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जब सरकार उपवास करने लगे तो विपक्ष को ज्यादा खाना चाहिए

मैं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा उपवास पर बैठने के निर्णय का हार्दिक स्वागत करता हूँ। हिंसा के सामने उन्होंने एक अहिंसक कदम उठाया है। आखिर वे मध्य प्रदेश की आत्मा हैं। जो आत्मा बेचैन होगी, वह शासन कैस कर सकती है?

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पहले कहा जाता था कि जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो। लेकिन मध्य प्रदेश में पहले से ही बहुत सारे अखबार निकलते हैं। ये अखबार कहने को प्राइवेट सेक्टर के अखबार हैं। पर इनमें जो कुछ छपता है, उसे पढ़ कर यही आभास होता है कि ये राजकीय अखबार है। राजप्रमुख की छवि निर्मित करना इनके अघोषित संविधान (हालाँकि यह अब उतना अघोषित भी नहीं रहा, क्योंकि मध्य प्रदेश के लोग समाचार बाद में पढ़ते हैं, उसका अर्थ पहले निकाल लेते हैं) की उद्देशिका है। इन्होंने डाक विभाग का मोटो ‘अहर्निशम् सेवामहे’ उसकी अनुमति लिये बिना अपना लिया है। इसलिए एक और अखबार निकाल कर क्या होगा। उसके बजाय उपवास पर बैठना सस्ता पड़ेगा। फिर अखबार का लक्ष्य क्या होता है? सनसनी फैलाना। मुख्यमंत्री के उपवास से ज्यादा सनसनी फैलेगी। जितनी फैलेगी नहीं, उससे ज्यादा अखबार फैला देंगे।

मुख्यमंत्री ने कहा है कि वे मृत किसानों के प्रति शोक प्रकट करने के लिए अनिश्चितकालीन उपवास पर बैठ रहे हैं। उपवास शास्त्र में यह एक नया अध्याय है। यह जरूर सुना है कि किसी के शोक में लोग खाना-पीना छोड़ देते हैं। स्त्रियों के लिए यह बहुत सहज होता है, क्योंकि वैसे भी उन्हें भूखा रहने की आदत होती है। लेकिन यह कभी नहीं सुना कि शोक के अवसर पर कोई आदमी दिन तय करके घोषणा करे कि अमुक तारीख से मैं अनिश्चित काल के लिए खाना-पीना छोड़ दूँगा। शोक का मनोविज्ञान होता है, उसका अंकशास्त्र भी होता है, यह पहली बार देख रहा हूँ।

यह भावना पर बुद्धि की विजय है। भावना स्वच्छंद होती है। उसे शोक करने के लिए समय निश्चित नहीं करना होता। शोक होता है तो होता है, नहीं होता है तो नहीं होता है। ऐसा नहीं होता कि लाश आज उठे और शोक तीन दिन बाद उमड़े। लेकिन मुख्यमंत्री पद पर बैठा हुआ आदमी भावुक होने की जोखिम नहीं ले सकता। भावना से परिवार चलता होगा, राज्य नहीं चल सकता। राज्य परिवारों का जोड़ नहीं है, यह भेड़ों का जमावड़ा है जो चरवाहे के बिना सीधी रेखा में चल ही नहीं सकता। मुख्यमंत्री का काम चरवाहे का काम है। चरवाहे के हाथ में एक छड़ी होती है तो मुख्यमंत्री के हाथ में पुलिस होती है, जिसके बल पर वह राज्य को सीधी रेखा में चलाता है। जिसने भी दाये-बायें किया, तड़ से एक डंडा। डंडे से तो भूत भी भागते हैं। लेकिन जब यही चरवाहा डंडा फेंक कर उपवास पर बैठ जाये, तब? उम्मीद तो यही है कि भेडें सकते में आ जायेंगी और दाये-बायें छोड़ कर लाइन में आ लगेंगी।

मुख्यमंत्री ने ठीक किया है, सनसनी का जवाब सनसनी से दिया है। किसानों ने किसी आदमी को नहीं मारा, किसी जानवर की भी जान नहीं ली। उन्होंने ट्रक फूँके, कारें जलायीं। सामान का नुकसान किया। सामान की भरपाई हो सकती है। लेकिन मुख्यमंत्री की पुलिस ने किसानों की हत्या की। पाँच लोग मार डाले गये। जिस दिन मुख्यमंत्री ने उपवास पर बैठने का फैसला किया, उस दिन एक और किसान की जान ले ली। ऐसी स्थिति में कोई भी पारदर्शी और संवेदनशील मुख्यमंत्री चुप कैसे बैठ सकता है?


https://www.youtube.com/watch?v=ZO5BW7hoj-o

किसानों की हत्या से देश भर में जो सनसनी फैली,, वह हिंसक सनसनी थी। मुख्यमंत्री ने उसका जवाब अहिंसक सनसनी से दिया है। कहते हैं, बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। मुख्यमंत्री को पूरा विश्वास है कि उनकी बड़ी सनसनी किसानों की छोटी सनसनी को खा जायेगी। मुख्यमंत्री की भूख के आगे किसानों की भूख छोटी पड़ जायेगी। वे सकुचाते हुए धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र से अपने-अपने हाथ मलते हुए घर जा बैठेंगे। इधर उनके घर चूल्हा जलेगा, उधर मुख्यमंत्री मुस्कराते हुए नींबू-पानी का सिप लेंगे। इस तरह महाभारत खत्म हो जायेगा और कोई भी योद्धा ढेर न होगा।

