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हम बड़ी धूम से बस शोक मना लेते हैं

आरएसएस के विचारक हैं राकेश सिन्हा, हंसी तो इस बात पर आ जाती है कि आरएसएस में विचारक नहीं प्रोपगेंडिस्ट पैदा होते हैं फिर भी वे खुद को विचारक बताते हैं। खैर राकेश सिन्हा ने बीबीसी पर जुनैद की हत्या पर लेख लिखा है। लेख में उन्होंने कहने की कोशिश की है कि जुनैद की हत्या को सांप्रदायिक चश्मे से न देखा जाये। मेरा सवाल है कि क्यों नहीं देखा जाये? क्या तब भी नही देखा जाये जब जुनैद के कातिल जुनैद को मारते हुऐ कह रहे हों कि “तुम मुल्ले पाकिस्तानी हो और बीफ़ खाते हो” क्या तब भी इस घटना को सांप्रदायिक घटना नहीं माना जाये जब 16 वर्षीय जुनैद ने खुद के संस्कारों का परिचय देते हुऐ एक बुजुर्ग को अपनी सीट दे दी हो, और विवाद होते ही सबसे पहला हमला उसी बुजुर्ग ने किया हो जिसे जुनैद ने अपनी सीट ऑफर की थी?

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यह इत्तेफाक तो नहीं हो सकता कि जिस बच्चे ने जिस बुजुर्ग को सीट दी उसी ने जुनैद पर पहला वार किया? पूरी ट्रेन में क्या ऐसा एक भी आदमी नही था जो इस जुल्म के खिलाफ जुनैद के कातिलों से लड़ जाता ? दरअसल या तो यह मुसलमानो के खिलाफ नफरत थी या फिर ट्रेन के यात्रियों को यह डर था कि क्यों फालतू के झगड़े में पड़ा जाये? धार्मिक टिप्पणी, जातीय टिप्पणी मुस्लिम समाज को गाली देना भी क्या सांप्रदायिक नहीं है? मगर राकेश सिन्हा को लगता है कि विपक्षी इसी बहाने मोदी को घेरना चाह रहे हैं।

राकेश सिन्हा या तो अंजान हैं या फिर जानबूझकर अंजान बने रहना का ढोंग कर रहे हैं, मोदी के पीएम बनते ही पुणे के साफ्टवेयर इंजीनियर मोहसिन शेख की हत्या पीट पीट कर ही की गई थी। इसके बाद दादरी में मंदिर से ऐलान करके अखलाक का ऐलानिया कत्ल का यह सिलसिला अब ट्रेन में सफर कर रहे मुसलमानों तक आ पहुंची है। लेकिन सत्ताधारी पार्टी के लोग यह कहकर बचाव कर रहे हैं कि ट्रेन में अक्सर इस तरह की घटनाऐं हो जाया करती हैं। जुनैद की हत्या से पहले इस देश में इस तरह पहचान के कारण शायद ही कोई हत्या की गई हो यह, पहली हत्या है इसके बावजूद भी यह हत्या सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं को सांप्रदायिक हत्या नजर नहीं आ रही है तो फिर इसमें उन नेताओं की नजर को ही दोष दिया जायेगा।

क्या यह सच नहीं है कि मोदी सरकार आने के बाद इस देश में भाजपा के नेताओ ने कहना शुरु किया कि 1200 साल का गुलामी से आजादी मिली है ? क्या यह सच नही है कि भाजपा और उसके अनुषांगिक संगठनों ने यह प्रचारित किया कि यह देश अंग्रेजों से ज्यादा मुगलों (मुसलमानों) का गुलाम रहा है? क्या यह सच नही है कि बजरंगदल, हिन्दुवाहिनी, और दूसरे हिंसक संगठनो ने हिन्दु युवाओं को संगठन में शामिल करने की मुहिम तेज की और फिर उन्हें देशभक्ती नाम पर देश के जो दुश्मन दिखाये गये उनकी शक्लो सूरत मुसलमानों जैसी है? आज भी फैजाबाद के आस पास उग्र हिन्दुवादी संगठनों द्वारा देशभक्ती की ट्रेनिंग चलाई जा रही है जिसमें देश के दुश्मन के तौर पर मुसलमानों की शक्लो सूरत दिखाई जा रही है?

