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विमर्श

पिछडों के उन्नायक वीपी सिंह और आरक्षण का अधूरा सफ़र

आरक्षण के प्रणेता व उपेक्षितों के उन्नायक पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का रविवार को (25 जून 1931 – नवंबर 2008) 86वां जन्मदिन मनाया गया, जिन्होंने मंडल कमीशन के थोड़े हिस्से को लागू करते हुए पिछड़ों के लिए सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण की घोषणा की। 392 पृष्ठ की मंडल कमीशन की रिपोर्ट देश को सामाजिक-आर्थिक​ विषमता से निबटने का एक तरह से मुकम्मल दर्शन देती है जिसे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व सांसद बी.पी. मंडल ने अपने साथियों के साथ बड़ी लगन से तैयार किया था। 20 दिसंबर 1978 को प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने अनुच्छेद 340 के तहत नए पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की घोषणा सदन में की। आयोग की विज्ञप्ति 1 जनवरी, 1979 को जारी की गई, जिसकी रिपोर्ट आयोग ने 31 दिसंबर 1980 को दी जिसे राष्ट्रपति ने अनुमोदित किया। 30 अप्रैल 1982 में इसे सदन के पटल पर रखा गया, जो 10 वर्ष तक फिर ठंडे बस्ते में रहा। वी.पी. सिंह की सरकार ने 7 सितंबर 1990 को सरकारी नौकरियों में पिछड़ों के लिए 27% आरक्षण लागू करने की घोषणा की।

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वर्षों धूल फांकने के बाद मंडल कमीशन की रिपोर्ट पर शरद यादव, रामविलास पासवान, जार्ज फर्नांडिस, मधु दंडवते, लालू प्रसाद, अजीत सिंह, आदि नेताओं द्वारा सदन के अंदर लगातार धारदार बहस और सड़क पर सतत संघर्ष के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री व पिछड़ों के उन्नायक वीपी सिंह ने अपनी जातीय सीमा खारिज़ करते हुए, बुद्ध की परम्परा का निर्वहन करते हुए इस देश के अंदर लगातार बढ़ती जा रही विषमता की खाई को पाटने हेतु कमीशन की रपट को लागू करने का साहसिक, ऐतिहासिक व सराहनीय क़दम उठाकर यह स्पष्ट संदेश दिया कि इच्छाशक्ति हो व नीयत में कोई खोट न हो, तो मिली-जुली सरकार भी क़ुर्बानी की क़ीमत पर बड़े फ़ैसले ले सकती है।

वीपी सिंह ने जिस मंत्रालय के ज़िम्मे कमीशन की सिफारिश को अंतिम रूप देने का काम सौंपा था, उसकी लेटलतीफी देखते हुए उन्होंने उसे रामविलास पासवान के श्रम व कल्याण मंत्रालय में डाल दिया। उस समय यह मंत्रालय काफी बड़ा हुआ करता था और अल्पसंख्यक मामले, आदिवासी मामले, सामाजिक न्याय व अधिकारिता, श्रम, कल्याण सहित आज के छह मंत्रालयों को मिलाकर एक ही मंत्रालय होता था। श्री पासवान की स्वीकारोक्ति है कि तत्कालीन सचिव पी.एस. कृष्णन, जो दक्षिण भारतीय ब्राह्मण थे; ने इतने मनोयोग से प्रमुदित होकर काम किया कि दो महीने के अंदर मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों को अंतिम रूप दे दिया गया।

दुनिया में आरक्षण से बढ़कर ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनी, जिसने इतने कम समय में अहिंसक क्रान्ति के ज़रिये समाज के इतने बड़े तबके को गौरवपूर्ण व गरिमापूर्ण जीवन जीने में इससे ज़्यादा लाभ पहुँचाया हो। सरकार की क़ुर्बानी देकर आने वाली पीढ़ियों की परवाह करने वाले जननेता वी.पी. सिंह जैसी शख़्सियतों के बारे में ही राजनीतिक चिंतक जे. एफ. क्लार्क कह गये: “एक नेता अगले चुनाव के बारे में सोचता है, जबकि एक राजनेता अगली पीढ़ी के बारे में।”

