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चुनाव के वो लोकलुभावन वादे और बेरोजगारी की खाई में गिरते युवा

बेरोजगारी एक ऐसा शब्द जिसका मायने किशोरावस्था तक मुझे या ज्यादातर लोग को नहीं पता रहा होगा, किशोरावस्था यानि स्कूल की आखिरी सीढ़ी से कॉलेज में घुसने तक का समय, कॉलेज में घुसने के बादचंद महीनो बाद ही इस सर्फ़ दंश के भी भयानक जहर का अंदाजा जब अपने सीनियर्स को बेरोजगार घूमते देखा तो लग गया, बिना किसी के पढ़ाये ही बेरोजगारी की परिभाषा समझ गया, और भविष्य में खुद इससे इलाज हेतु अपने को सतर्ककरना शुरू कर दिया, और ऐसा ही हम में से ज्यादातर लोग करते हैं.

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देश में लगभग एक दशक पहले एक दौर ऐसा आया था की कई कम्पनिया डूब गयी, लाखो प्राइवेट नौकरिया चली गयी, मैं बात कर रहा हूँ रिशेसन 2008 की, उसके बाद फिर स्थिती ठीक हुई और वह दौर आया जब नब्बे के दशक की पैदाइश औरअभी तक के भारत के शैक्षणिक इतिहास में सबसे भारी मात्रा में शिक्षा लेने वाली पीढ़ी अपनी शिक्षा पूरी कर बाजार में नौकरी तलाशने को उतरी या कुछ उतरने वाली थी.

बेरोजगारी एक ऐसा शब्द जिसका मायने किशोरावस्था तक मुझे या ज्यादातर लोग को नहीं पता रहा होगा, किशोरावस्था यानि स्कूल की आखिरी सीढ़ी से कॉलेज में घुसने तक का समय, कॉलेज में घुसने के बादचंद महीनो बाद ही इस सर्फ़ दंश के भी भयानक जहर का अंदाजा जब अपने सीनियर्स को बेरोजगार घूमते देखा तो लग गया, बिना किसी के पढ़ाये ही बेरोजगारी की परिभाषा समझ गया, और भविष्य में खुद इससे इलाज हेतु अपने को सतर्ककरना शुरू कर दिया, और ऐसा ही हम में से ज्यादातर लोग करते हैं.

देश में लगभग एक दशक पहले एक दौर ऐसा आया था की कई कम्पनिया डूब गयी, लाखो प्राइवेट नौकरिया चली गयी, मैं बात कर रहा हूँ रिशेसन 2008 की, उसके बाद फिर स्थिती ठीक हुई और वह दौर आया जब नब्बे के दशक की पैदाइश औरअभी तक के भारत के शैक्षणिक इतिहास में सबसे भारी मात्रा में शिक्षा लेने वाली पीढ़ी अपनी शिक्षा पूरी कर बाजार में नौकरी तलाशने को उतरी या कुछ उतरने वाली थी.मैं बात कर रहा हूँ जब देश में सोलहवीं लोक सभा के लिए चुनाव होने वाले थे और पूरे देश में राजनीतिक पार्टिया अपने चुनावी वादों से सियासत पाने केलिए जनता को लुभाने में लगी हुई थी, इन सियासी राजनीतिक दलों में बीजेपी पिछले चंदवर्षो में कई कारणों से कांग्रेस के बैक फुट पर जाने से सबसे आगे निकलती दिखाई दे रही थी और वो किसी भी तरह से कोई कसर भी इसके लिए नहीं छोड़ना चाहती थी. इस दल की तरफ से अगुवा गुजरात के नरेंद्र मोदी को बनाया गया जिनकोसम्पूर्ण भारत में कोने कोने ले जाकर खूब हाई टेक मंच सजा कर भाषण दिलवाये गए, नरेंद्र मोदी ने उस समय जिस तरह से अपने भाषण दिए उसमे सबसे ज्यादा आकर्षित युवाओ को करने वाली बात बोली गयी.

सोलहवीं लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने भारत के तमाम मंचो पर युवाओ को रोजगार देने के लिए तरह तरह के भाषण दिए. 22 नवंबर 2013 नरेंद्र मोदी ने आगरा में रैली में बोलते हुए युवाओ को हर साल एक करोड नौकरी देने की बात कही थी. बदले में सम्पूर्ण राष्ट्र के युवाओं को जिसमें कुछ को रोजगार के चक्कर में तो कुछ को हिंदुत्व की घुट्टी पिलाई गयी उसके चक्कर में, ऐसे सब जोड़ कर देखा जाये तो बड़ी भारी संख्या में कमल पर वोट दबा कर नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी को सोलहवीं लोकसभा आम चुनाव में ऐतिहासिक जीत दिलाई थी. पर यक़ीनन आज लगभग जब चार साल पूरे होने में चंद माह बचे हैं तो देश के कम से कम उन युवाओ में से एक बड़े हिस्से को जिन्होंने रोजगार के नाम पर वोट दिया थाउन्हें लगने लगा है की उन्हें छला गया, उनके साथ धोखा हुआ, दूसरी ओर हिंदुत्व की घुट्टी पिए हुए और भगवा झंडा ले आंखे बंद कर दौड़ने वाले युवाओ का भविष्य तो मोदी भरोसे भी नहीं है, उनका किसी को नहीं पता भविष्य क्या होगा.


जहाँ नरेंद्र मोदी ने युवाओ के दुखती राग पर हाथ रख हर साल एक करोड़ नौकरी देने की बात कही थी तो बात को आधार रख जब नरेंद्र मोदी सरकार के तीन सालो में दिए गए नौकरियों के आकड़े सामने रखते तो शायद रोजगार के नाम पर वोटदेने वाले युवाओ को लगता है की पेड़ की वही डाल काट दी जिस पर वो खुद बैठे थे.

