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दुनिया की सबसे महंगी जाति जनगणना के आंकड़े कहां हैं?

सबसे महंगी गिनती की अगर कोई ग्लोबल लिस्ट बने तो उसमें भारत की आर्थिक और जाति जनगणना को जगह जरूर मिलेगी. केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक इस जनगणना पर कुल 3,543 करोड़ रुपए खर्च होने थे. 2011 में शुरू हुई यह जनगणना लगातार लंबी खिंचती चली गई और 31 मार्च 2016 को जब इस जनगणना का काम पूरा हुआ तो इसका खर्च 4,893 करोड़ रुपए हो चुका था. सरकार ने इस खर्च को मंजूरी भी दे दी, क्योंकि सरकारी योजनाओं में खर्च का इस सीमा तक बढ़ जाना एक सामान्य बात है और यह नियम के तहत है.

कैबिनेट की मंजूरी से शुरू हुई जाति जनगणना का कोई भी आंकड़ा आज तक नहीं आया है और जैसे हालात हैं उसमें लगता नहीं है कि इस जनगणना के आंकड़े कभी जारी भी किए जाएंगे. सवाल उठता है कि वह गिनती की ही क्यों गई, जिसके संपन्न हो जाने के बाद भी कोई आंकड़ा नहीं आया और न ही कोई आंकड़ा आएगा?

केंद्रीय कैबिनेट की आर्थिक मामलों की समिति ने 26 जुलाई, 2017 की बैठक में आर्थिक और जाति जनगणना के बढ़े हुए खर्च को मंजूरी देते हुए कहा कि यह जनगणना अपने तमाम लक्ष्यों को पूरा कर चुकी है. इसके बाद संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में यह जानकारी दी गई कि जाति के आंकड़े अभी जारी नहीं किए जा सकते क्योंकि एक कमेटी इस जनगणना की गलतियों का अध्ययन कर रही है. पिछले दो साल में उस कमेटी का गठन भी नहीं हुआ है, इसलिए कमेटी की किसी बैठक के होने का कोई सवाल ही नहीं है.

आरक्षण देने के लिए एससी एसटी की जनगणना होती रही

भारत में जनगणना की शुरुआत 1872 में हुई और 1881 के बाद से हर दस साल पर जनगणना करने का सिलसिला शुरू हुआ. आजादी से पहले 1931 में जनगणना हुई. 1941 की जनगणना काफी हद तक दूसरे विश्व युद्ध की भेंट चढ़ गई. 1931 तक जानगणना में जातियों की गिनती होती थी और इसके आंकड़े जारी किए जाते थे. लेकिन आजादी के बाद उस समय की सरकार और नीति नियंताओं ने तय किया कि हर जाति की गिनती करने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि भारत आखिरकार एक आधुनिक लोकतंत्र है, जहां व्यक्ति की पहचान नागरिक के तौर पर होगी, न कि किसी समूह के सदस्य के तौर पर.

हालांकि इसी तर्क के आधार पर धार्मिक समूहों की गिनती भी नहीं होनी चाहिए, लेकिन धार्मिक समूहों की गिनती कभी बंद नहीं हुई. सच तो यह भी है कि जातियों और अन्य समूहों की गिनती पूरी तरह नहीं रुकी. 1951 के बाद से भी हर जनगणना में अनुसूचित जाति और जनजाति की गिनती होती रही जो अब भी जारी है.

यह इसलिए जरूरी था क्योंकि इन समूहों को आबादी के अनुपात में संसद, विधानसभा, सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण देने और इनके लिए विशेष कार्यक्रम बनाने का संवैधानिक प्रावधान है. इनकी संख्या जाने बिना इन्हें संख्यानुपात में आरक्षण देना संभव नहीं था. इसलिए एससी और एसटी की जनगणना होती रही.

मंडल कमीशन ने कहा था जाति जनगणना रिपोर्ट जारी करे सरकार

जातियों की गिनती और संबंधित आंकड़े न होने की वजह से कई समस्याएं आने लगीं. मिसाल के तौर पर, कई राज्य सरकारें पिछड़ी जातियों को रिजर्वेशन दे रही थीं और उन्हें कितना रिजर्वेशन दिया जाना चाहिए, इसके लिए जरूरी आंकड़े नहीं थे. इनसे संबंधित विवाद लगातार अदालतों में पहुंच रहे थे और अदालतें सरकारों से आंकड़े मांग रही थी, जिसके आधार पर फैसले किए जा सके.