वीपी सिंह ने साबित किया कि यदि दूरदृष्टि, सत्यनिष्ठा व इंटेग्रिटी हो, तो अल्पमत की गठबंधन सरकार भी समाजहित व देशहित में ऐतिहासिक व ज़रूरी फ़ैसले ले सकती है। जो काम उनके पहले के प्रधानमंत्री अपने पाँच साल के कार्यालय में भी नहीं कर पाये, उसे उन्होंने साल भर के अंदर कर दिखाया। उस वक़्त सत्ता व समानांतर सत्ता का सुख भोगने को आदी हो चुके जातिवादी नेताओं ने परिवर्तन की जनाकांक्षाओं को नकारते हुए उल्टे मंडल कमीशन को लागू कराने की मुहिम में जुटे नेताओं को जातिवादी कहना शुरू कर दिया। मंडल आंदोलन के समय पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा ने कहा था, “जिस तरह से देश की आजादी के पूर्व मुस्लिम लीग और जिन्ना ने साम्प्रदायिकता फैलाया उसी तरह वीपी सिंह ने जातिवाद फैलाया। दोनों समाज के लिए जानलेवा हैं।”


तब तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने गरजते हुए कहा था, “चाहे जमीन आसमान में लटक जाए, चाहे आसमान जमीन पर गिर जाए, मगर मंडल कमीशन लागू होकर रहेगा। इसपर कोई समझौता नहीं होगा”। कपड़ा मंत्री शरद यादव, श्रम व रोज़गार मंत्री रामविलास पासवान, उद्योग मंत्री चौधरी अजीत सिंह, रेल मंत्री जार्ज फर्णांडिस, गृह राज्यमंत्री सुबोधकांत सहाय, सबने एक सुर से जातिवादियों और कमंडलधारियों को निशाने पर लिया।

रामविलास पासवान ने कहा, “वीपी सिंह ने इतिहास बदल दिया है। यह 90 % शोषितों और शेष 10 % लोगों के बीच की लड़ाई है। जगजीवन राम का ख़ुशामदी दौर बीत चुका है और रामविलास पासवान का उग्र प्रतिरोधी ज़माना दौर सामने है”।

सुबोधकांत सहाय ने कहा, “जो कोई भी सामाजिक न्याय के रथ का विरोध करेगा, कुचल कर समाप्त कर दिया जाएगा”।

अजीत सिंह ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा, “सिर्फ़ चंद अख़बार, कुछ राजनीतिक नेता और कुछ अंग्रेज़ीदां लोग मंडल कमीशन का विरोध कर रहे हैं जो कहते हैं कि मंडल मेरिट को फिनिश कर देगा। आपको मंडल की सिफ़ारिशों के लिए क़ुर्बानी तक के लिए तैयार रहना चाहिए”।

90 के दशक में पटना के गाँधी मैदान के रैला में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद जनसैलाब के बीच जोशोखरोश के साथ वीपी सिंह का अभिनंदन कर रहे थे:
राजा नहीं फ़कीर है
भारत की तक़दीर है।

इस ऐतिहासिक सद्भावना रैली में वीपी सिंह ने कालजयी भाषण दिया था, “हमने तो आरक्षण लागू कर दिया। अब, वंचित-शोषित तबका तदबीर से अपनी तक़दीर बदल डाले, या अपने भाग्य को कोसे।” उन्होंने कहा, “बीए और एमए के पीछे भागने की बजाय युवाओं को ग़रीबों के दु:ख-दर्द का अध्ययन करना चाहिए। लोकसभा और राज्यसभा की 40 फ़ीसदी सीटें ग़रीबों के लिए आरक्षित कर देनी चाहिए। विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के पास जमा गैस और खाद एजेंसियों को ग़रीबों के बीच बांट देना चाहिए।” आगे वो बेफ़िक्र होकर कहते हैं, “मैं जानता हूँ कि मुझे प्रधानमंत्री के पद से हटाया जा सकता है, मेरी सरकार गिरायी जा सकती है। वे मुझे दिल्ली से हटा सकते हैं, मगर ग़रीबों के दरवाजे पर से नहीं।”

