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National Dastak

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आम आदमी की आवाज़ 'नेशनल दस्तक' 

Created By : फर्रह शकेब Date : 2016-12-20 Time : 19:38:31 PM


आम आदमी की आवाज़ 'नेशनल दस्तक' 

"पत्रकारिता का एकमात्र उद्देश्य सेवा होना चाहिए। अखबार और प्रेस एक महान शक्ति है, लेकिन जैसे पानी का अनियंत्रित उन्मुक्त प्रवाह गाँव के गाँव डुबा सकता है, फसलों को नष्ट कर सकता है, ठीक उसी प्रकार एक अनियंत्रित कलम सेवा के स्थान पर महान विध्वंश कर सकती है। लेकिन इसे नियंत्रित करने का प्रयास, अनियंत्रित छोड़ने से कहीं अधिक घातक है। यह तभी लाभदायक है जब नियंत्रण आतंरिक हो। अगर इस तर्क को सही माना जाए, तो दुनिया में कितने पत्र पत्रिका इस कसौटी पर खरे उतरेंगे? "- महात्मा गांधी, An Autobiography Or the Story of My Experiments with Truth, p. 211

 

महात्मा गांधी के ये कथन 1920 के दशक के हैं और स्वभाविक है के मिडिया पर टिप्पणी की ज़रूरत तब भी महसूस की गयी होगी। अगर आज हम इस टिप्पणी के सन्दर्भ में मिडिया की परिभाषा तय करें तो ये केवल सटीक ही नही होंगी बल्कि इसमें काफी कुछ और इसे विस्तारित करने के लिए जोड़ा जा सकता है. आज मिडिया धन उगाही का एक विकराल उद्योग बन गया और राजनीतिक शक्तियों के साथ बिलकुल सहजीवन वाले फॉर्मूले पर काम कर रहा है तथ्य आधारित पत्रकारिता कहीं काफी पीछे छूट चुकी है और मिडिया आज जनता पर राजनितिक दलों का एजेंडा थोप रहा है और खबरें दिखाने, खबरें बनाने, खबरें चलाने और खबरें दबाने के लिए एक निर्धारित गाइडलाइन पर राष्ट्र निर्माण के लिफ़ाफ़े में में बन्द कर खबरें परोसी जा रही हैं 


'ब्रेकिंग न्यूज' सिंड्रोम ने पारंपरिक ज्ञान को तोड़ दिया है और मीडिया घरानों के लिए व्यापार जिसमें अप्रत्याशित मुनाफा हो, एकमात्र प्रेरणा शक्ति बन गया है. सूचना क्रांति एवं तकनीकी विस्तारीकरण के चलते मीडिया की पहुंच व्यापक हुई है और विगत कुछ वर्षों में मीडिया के स्वरुप में अप्रत्याशित परिवर्तन हुए हैं लेकिन मीडिया के इस विस्तार और स्वरूप परिवर्तन के साथ सर्वाधिक चिंतनीय पहलू यह जुड़ गया है मिडिया सामाजिक सरोकारों से दूर होता जा रहा है. 


दलितों बहुजनों के साथ मिडिया को दोहरा रवैया किसी से पोशीदा नही और मुसलामानों के साथ मीडिया शत्रुता की हद तक भेदभाव करता है.  स्तिथि तकरिबन दो दशक से यही है लेकिन विगत चार पांच वर्षों में मिडिया अपने चारित्रिक पतन के जिस चरमोत्कर्ष पर पहुंचा है उसने मिडिया की विश्वसनीयता और कर्तव्यों पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है.

 

मीडिया एक विशेष विचारधारा और राजनितिक दल का प्रवक्ता बना व्यक्ति पूजा के जिस चरम पर है वहाँ वो लोग जो सैद्धांतिक रूप से मीडिया को लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ समझते हैं उन्हें ये बात समझ लेनी चाहिए की न्यायपालिका, विधायिका,कार्यपालिका और मीडिया अगर लोकतन्त्र रुपी सिंहासन के चार पाये तो और इनमे से एक भी पाया अपने दायित्वों के प्रति कमज़ोर हुआ तो सिंहासन अधिक देर तक खड़ा नही रह पायेगा.. आज मिडीया सत्ता के माउथ पीस की भूमिका में है. जनहित से जुड़े प्रश्नों पर जहां सत्ता को कटहरे में खड़ा करना चाहिए वहाँ मीडिया सत्ता के पक्ष में माहौल बना रहा है.


मिडिया में दलितों बहुजनों और मुस्लिमों का प्रतिशत पहले ही अनुपात के स्तर पर नगण्य है और यही कारण है इन समुदायों के सरोकार से जुड़े सवालों को मुख्य धारा की मीडिया में जगह नही मिलती. अगर मिलती भी है सेलेक्टिव हो कर और उसके बाद भी घटना और प्रश्न को इस तरह कवर किया जाता है के पीड़ित ही दोषी के तौर पर सामने लाया जाता है. ऐसे में आज जनता के सामने तथ्य समेत पूरा मामला रखने और उस पर जनजागृति जगाने के लिए इस समय सोशल मिडीया एक अहम भूमिका निभा रहा है जहां आम जन से उनके हितों से जुड़े सवालों पर दो तरफा संवाद की व्यापक गुंजाइश है.