केंद्र सरकार के लेबर ब्यूरो के आकंड़ों के मुताबिक जो केवल तीन साल के कार्यो के आधार पर हैं. साल 2016 में बीजेपी सरकार ने मैन्यूफेक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन, ट्रेड समेत 8 प्रमुख सेक्टर में सिर्फ 2 लाख 31 हजार नौकरियां दी हैं. साल 2015 में ये आकंडा इससे भी कम था, 2015 में सिर्फ 1 लाख 55 हजार लोगों को नौकरियां मिलीं. जबकि साल 2014 में 4 लाख 21 हजार लोगों को नौकरियां मिलीं. मोदी सरकार के तीनों साल के आंकड़ों को जोड़ दिया जाए तो अब तक सिर्फ और सिर्फ 9 लाख 97 हजार नौकरियां दी हैं. इसके इतर कांग्रेस ने दूसरी बार सरकार बनने के पहली साल यानी 2009 में 10.06 लाख नौकरियां दी थीं.

यानि मोदी सरकार 3 साल में उतनी नौकरी नहीं दे पाई जितनी की कांग्रेस सरकार ने 1 साल में ही दे दी थी. बावजूद इसके मोदी सरकार अब भी अपनी पीठ थपथपा रही है. रविशंकर प्रसाद रोजगार बढ़ाने की बात कर रहे हैं लेकिन जानकारी केलिए बता दें एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में अब भी 6 करोड़ 5 लाख 42 हजार लोग बेरोजगार हैं !

मुझे अभी भी याद हैं 2013 का वो दौर जब दिल्ली के मुनिरका, जिया सराय, हौज़ खास, मालवीय नगर, कटवारिया सराय, पटेल नगर, मुखर्जी नगर और तमाम भारत के उन शहरो में जहां सरकारी नौकरियों के इम्तेहान हेतु कोचिंग कीसुविधाएं हैं, जहाँ खूब भीड़ हुआ करती थी देश में लोक सभा चुनाव का मौहाल भी था, ज्यादातर युवाओ के मन मुताबित सरकार भी बन गयी और फिर खेल शुरू हुआ शिक्षा निधि के बजट कटौती का, प्राइवेटाइजेशन का, SSCCGL से चुनी जाने वाली नौकरियों को हर साल कम करने का, परमानेंट नौकरियों को कम और समय के साथ खत्म कर देने का खेल शुरू हुआ.

इन सब के बीच दो फैक्टर आज के युवाओ के लिए बेहद घातक साबित हुए पहला की इन युवाओ में ज्यादातर नब्बे के दशक की पैदाइश थे मतलब वो दशक जहां से शिक्षा को लेकर जागरूकता सबसे ज्यादा फैली और दूसरा की सरकार की पॉलिसी का अपने कथन के एकदम उलट हो जाना, मतलब युवाओ के लिए एक ऐसी खाई बनती गयी जिसको दो तरफ से खोदा जा रहा था और कभी कभी बेरोजगारी की उस खाई को युवा देख शायद मन में यही सोच लेता होगा की इसको गहरा तो हमनेही किया है लोकसभा चुनाव में वोट देकर.

जहां पहले नौकरियों के आने का और अभियर्थियों का रेश्यो बैलेंस होता था वही अब ये रेश्यो भयानक रूप से बिगड़ गया है. एक तरफ कुछ की आँखों पर पडी पट्टी खुली है पर ज्यादातर युवाओ के दिमाग से खेल इस तरह बना दिया गया है की उन्हें यही लगता है की उनमे ही दिक्कत है जो उनकी नौकरी नहीं लग रही है ऐसा ही एक किस्सा एक युवा का है जो तीन सालोतक दिल्ली में सरकारी नौकरी हेतु तैयारी करता रहा पर अन्तः किसी तरह एक प्राइवेट कम्पनी में अपने फील्ड से हैट कर रोजी रोटी का जुगाड़ किया, पर उसे तनिक भी ऐसा एहसास नहीं की उसकी इस दशा में नौकरियों और अभियर्थियों के रेश्योका बिगड़ जाना और उसके लिए सरकार की पॉलिसी काफी हद तक जिम्मेदार है.

अगर हम तमाम विभागों की बात करे तो हज़ारो की संख्या में रिक्त पद खाली पड़े मिलेंगे जिसके कारण नागरिको को भी सरकार की सेवाएं लेने में समस्या उत्पन्न होती है पर इस सरकार ने जैसे जिद्द कर रखी है और उस जिद पर अड़ी है.

बीते कुछ दिनों में कई जगह से राज्य और केंद्र सरकार के खिलाफ बेरोजगार युवाओ युवतियों के विरोध जताते रैलियो के आयोजन की भी खबर आ रही है, उम्मीद है ऐसे विरोध प्रदर्शन की गिनती हाल फिलहाल के महीनो में बढ़ने वाली हैक्यों की सरकार के रवैये में कोई भी अचानक बदलाव के संकेत न के बराबर हैं.

ये समय युवाओ के आत्मचिंतन का है, आगामी एक साल बाद लोकसभा के आम चुनाव दुबारा होंगे वो सटीक समय होगा की आज के युवा को अपने आगामी पीढ़ी को एक बेहतर विश्वशनीय सरकार चुन कर दे जो युवाओ की सबसे मुख्यसमस्या बेरोजगारी को कम से कम करने हेतु बालू के महल बनाने के बजाये ठोस कदम उठाये, जिससे राष्ट्र को युवाओ से बहुत कुछ दिया जा सके.

(Satyendra Satyarthi is PhD ( Indian Institute Of Technology ), Dr. Ambedkar National Award Winner.)

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