https://www.youtube.com/watch?v=iXD2sYY7kbY

दो साल पहले दिल्ली से सटे गाजियाबाद के बम्हेटा गांव में अराजकता के अखाड़े सामने आये जिसमें प्रशिक्षण के दौरान खुले आम यह कहा जाता था कि वे आतंकवाद के खिलाफ लड़ना सीख रहे हैं क्योंकि आईसिस जब भारत पर हमला करेगा तब भारत के मुसलमान आईसिस के साथ चले जायेंगे? ऐसे संगठन आये दिन सामने आते रहते हैं जो धर्म रक्षा के नाम पर युवाओं को हथियार चलाने का प्रशिक्षण देते हुऐ नजर आते हैं। हाल ही में बीती ईद पर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के मुसलमानों को ईद की मुबारक दी थी इस पर योगी को ट्रोल किया गया, ट्रोल करने वाले वही लोग थे जो कल तक योगी के विवादित और भड़काऊ बयानो पर तालियां पीटते थे। ट्रेन में हुई जुनैद की हत्या उसी नफरत का नतीजा है जिसे आरएसएस की शाखाओं से लेकर अखाड़ों के नाम पर नौजवानों की रगों में उतारा गया।


केन्द्र में मोदी सरकार आने के बाद लगातार अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाया गया, अब तथाकथित सैकुलर पार्टी के नेता भी मुसलमानों पर होने वाले हमलों के खिलाफ बोलने से कतराते हैं, या फिर बहुत नपा तुला बोल पाते हैं, उन्हें डर है कि कहीं मुसलमानों पर होने वाले जुल्म को अगर जुल्म बता दिया गया तो हिन्दू विरोधी होने का ठप्पा लगा दिया जायेगा।

https://www.youtube.com/watch?v=7SSlL2R7WHc

इस सबके बरअक्स मुसलमानों का संयम पिछले तीन साल से लगातार बना हुआ है, यह संयम अखलाक की मौत से लेकर झारखंड में एक ही दिन में बच्चा चोरी की अफवाह में मार दिये गये छह मुसलमानों की मौत पर भी नहीं टूटा, और जुनैद की मौत पर भी बना रहा, मुसलमानों ने इस बार पहली बार गांधीवादी विरोध किया कुछ मुस्लिम युवाओ ने ईद की नमाज़ के दौरान काली पट्टी बांधकर अपना विरोध दर्ज कराया, लेकिन जिस तरह आये दिन चुन चुन कर भीड़ द्वारा हत्याऐं की जा रही हैं उसे काली पट्टी बांधकर नहीं रोका जा सकता। क्योंकि कहीं न कहीं उस भीड़ के तार सरकारों से जुड़े हैं, मुसलमान पिछले तीन साल से सिर्फ शोक मना रहे हैं, सरकार की नजर में उनकी हैसियत इतनी भी नहीं कि प्रधानंत्री इस तरह की घटनाओं की निंदा कर सकें, या इन घटनाओं के विरोध में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री कोई ट्वीट ही कर दें। दो महीने पहले राजस्थान के अलवर में दूध के लिये गाय लेकर आ रहे 51 वर्षीय पहलू खान की गौआतंकियों द्वारा पीट पीट कर हत्या कर दी गई थी। उसी दौरान स्वीडन पर आतंकी हमला हुआ राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से लेकर देश के पीएम तक सब स्वीडन पर हुऐ आतंकी हमले की तो निंदा कर रहे थे लेकिन पहलू खान की मौत पर एक शब्द तक नहीं बोल पाये। अब मुसलमानों के हिस्सो में सिर्फ शोक है जिसे वे खुद ही मना रहे हैं।

बकौल शायर –
हमसे क़ातिल का ठिकाना नहीं ढूंढा जाता
हम बड़ी धूम से बस शोक मना लेते हैं।

(लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं)

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