ज़ाहिर है कि पसमांदा समाज ने अपनी तक़दीर ख़ुद गढ़ना गवारा किया, और नतीजे सामने हैं। हाँ, सामाजिक बराबरी व स्वीकार्यता के लिए अभी और लम्बी तथा दुश्वार राहें तय करनी हैं, बहुत से रास्ते हमवार करने हैं।

पढ़ें- मंडल सेना ने बिहार से शुरू किया ‘मोदी हटाओ-देश बचाओ’ अभियान

पर अफ़सोस कि मंडल आयोग को सिर्फ़ आरक्षण तक महदूद कर दिया गया, जबकि बी पी मंडल ने भूमिसुधार को भी ग़ैरबराबरी ख़त्म करने की दिशा में महत्वपूर्ण कारक माना था। स्वाधीनता के बाद भी संपत्ति का बंटवारा तो हुआ नहीं। जो ग़रीब, उपेक्षित, वंचित थे, वो आज़ादी के बाद भी ग़रीब और शोषित ही रहे। उनकी ज़िंदगी में कोई आमूलचूल बदलाव नहीं आया। अभी तो आरक्षण ठीक से लागू भी नहीं हुआ है, और इसे समाप्त करने की बात अभिजात्य वर्ग की तरफ से उठने लगी है।

मौजूदा नस्ल को हर वक़्त सचेत रहने की ज़रूरत है कि लोकतंत्र को कभी भी फॉर ग्रांटिड नहीं लिया जा सकता। हर दिन यह अपने नागरिकों से सतर्कता व प्रतिबद्धता की अपेक्षा रखती है। यह खु़द के प्रति छलावा होगा कि जम्हूरियत अपनी हिफ़ाज़त ख़ुद कर लेगी। लोकतंत्र की आयु के लिहाज़ से 70 साल कोई दीर्घ अवधि नहीं होती। हिन्दुस्तानी जमहूरियत अभी किशोरावस्था से निकली ही है। पर, इतनी कम उम्र में इसने इतने सारे रोग पाल लिए हैं कि बड़ी चिंता होती है। कुपोषण के शिकार दुनिया के सबसे बड़े व कमोबेश क़ामयाब इस बाहर से बुलन्द व अंदर से खोखले होते जा रहे लोकतंत्र का समय रहते इलाज़ करना चाहिए।

https://www.youtube.com/watch?v=QBFNm9KgCcI

विश्व की किसी भी कल्याणकारी योजना से इतने कम समय में इससे बड़ी तादाद व जमात में लोगों के जीवन-स्तर में शायद ही असरदार व काबिले-ज़िक्र तब्दीली आयी हो। अमेरिका में भी दबे-कुचले समुदाय के लोगों की ज़िन्दगी संवारने व उन्हें मुख्यधारा में लाने हेतु अफरमेटिव एक्शन का प्रावधान है और वहाँ इसके प्रतिरोध में कभी कुतर्क नहीं गढ़े जाते। मुझे अमेरिकी कवयित्री एला व्हीलर विलकॉक्स याद आती हैं :
In India’s land one listens aghast
To the people who scream and bawl;
For each caste yells at a lower caste,
And the Britisher yells at them all.

