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RSS ने रामनाथ कोविंद को दिया है OBC आरक्षण के विरोध का ईनाम?

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नई दिल्ली। बिहार के वर्तमान राज्यपाल रामनाथ कोविंद को एनडीए की तरफ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित करने पर माना जा रहा है कि संघ की पसंद की वजह से उनका नाम सामने आया है। रामनाथ कोविंद भाजपा का दलित चेहरा हैं। वह कोली जाति से आते हैं। कोविंद संघ के स्वयंसेवक रह चुके हैं।

दलित वोटबैंक साधने की कोशिश
दलित समुदाय से आने वाले रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर एनडीए ने विपक्षी पार्टियों को चौंका दिया है। दरअसल भाजपा ने कोविंद के सहारे लगभग खिसक चुके दलित वोटबैंक को साधने की कोशिश की है। 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में भाजपा शासित राज्यों से दलित उत्पीड़न की लगातार घटनाओं ने भाजपा के दलित वोटबैंक को दूर कर दिया है।

आरएसएस से जुड़ाव होना भी अहम वजह
ऐसे में भाजपा ने रामनाथ कोविंद का नाम यूं ही नहीं बढ़ाया बल्कि उनका आरएसएस से जुड़ाव होना भी एक अहम बात है। उन्हें सिर्फ दलित होने की वजह से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार नहीं बनाया गया है बल्कि वह आरएसएस के एजेंडे पर भी फिट साबित होते हैं। यह तो जगजाहिर है कि आरएसएस का मुख्य एजेंडा देश से आरक्षण खत्म करना है और रामनाथ कोविंद भी इस एजेंडे पर काम कर चुके हैं।

कोविंद ने किया था ओबीसी महिलाओं के आरक्षण का विरोध
मामला साल 2010 का है। भाजपा के ओबीसी नेता गोपीनाथ मुंडे ने महिला आरक्षण में ओबीसी महिलाओं को अलग आरक्षण देने की मांग उठाने की बात कही थी। कोविंद उस समय भाजपा के प्रवक्ता थे। तभी न्यूज एजेंसी आईएएनएस ने कोविंद से ओबीसी महिला आरक्षण पर उनकी प्रतिक्रिया ली। तब उन्होंने साफ कहा था कि “हम आरक्षण में आरक्षण को स्वीकार नहीं करेंगे। 33 फीसदी महिला आरक्षण के भीतर अलग से आरक्षण को स्वीकार नहीं किया जाएगा।”

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ओबीसी महिलाओं के आरक्षण का विरोध की खबर यहां क्लिक कर पढ़ें…

कोविंद ने कहा था, “हमारी पार्टी का रूख स्पष्ट है। हम महिला आरक्षण विधेयक को मौजूदा रूप में ही पारित करवाना चाहते हैं।” दरअसल मुंडे ने अन्य पिछड़ा वर्ग के नेताओं की बैठक के बाद कहा था कि वह महिला आरक्षण में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण मांग को पार्टी में उठाएंगे।

महिला आरक्षण बिल 9 मार्च 2010 को पारित किया गया। संसदीय इतिहास में वह दिन ऐतिहासिक दिन माना गया था। दूसरे दिन सभी अख़बारों की लीड स्टोरी वही थी। लोगों ने पहली बार सुषमा स्वराज, वृंदा करात और नज़मा हेपतुल्ला को एक मंच से लोगों का अभिवादन करते देखा था।

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महिला आरक्षण पर शरद यादव सहित कई पार्टियों ने आपत्ति जताई थी। उनका तर्क था कि महिला आरक्षण में भी जातिवार आरक्षण होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो सिर्फ शहरी महिलाओं का दबदबा हो जाएगा।

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