नवाजा है। 90 के दौर में यही हाल लालू जी के साथ हुआ। वंचितों के भागीदारी का सवाल मजबूती से उठाया तो सामंतियो के आखों का कांटा बन गये।

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बिहार को इन अभिजात्य बुद्धिजीवी ने पूरे दुनिया में बदनाम किया। जैसे मानो की श्री कृष्ण सिंह से लेकर जग्रनाथ मिश्रा के शासनकाल मे बिहार विकास में और शिक्षा के क्षेत्र में लंदन जैसा था। बिहार को बदनाम करने वालों को अपनी जानकारी बढाने की जरुरत है, जनता दल और लालू जी के शासन काल के दौरान 2001 तक साक्षरता दर मे 47.53% की बढोतरी हुई थी, जबकी जग्रनाथ मिश्रा के शासन काल के दौरान 1991 तक साक्षरता दर 37.49 % थी। लालू जी के शासनकाल मे ही बिहार मे छह विश्वविद्यलयों की स्थापना की गयी, छपरा में जयप्रकाश नारायण विश्वविद्यालय, मधेपुरा में भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, दुमका में सिद्धू कान्हू विश्वविद्यालय, आरा में कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, हजारीबाग में विनोबा भावे विश्वविद्यालय, और मौलाना मजरूल हक अरबी फारसी विश्वविद्यालय।

बिहार लोक सेवा आयोग की परिक्षा उर्दू में भी देने की सुविधा करवाई गई। अल्पसंख्यक आयोग को कानूनी अधिकार देने वाला बिहार देश का पहला राज्य बना। वो दौर था वंचितों एवम शोषितों के सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक प्रतिस्ठा दिलाना। जैसे-जैसे लोगों में अपने अधिकारों को लेकर चेतना आएगी, स्थापित वर्गों के साथ संघर्ष बढ़ेगा। लालू जी ने गरीबों के लिए नारा दिया था- ‘पढ़ना लिखना सीखो’। इसी क्रम में चरवाहा विधालय जैसी बहुआयामी परियोजना शुरू की गयी। जिसके माध्यम से गाय, भैस, बैल, बकरी, सूअर, भेड़ आदि पशुधन से जुड़े बच्चों को पशुपालन के साथ साथ प्रारंभिक स्तर की शिक्षा उपलब्ध कराई गई।


https://youtu.be/VxIy8Rf4Dps

इस कार्यकर्म की प्रशंसा यूनीसेफ जैसी संस्था ने संस्था ने की। इसके सफलता और असफलता पर बहस की जा सकती। मंडल के पूर्व तक यही होता था कि सामंत वर्ग का कोई छात्र लाख-दो लाख खर्च करके तकनीकी डिग्री हासिल कर लेता था। परिणाम यह हुआ कि एक ऐसा वर्ग तैयार हुआ जिसके पास डिग्री तो थोक में थी लेकिन जानकारी निम्न स्तर की थी। सामाजिक दृष्टि से मूल्यांकन करने पर बाते स्पष्ट हो जाती थी कि ऐसा ही शिक्षित युवा वर्ग लालू सरकार के विरुद्ध पटना के चौराहे पर जुलूस प्रदर्शन और सरकार के खिलाफ भला बुरा कहता मिल जाता था।

इस डेटा से देख सकते है की बिहार के शिक्षा व्यवस्था किसने चौपट किया है…

Literacy Rate from 1951-2001

SL Year Persons Males Females
1.  1951     13.49       22.68        4.22
2. 1961      21.95      35.85         8.11
3. 1971      23.17      35.86         9.86
4. 1981     32.32      47.11          16.61
5. 1991     37.49      51.37          21.99
6. 2001    47.53      60.32         33.57

सामाजिक न्याय और साम्प्रदायिक सदभाव पर मज़बूती से काम करने वाली जनता दल की सरकार ने जो रोटी तवा पर एक तरफ पक रही थी उसको पलट दिया तो यथायिस्तिथिवादी इस परिवर्तन से घबराकर जंगल राज बोलकर बदनाम किया और अभी तक बदनाम कर रहे है।

अमित कुमार (शोध छात्र)
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय
दिल्ली,संस्थापक सदस्य यूनाइटेड ओबीसी फोरम, JNU

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