(“In India’s Dreamy Land”)

अर्थात ,
भारतवर्ष में लोग बात सुनते
उन्हीं की जो चीखते व चिल्लाते ;
क्योंकि हर जाति दुर्बलतर जाति पर धौंस जमाती,
और, ब्रिटिशजन उन सब को हिकारत भरी नज़र से देखते.
(आर्यावर्त की स्वप्निल ज़मीं पर)

आरक्षण आरक्षण की ज़रूरत समाप्त करने के लिए लागू हुआ था। पर, क्या कीजै कि बड़ी सूक्ष्मता से इस देश में आरक्षण को डायल्युट किया जा रहा है और मानसिकता वही है कि हम तुम्हें सिस्टम में नहीं आने देंगे। पिछडों के उभार के प्रति ये असहिष्णुता दूरदर्शिता के लिहाज़ से ठीक नहीं है। केंद्र सरकार का डेटा है कि आज भी केंद्र सरकार की नौकरियों में वही 12 फ़ीसदी के आसपास पिछड़े हैं, जो कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के पहले भी अमूमन इतनी ही संख्या में थे। आख़िर कौन शेष 15 % आरक्षित सीटों पर कुंडली मार कर इतने दिनों से बैठा हुआ है ? यही रवैया रहा तो लिख कर ले लीजिए कि इस मुल्क से क़यामत तक आरक्षण समाप्त नहीं हो सकता।

जेएनयू जैसी जगह में भी आप पीएच.डी तो कर लेंगे, पर अध्यापन हेतु साक्षात्कार के बाद “नोट फाउंड सुटेबल” करार दे दिये जाएँगे। पर, ये भी थोड़ा संतोष देता था कि अब आप अपनी जीवटता, लगन और अपने जुझारूपन व अध्यवसाय से पढ़ ले पा रहे थे। ये सदियों के विचित्र समाज की कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी। मगर, इस साल से तो युजीसी ग़ज़ट की आड़ में उपेक्षितों-शोषितों की कोई खेप निकट भविष्य में शोध के ज़रिए अपने समाज के क्रानिक बीमारियों को समझने व दूर करने के लिए विश्वविद्यालय की देहरी लांघ ही नहीं पाएंगे। हर जगह, हर छोटे-बड़े विभाग बंद कर दिए गए हैं। जेएनयू में पिछले साल एम.फिल.-पी.एचडी. क इंटीग्रेटेड प्रोग्राम में हुए एडमिशन की तुलना में 83% की भारी सीट कट के साथ मात्र 102 सीटों पर इस साल दाखिले हो रहे हैं। अर्जुन सिंह ने 2006 में उच्च शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर मंडल को जो विस्तार दिया था, उसमें पलीता लगा दिया गया है। अगर बी. पी. मंडल, वी. पी. सिंह अर्जुन सिंह एवं उस वक़्त के संघर्ष के अपने जांबाज योद्धाओं को सच्चे अर्थों में हम याद करना व रखना चाहते हैं, तो हमें निकलना ही होगा सड़कों पर, तेज़ करने होंगे व बदलने भी पड़ेंगे प्रतिरोध के अपने औजार।

जो लोग ज़माने की ठोकरों में पलते हैं
एक दिन वही​ ज़माने का रुख़ बदलते हैं।

जो लोग रात-दिन आरक्षण के ख़िलाफ़ आग उगलते हों, जिन्हें इस अखंड देश के पाखंड से भरे खंड-खंड समाज की रत्ती भर समझ न हो, उनसे मगजमारी करके अपना बेशक़ीमती वक़्त क्यों ज़ाया किया जाये ? मैंने ऐसे लोगों की सोची-समझी, शातिराना बेवकूफ़ी व धूर्तता की अनदेखी करने का फ़ैसला किया है। न वो ख़ुद को बदलने को तैयार हैं, न ही हो रहे बदलाव को क़ुबूल करने को राज़ी। इसलिए, अब जो भी समय पढ़ाई के बाद बचेगा, उसे वंचित समाज की जागरूकता, बेहतरी, उसकी शिक्षा व उसके उन्नयन के लिए लगाऊँगा। यही मुझे असली सुकून व संतोष देगा। एक बार पुन: आरक्षण लागू करने वाले सच्चे, साहसी व दूरदर्शी राजनेता वी. पी. सिंह को सलाम!

लेखक सेंटर फार मीडिया स्टडीज़, जेएनयू में शोधार्थी हैं।
इ-मेल : jigyasu.jayant@gmail.com

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