साथ ही विभिन्न जातियां अपने पिछड़ेपन को साबित करने में जुटी थीं/हैं, ताकि पिछड़ी जाति के आरक्षण के दायरे में वे शामिल हो जाएं. सरकार यह कहने की हालत में कभी नहीं रही कि आपकी जाति की जितनी संख्या है, उससे ज्यादा हिस्सेदारी आपको मिल चुकी है, इसलिए आरक्षण की आपकी मांग गैरवाजिब है. इस वजह से मराठा आरक्षण, जाट आरक्षण और आंध्र प्रदेश में कापू आरक्षण के आंदोलन खत्म नहीं हो रहे हैं.

जातियों के आंकड़ों की एक वाजिब जरूरत मंडल कमीशन के सामने आई. संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत गठित दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग यानी मंडल कमीशन को यह जिम्मा सौंपा गया था कि वह देश में सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का पता लगाए और उनकी तरक्की के उपाय सुझाए. सामाजिक पिछड़ापन जानने के लिए मंडल कमीशन को जातियों से संबंधित आंकड़ों की जरूरत थी. लेकिन 1931 की जनगणना के आंकड़ों के अलावा मंडल कमीशन के पास कोई नया आंकड़ा नहीं था.

मंडल कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में जाति जनगणना कराने के लिए सरकार से कहा. मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू करने की घोषणा 1990 में हुई और 1993 में केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी का रिजर्वेशन लागू हो गया. इसके बाद, 2001 की जनगणना में जाति को शामिल करने का फैसला तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा की सरकार ने किया. लेकिन 1998 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार आ गई और उसने जाति जनगणना न कराने का फैसला कर लिया.

पी. चिदंबरम ने जाति को जनगणना से कर दिया था बाहर

जाति जनगणना कराने का अगला मौका 2011 में आया. इस जनगणना में जाति को शामिल करने के सवाल पर 2010 में लोकसभा में बहस हुई और सभी दल इस बात पर सहमत हो गए कि जाति जनगणना करा ली जाए. लेकिन जब 2011 की जनगणना का समय आया तो तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने जनगणना से जाति को बाहर कर दिया और जाति की गिनती को बीपीएल की गिनती के साथ जोड़ दिया.

अभी जाति जनगणना के आंकड़ों में जो गड़बड़ियां आ रही हैं, उसकी जड़ में चिदंबरम का यही फैसला है. भारत में जनगणना गृह मंत्रालय के तहत होती है और इसे जनगणना आयुक्त कराते हैं. यह गिनती जनगणना अधिनियम 1948 के तहत होती है. इस वजह से जनगणना में गलत जानकारियां नहीं दी जा सकतीं. जनगणना के अलावा किसी और तरह की गिनती में सरकारी शिक्षकों को नहीं लगाया जा सकता.

इन प्रावधानों के बगैर जब आर्थिक और जाति जनगणना शुरू हुई तो पूरा काम बेहद अराजक तरीके से हुआ. जनगणना का काम एनजीओ से लेकर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं तक से कराया गया. जिन लोगों ने इस काम को किया और जिनको आंकड़ों का संकलन और विश्लेषण करना था, वे गैरअनुभवी लोग थे.

खर्च हो गए 5000 करोड़, जारी नहीं हुए आंकड़े

2015 में जब आर्थिक और जाति जनगणना की रिपोर्ट आई तो पता चला कि उसमें लगभग 46 लाख जातियों और गोत्र के नाम आ गए हैं. हर तरह की गलतियों की सम्मिलित संख्या 9 करोड़ पाई गई. इनको ठीक करने के लिए प्रधानमंत्री के निर्देश पर नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पानगड़िया के नेतृत्व में एक कमेटी बनाने की घोषणा की गई. लेकिन इस कमेटी के बाकी दो सदस्यों की नियुक्ति कभी नहीं हुई.

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एक अगस्त, 2017 को अरविंद पानगढ़िया नीति आयोग छोड़कर कोलंबिया यूनिवर्सिटी पढ़ाने चले गए. उनकी जगह किसी और को नियुक्त नहीं किया गया. अब सरकार कह रही है कि कमेटी के गठन और उसकी रिपोर्ट आने के बाद ही आंकड़े जारी किए जाएंगे.

इस तरह लगभग 5,000 करोड़ रुपए खर्च करके एक गिनती हुई, जिसके आंकड़े अब तक नहीं आए. आप अगर यह सोच रहे हैं कि इसके आंकड़े कभी नहीं आएंगे, तो आप शायद सही सोच रहे हैं.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, उनका यह आर्टिकल फर्स्टपोस्ट से साभार लिया गया है.)

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