लेकिन क्या इससे उनकी आत्मा को शांति भी मिलेगी, जो पुलिस की गोली से मारे गये हैं? वैसे तो आत्मा को शांति एक गाबदी मुहावरा है। जब शरीर शांत होता है तब आत्मा भी शांत हो जाती है। लेकिन ज्यदातर लोगों की मान्यता है कि शरीर जब शांत होता है, तब आत्मा और ज्यादा अशांत हो जाती है। मुझे तो लगता है कि इन किसानों की आत्मा तभी शांत होगी जब खेती की उपज का उचित मूल्य घोषित किया जायेगा। जो लोग आत्मा को मानते हैं, वे बखूबी कल्पना कर सकते हैं कि लाखों किसानों की आत्मा, जो मरे और जो मारे गये, आसमान के झरोखे से झाँक कर इंतजार कर रही होगी कि यह घोषणा कब की जाती है, ताकि उनके बेटे-बेटियों को आत्महत्या न करनी पड़े। लेकिन मुख्यमंत्री ने इस पहलू पर विचार करने का काम कॉलमिस्टों को सौंप दिया है और खुद अनशन पर बैठ गये हैं। आप ठीक समझे, वे किसानों की आत्मा को शांति प्रदान करने के लिए यह ऐतिहासिक कदम नहीं उठा रखे हैं, वे तो अपनी आत्मा की शांति के लिए उपवास कर रहे हैं। कोई भी आत्मा दूसरे की आत्मा को शांति प्रदान नहीं कर सकती, पर अपने को तो शांति प्रदान कर ही सकती है।

कोई यह न समझे कि मुख्यमंत्री ने उपवास पर बैठ कर अपने राजधर्म का त्याग कर दिया है। वही राजधर्म, जिसका पालन करने की सलाह प्रधानमंत्री वाजपेयी ने मुख्यमंत्री मोदी को दी थी। लेकिन मोदी ने तब वही किया था जो उनकी नजर में राजधर्म था और साथ ही उपवास पर भी बैठ गये थे। शिवराज सिंह ने भी ‘मत चूको चौहान’ की शैली में उपवास का रास्ता चुना है और राजधर्म भी नहीं त्यागा है।

अगर उपवास ही एकमात्र समाधान होता, तब मंत्रिमंडल के अन्य सदस्य, मुख्य सचिव, संयुक्त सचिव, उप-सचिव, आईजी-डीआईजी आदि-आदि भी मुख्यमंत्री के साथ उपवास पर बैठे होते और ‘सब को सन्मति दे भगवान’ का सामूहिक गायन कर रहे होंते। निश्चय ही इससे राज्य भर में शांति छा जाती और गुंडे तथा बलात्कारी भी घर लौट कर भजन-कीर्तन करने लगते। आहा, क्या दृश्य सुभग होता। आनंद चमत्कृत जग होता। लेकिन नहीं, मुख्यमंत्री जमीन से जुड़े आदमी हैं। वे जानते हैं कि स्वतंत्र छोड़ देने पर नदियाँ और नारियाँ विपथगामी हो सकती है, इसलिए उन्होंने पुलिस-प्रशासन को भी चौकस कर रखा है। पुलिस थाने में नहीं बैठेगी, आंदोलनकारियों का दमन करेगी, दूसरी ओर मुख्यमंत्री शोक मनायेंगे। एक हाथ मारेगा, दूसरा हाथ भजन करेगा। है न राजनीति की नयी शैली।

मुझे चिंता इस बात की है कि अब विपक्ष क्या करेगा? उसका एक बड़ा हथियार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने छीन लिया है। पहले मेधा पाटकर अनशन पर बैठ जाती थीं। ममता बनर्जी अनशन पर बैठ जाती थे। वी पी सिंह जब विपक्ष में आये, तब वे भी अनशन पर बैठने लगे। अब जबकि मुख्यमंत्री लोग स्वयं अनशन पर बैठने लगे हैं, तब विपक्ष के नेता क्या करेंगे? उन्हें मेरी सलाह है कि वे ज्यादा खाने लगें- इतना खायें, इतना खायें कि डॉक्टरों को आ कर उनकी नब्ज गिनने और रक्तचाप मापने के लिए भोजन स्थल पर आना पड़े और रोज स्वास्थ्य बुलेटिन निकालनी पड़े। आखिर शिवराज सिंह की भी स्वास्थ्य बुलेटिन जारी होगी ही। पक्ष-विपक्ष में साम्य नहीं होगा, तो देश कैसे चलेगा?

(लेखक राजकिशोर पत्रकार हैं। यह आर्टिकल उनकी फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है।)

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