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विमर्श

लालू यादव को ‘ललुआ’ क्यों कहते हैं मनुवादी लोग?

देश के सारे नेता मसलन अटल जी, आडवाणी जी, मोदी जी, राजीव जी, सोनिया जी आदि-आदि पर लालू प्रसाद यादव जी को लालू जी क्यो नही कहते मनुवादी या मनुवादियों के पिट्ठू? क्यो लालू जी को ललुआ कहा जाता है?

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मोदी जी की शिक्षा का अता-पता नही है पर वे मोदी जी है क्योंकि वे अभिजात्य समाज की पार्टी के एक कार्यकर्ता हैं पर लालू जी, ललुआ हैं जबकि वे पटना यूनिवर्सिटी से स्नातक ही नही है बल्कि उसके छात्रसंघ प्रेसीडेंट भी रहे हैं वह भी तब जब किसी पिछड़े/दलित का छात्रसंघ चुनाव लड़ना दूभर था, जीतना तो दूर की बात है लेकिन लालू जी कभी भी सामन्तो, दबंगो या अभिजात्य समाज के लोगो द्वारा सम्मानजनक तरीके से सम्बोधित नही किये गए। आखिर इसका कारण क्या है कि सभी के सभी लालू जी के पीछे पड़े हुए हैं? जरूर कोई गम्भीर कारण होगा कि लालू जी को देश का सम्पन्न, शिक्षित, अभिजात्य तबका हर क्षण अपमानित करने पर तुला रहता है।लालू जी ने किसी का न खेत काटा है,न जान मारा है,न नुकसान किया है लेकिन फिर भी लालू जी के प्रति दुर्भावना का कारण जरूर अत्यंत ही गम्भीर होगा।

भारतीय धर्म शास्त्र इस देश के मूल निवासियों को गुलाम बनाने के लिए जिस शस्त्र का ईजाद किये है वह यह है कि इन 85 फीसद भारत के मूल निवासियों को शिक्षा से वंचित कर दो, इसके लिए एक से एक क्रूरतम उपाय ढूंढे गए और उन्हें क्रियान्वित किया गया है। मेरी समझ से लालू प्रसाद यादव जी का सबसे बड़ा गुनाह यही है कि उन्होंने वंचितों को शिक्षा से वंचित करने के नुस्खों को फाड़ डाला तथा इन वंचित तबकों को शिक्षा से सिंचित करने का इंतजाम कर डाला।

बिखण्डित बिहार में कुल 14 विश्वविद्यालय हैं जिनमे एक मुक्त विश्वविद्यालय,दो प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, एक संस्कृत व एक अरबी फारसी तथा नौ अन्य विश्वविद्यालय हैं। लालू प्रसाद यादव जी ने इन नौ अन्य विश्वविद्यालयो में 1990 में जयप्रकाश विश्वविद्यालय-छपरा,1992 में वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय-आरा एवं वी एन मण्डल विश्वविद्यालय- मधेपुरा खोला। संस्कृत विश्वविद्यालय के मुकाबले अकलियत के लोगो के लिए अरबी-फारसी पढ़ने हेतु मौलाना मजहरुल हक अरबी-फारसी विश्वविद्यालय-पटना का निर्माण 1998 में करवाया। इस तरीके से लालू जी ने विभाजित बिहार में 4 विश्वविद्यालय दिया इसलिए वे ललुआ हैं।
लालू जी ने मुख्यमंत्री रहते हुए अविभाजित बिहार और अब के झारखंड में 1992 में विनोवा भावे विश्वविद्यालय-हजारीबाग तथा सिद्धू कांहू मुरमू विश्विद्यालय-दुमका का निर्माण करवाया। ज्ञातव्य हो कि इस आदिवासी इलाके में एक कृषि विश्वविद्यालय,दो प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, एक माइंस विश्वविद्यालय तथा चार अन्य विश्वविद्यालय हैं। इन चार अन्य विश्वविद्यालयो में दो लालू जी ने ही खोला है।

अविभाजित बिहार में कुल 22 विश्वविद्यालय हैं जिनमे सात कृषि/माइंस/प्राद्यौगिकी विश्वविद्यालय हैं। तेरह अन्य विश्वविद्यालयो व दो संस्कृत/अरबी-फारसी विश्वविद्यालयों में छः विश्वविद्यालय लालू प्रसाद यादव जी द्वारा बनवाये गए हैं लेकिन लालू जी की छबि अपढ़, अशिक्षित,  जोकर, मसखरा आदि की प्रस्तुत की जाती है, आखिर क्यों? यदि यही कार्य किसी अभिजात्य समाज के व्यक्ति ने किया होता तो वह स्तुत्य होता लेकिन एक भैंसवार के बेटा व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के भाई ने बिहार में विश्वविद्यालयो का सौगात देने के बावजूद आलोचना ही पाया है, इसलिए कि उसने शिक्षा को जनसुलभ बनाने को अपने सरकार का एजेंडा बनाया था।लालू जी ने वंचितों को शिक्षित होने का रास्ता बनाया इसलिए पीढ़ियों से शिक्षित-दीक्षित लोग लालू जी को अपने निशाने पर रखे हुये हैं।


लालू जी ने शिक्षा का मार्ग सबके लिए खोल करके बर्रे के छत्ते में हाथ डाल ही दिया तो हजार वर्ष से पढ़-पढा रहे लोग क्यों न जलें उनसे? क्यों वे लालू जी को ललुआ न कहें? लालू जी ने शम्बूक और एकलब्य की तरह घोर अपराध किया है बिहार में कि वे खुद तो पढ़े ही अपने जैसे अन्यान्य भैंस चराने, सूवर चराने, सब्जी उगाने, अन्न उपजाने, बढ़ईगिरी करने, लुहार गिरी करने, सुनार गिरी करने वालो आदि को 6 विश्वविद्यालय खोलकर शिक्षा के अमृत का आचमन करने का सुअवसर प्रदान कर दिया है।

बिहार या देश का वंचित/उपेक्षित/अर्जक/श्रमण तबका लालू प्रसाद यादव जी के अविस्मरणीय योगदान को याद नही करता जबकि जो हकमार लोग हैं वे लालू जी के उन कार्यो को गांठ बांधे हुए है जिन कार्यो की बदौलत बिहार का विशाल तनहीन/मनहींन/धनहीन तबका समुन्नति का राह पा गया है फिर भी लालू जी अपनी गति से उसी ढर्रे पर चलायमान हैं क्योंकि उन्हें इल्म है कि हमारा समाज हजार वर्ष से सताया/दबाया/डराया/धमकाया गया समाज है। वह उनके कार्यो का आकलन करेगा लेकिन तब जब उसे लालू के न होने पर लालू जैसा कोई और न दिखने को मिलेगा।

लालू जी का अपने समाज से शायद राहत इंदौरी जी के शब्दों में यही कहना है कि-

“दिए जलाए तो अंजाम क्या हुवा मेरा,
लिखा है तेज हवाओं ने मर्सिया मेरा।
किसी ने जहर कहा है किसी ने शहद कहा,
कोई समझ नही पाया है जायका मेरा।।”

(ये लेखक के निजी विचार हैं। चंद्रभूषण सिंह यादव त्रैमासिक पत्रिका यादव शक्ति के प्रधान संपादक हैं।)

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