सोशल मिडीया के इस दौर में वेब पत्रकारिता मीडिया जगत में एक नई क्रान्ति बन कर उभरी है जिसने खबरों के प्रसारण की तीव्रता को पहले से तक़रीबन ढाई सौ प्रतिशत तक बढ़ाया है और इसी वेब पत्रकारिता में जहां कई पोर्टल्स चल रहे हैं बल्कि राष्ट्रीय मुख्य धारा की प्रिंट एवम् इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने वेब पोर्टल्स संचालित कर रहे हैं वहीँ मीडिया  संकट के इस भीषण दौर में नेशनल दस्तक पोर्टल और यूट्यूब चैनल एक नई आशा ले कर आया है जिस के बारे में हम कह सकते हैं के इसने अपने केवल एक वर्ष यानी प्रथम वर्ष के कार्यकाल में मीडिया जगत को इन नया सन्देश और दिशा देने में जो भूमिका निभाई है वो बहुत अहम है.


मुख्य धारा का मीडिया जिन मुद्दों को नज़रअंदाज़ कर रहा है उन मुद्दों को नेशनल दस्तक न केवल कवर रहा है, जनता को तथ्यों के साथ न केवल अपडेट कर रहा है बल्कि मुद्दों के प्रसारण की वास्तविकता का कच्चा चिटठा खोलने में भी नेशनल दस्तक की पूरी टीम बेहतरीन एवम् सराहनीय भूमिका निभा रही है.


विगत एक वर्ष में कई मुद्दे तो ऐसे हैं जिन्हें नेशनल दस्तक की टीम ने मुख्य धारा की मीडिया में जगह दिलाई बल्कि सच के साथ जनता को अवगत करवाया.
रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या मुख्य धारा की मीडिया से ग़ायब हो चुका था लेकिन उसे नेशनल दस्तक की कवरेज ने पुनः मीडिया में स्थापित किया, उसके बाद क्रमशः गुजरात में दलित उत्पीड़न, झारखण्ड में आदिवासियों पर रघुवर सरकार का दमन,. मिन्हाज की हत्या से ले कर अब भागलपुर में भूमिहीनों पर बिहार पुलिस द्वारा बर्बर लाठी चार्ज की घटना को नेशनल दस्तक ने काफी अच्छी कवरेज दी है.


उत्तर प्रदेश और कई राज्यों के इस चुनावी माहौल में उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर में हुए भीषण दंगों को जहां एक तरफ़ यकसर फरामोश करने की क़वायेद चल रही थी वहाँ नेशनल दस्तक की टीम द्वारा मुज़फ्फरनगर दंगों पर बनाई गयी डाक्यूमेंट्री और अभी के वास्तविक हालात पर रिपोर्टिंग ने दंगा विस्थापितों के पुनर्वास और दोषियों के प्रति कार्रवाई के सवाल को उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीति के केंद्र में ला दिया है. 


एक तरफ नोटबन्दी नामक इस आर्थिक आपातकाल को मीडिया ने देशहित में आवशयक बना कर जनता को दिग्भर्मित करने में कोई कसर नही छोड़ी वहीँ इसी विषय पर नेशनल दस्तक की पत्रकार साथी श्वेता यादव ने जिस तरह आम भारतीयों को अपनी रिपोर्टिंग के ज़रिए आवाज़ दी है और नोटबन्दी का भारतीय आम जनजीवन पर वास्तविक प्रभाव को दर्शया है वो निश्चित रूप से नेशनल दस्तक के प्रबन्धकों को बधाई का हक़दार बनाती है.  ख़बर प्रसारण से अलग हट कर नेशनल दस्तक मीडिया के क्षेत्र में नवागन्तुक युवाओँ को भी एक मज़बूत प्लेटफॉर्म दिया है जहां वो न केवल अपनी प्रतिभा को निखार रहे हैं बल्कि मीडिया का एक हिस्सा होने पर उनके सामाजिक और नैतिक दायित्वों का भी एहसास हो रहा है.


नेशनल दस्तक ने इसके अलावा कई ऐसे सुदूर क्षेत्रों से खबरें प्रसारित कर जहां वेब पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया है वहीँ नेशनल दस्तक की टीम ने भी अपनी मेहनत और प्रतिभा को बधाई का पात्र बनाया है. 


उचित समय है के ऐसे विध्वंसक दौर में नेशनल दस्तक जैसी बहुजन आवाज़ को अपना नैतिक आर्थिक आउट हर सम्भव सहयोग दिया जाए ताकि जन सरोकार से जुड़े सवाल राजनीति के केंद्र में मज़बूती से स्थापित किये जाएँ और व्यवस्था चलाने वालों को जवाब्दह बनाते हुए जनता को अपना अधिकार और दायित्व दोनों का बराबर से एहसास कराया जाता रहे..


नेशनल दस्तक की पूरी टीम को एक वर्ष पूरा होने पर हार्दिक बधाई पेश करता हूँ और ये कामना करता हूँ के आने वाले समय में मीडिया जगत के आसमान पर नेशनल दस्तक एक झिलमिलाता सितारा बन कर उभरे.

 

लेखक:- फर्रह शकेब सिविल राइट एक्टिविस्ट स्वतंत्र उर्दू पत्रकार मांवधिकार के विषय पर काफी सक्रिय हैं और विशेष कर दलित मुस्लिम एकता की दिशा में हर सम्भव प्रयास कर रहे हैं. झारखण्ड, बिहार और दिल्ली के कई जनांदोलनों में सक्रिय नेशनल मूवमेंट फ्रंट और दलित पिछड़े अल्पसंख्यक मोर्चा जैसे सामाजिक संगठनों के संस्थापक सदस्य


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